शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context। चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २८३
क्रोधी, विचारपति (जज) के साथ १ आसन पर बैठनेवाला और अत्यन्त भागी हो तो उसे दण्ड देना चाहिये ।
अर्थिना कथितं राज्ञे तदावेदनसंज्ञकम् ॥ ८७ ॥
कथितं प्राड्विवाकादौ सा भाषाऽखिलबोधिनी ।
स पूर्वपक्षः सभ्यादिस्तं विमृश्य यथार्थतः ॥ ८८ ॥
अर्थितः पूरयेद्धीनं तत्साध्यमधिकं त्यजेत् ।
वादिनश्चिह्नितं साध्यं कृत्वा राजा विमुद्रयेत् ॥ ८९ ॥
आवेदन पत्र के लक्षण तथा सबके बोध-योग्य भाषा (बयान) का निर्देश—
वादी द्वारा जो राजा के पास आवेदन पत्र दिया जाता है, उसे 'आवेदन' (अर्जी) कहते हैं। और जो प्राड्विवाक (जज) आदि के समक्ष कहा जाता है उसे 'भाषा' (बयान) कहते हैं। जो कि सारी बातों को समझानेवाली होती है। और वही 'पूर्वपक्ष' कहा जाता है। सभ्य (जूरी) आदि उसी पर प्रार्थना किये जाने पर यथार्थ रीति से विचार कर जो कमी हो उसे वादी से पूछकर पूरा कर ले एवं जो अधिक हो उसे निकाल दे। इस भांति से उसके बयान को पूर्ण करके उस पर उसके अंगूठे का निशान लगवावे और अन्त में राजा उस पर अपनी मुहर लगा दे। वादी का यह बयान भी एक प्रकार का साध्य (गवाही) होता है।
अशोधयित्वा पक्षं ये ह्युत्तरं दापयन्ति ताम् ।
रागात्क्षोभाद्भयाद्वापि स्मृत्यर्थे बाधिकारिणः ॥ ९० ॥
सभ्यादीन् दण्डयित्वा तु ह्यधिकारात्निवर्तयेत् ।
पूर्वपक्ष को बिना शुद्ध किये उत्तर दिलानेवाले अधिकारी को अधिकार-च्युत करने का निर्देश—
जो अधिकारी पुरुष राग, क्षोभ या भय से इस प्रकार से बिना वादी के पक्ष का जांच-परताल किये ही प्रतिवादी से उत्तर दिलाते हैं ऐसा करनेवाले उन अधिकारी सभ्य (जूरी) आदि को भविष्य में ऐसा पुनः निन्दित कार्य न करने का स्मरण रखने के लिये राजा दण्डित करे एवं अधिकार-च्युत कर दे।
ग्राह्याग्राह्यं विवादं तु सुविमृश्य समाश्रयेत् ॥ ९१ ॥
सञ्जातपूर्वपक्षं तु वादिनं सन्निरोधयेत् ।
राजाज्ञया सत्पुरुषैः सत्यवाग्भिर्मनोहरैः ॥ ९२ ॥
निरालसैरिङ्गितज्ञैश्च दृढशस्त्रास्त्रधारिभिः ।
पूर्वपक्ष पूर्ण होने पर वादी को रोक देने का निर्देश—
राजा विवाद (मुकदमा) लेने योग्य है या नहीं इसका भलीभांति विचार कर यदि योग्य हो तो ले ले। और जब वादी का पूर्वपक्ष (बयान) पूरा हो जाय