Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished526 pages

Page 354 of 526

Read in context
Page 354
२६८शुक्रनीतिः

न पञ्चाङ्गुलतो हीना न षडङ्गुलतोऽधिकाः।
करस्य मध्यमा प्रोक्ता सर्वमानेषु तद्विदैः ॥ २०१ ॥
सभी प्रमाण की मूत्ति में हाथ की मध्यमा अंगुलि पांच अंगुल से कम तथा छः अंगुल से अधिक प्रमाण की नहीं बनानी चाहिये ऐसा मूर्ति-कला के विद्वान लोग कहते हैं।

क्वचित्तु बालसदृशं सदैव तरुणं वयः।
मूर्तीनां कल्पयेच्छिल्पी न वृद्धसदृशं क्वचित् ॥ २०२ ॥
शिल्पी को कभी मूर्त्तियों की वृद्धसदृश कल्पना न करने का निर्देश—
मूर्तिकार कहीं पर बालक के समान और कहीं युवा के समान मूर्ति बनावे किन्तु कहीं पर भी वृद्ध के समान मूर्त्ति न बनावे ।

एवंविधान् नृपो राष्ट्रे देवान् संस्थापयेत् सदा ।
प्रतिसंवत्सरे तेषामुत्सवान् सम्यगाचरेत् ॥ २०३ ॥
**राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने का निर्देश—**राजा अपने राज्य के अन्दर इसी भांति से बनी देव-मूर्तियों को सदा स्थापना करे । और प्रतिवर्ष उनके उत्सव भलीभांति करे ।

देवालये मानहीनां मूर्तिं भग्नां न धारयेत् ।
प्रासादांश्च तथा देवान् जीर्णानुद्धृत्य यत्नतः ॥ २०४ ॥
देवतां तु पुरस्कृत्य नृत्यादीन् वीक्ष्य सर्वदा ।
न मनः स्त्रोपभोगार्थं विदध्यादु यत्नतो नृपः ॥ २०५ ॥
**मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेध—**और देवमन्दिर में उक्त प्रकार के प्रमाणों से हीन प्रमाण की अथवा खण्डित मूर्ति को न रहने दे । तथा देवता और उनके मन्दिरों के जीर्ण हो जाने पर उनका यत्नपूर्वक पुनः संस्कार करते हुये और सदा देवताओं के आगे नृत्यादि देखते हुये, राजा यत्नपूर्वक अपने राजोचित भोग भोगने में मनको न प्रवृत्त करे ।

प्रजाभिर्विहिता ये ये ह्युत्सवास्तांश्च पालयेत् ।
प्रजानन्देन संतुष्येत् तद्दुःखैर्दुःखितो भवेत् ॥ २०६ ॥
इति शुक्रनीतौ राष्ट्रमध्यं चतुर्थाध्यायस्य लोकधर्मनिरूपणं नाम चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ४ ॥
**प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालने करने का निर्देश—**और प्रजाओं द्वारा जो २ उत्सव किये जाते हों उनकी रक्षा करे एवं प्रजाओं के आनन्द से आनन्दित तथा दुःख से स्वयं दुःखित हो ।

इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में राष्ट्र का मध्य चतुर्थाध्याय का लोकधर्मनिरूपण-नामक चतुर्थ प्रकरण समाप्त हुआ ।