शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextचतुर्थाऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७७
व्यभिचार कराने वाली एवं मद्य पीनेवाली होती हैं एवं वहां के लोग रजस्वला स्त्रियों का भी स्पर्श करते हैं, जो कि निषिद्ध है ।
खशजाताः प्रगृह्णन्ति भ्रातृभार्यामभर्तृकाम् ॥ ४९ ॥
अनेन कर्मणा नैते प्रायश्चित्तदण्डार्हकाः ।
और खस जाति के लोग विधवा भाई की स्त्री के साथ विवाह करते हैं । इन सब पूर्वोक्त निषिद्ध कर्मों के करने से भी ये सब राजा के द्वारा प्रायश्चित्त तथा दण्ड के अधिकारी नहीं होते हैं ।
येषां परम्पराप्राप्ताः पूर्वजैरप्यनुष्ठिताः [॥ ५० ॥
त एव तैर्न दुष्येयुराचारान्नेतरस्य तु ।
जिन जाति, देश तथा कुलों के जो प्राचीनकाल से प्रचलित एवं उनके पूर्वजों के द्वारा सदा पालन किये जाते हुये जैसे धर्म हों उनका वैसे ही पालन करना चाहिये । अतः राजा एक दूसरे के धर्मविषयक आचारों को दूषित न करने देवें, अर्थात् जिसका जैसा आचार हो उसको वैसा करने देवें ।
परस्त्रीधनसंलुब्धा मद्यासक्तरताः कलौ ॥ ५१ ॥
विज्ञानलवदुर्दग्धाः प्रायः श्रीसंयुताश्च ये ।
तन्त्रकर्मरता वेदविमुखाः स्युः सदैव हि ॥ ५२ ॥
महादण्डेन चैतेषां कुर्यात् संशोधनं नृपः ।
कलियुग में महादण्ड के योग्यों का निर्देश— कलियुग में जो धनवान् हैं वे प्रायः करके दूसरे की स्त्री तथा धन के अधिक लोभी, मद्यपान करने में आसक्त, थोड़े ज्ञान से भी अपने को सबसे अधिक पण्डित माननेवाले, तन्त्र कर्म करने में रत एवं वेदविमुख सदा होते हैं, राजा इन सबों को महादण्ड से भलीभांति दण्डित करे ।
न्यायाम्पश्येत्तु मध्याह्ने पूर्वाह्ने स्मृतिदर्शनम् ॥ ५३ ॥
न्यायादिकों के समय का निर्देश— राजा मध्याह्नकाल में न्याय (मुकदमों) को देखे । पूर्वाह्न (दोपहर के पूर्व) में स्मृतियों को देखे ।
मनुष्यमारणे स्तेये साहसेऽत्ययिके सदा ।
न कालनियमस्तत्र सद्य एव विवेचनम् ॥ ५४ ॥
मनुष्यमारणादिकों में समय के नियम में अभाव का निर्देश— किन्तु मनुष्य के मारने पर एवं चोरी, डांका किंवा अन्य नाशजनक मुकदमों के देखने में समय का नियम नहीं है बल्कि उन सबों में तत्काल ही विचार करना उचित होता है ।
धर्मासनगतं दृष्ट्वा राजानं मन्त्रिभिः सह ।
गच्छेन्निवेद्यमानं यत् प्रविरुद्धमधर्मतः ॥ ५५ ॥