Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 360 of 526

Read in context
Page 360

२७४ | शुक्रनीतिः

कुलादिभ्योऽधिकाः सभ्यास्तेभ्योऽध्यक्षोऽधिकः कृतः ।
सर्वेषामधिको राजा धर्माधर्मनियोजकः ॥ ३१ ॥

पूर्वोक्त कुलादिकों से अधिक सभ्यों ( जूरियों ) का निर्णय माननीय होता है, उनसे अधिक अध्यक्ष ( जज ) का निर्णय माननीय होता है। और इन सबों से अधिक धर्मा-धर्म का निर्णय करने में राजा की मान्यता होती है।

उत्तमाऽधममध्यानां विवादानां विचारणात् ।
उपर्युपरिबुद्धीनां चरन्तीश्वरबुद्धयः ॥ ३२ ॥

क्योंकि राजा उत्तम, मध्यम तथा अधम श्रेणी के सभी विवादों (मुकदमों) का निर्णायक प्रधान रूप से होता है। और उसकी बुद्धि साधारण निर्णायकों की बुद्धि से अधिक ऊँची होती है।

एकं शास्त्रमधीयानो न विन्द्यात् कार्यनिर्णयम् ।
तस्माद् बहुागमः कार्यो विवादेषूत्तमो नृपैः ॥ ३३ ॥

**निर्णय करने में समर्थ पुरुष के लक्षण—**केवल एक ही शास्त्र का जानने-वाला व्यक्ति विवाद का निर्णय करना नहीं जान सकता है, अतः बहुत से शास्त्रों के ज्ञाता किसी उत्तम व्यक्ति को ही राजा निर्णायक नियुक्त करे।

स ब्रूते यं स धर्मः स्यादेको वाऽध्यात्मचिन्तकः ।
**धर्म का लक्षण—**और जो आत्म-तत्त्व का जाननेवाला व्यक्ति होता है, वह अकेला ही जो कहता है वह धर्म माना जाता है अर्थात् उसका निर्णय सर्वमान्य होता है।

एकद्वित्रिचतुर्वारं व्यवहारानुचिन्तनम् ॥ ३४ ॥
कार्यं पृथक् पृथक् सभ्यै राज्ञा श्रेष्ठोत्तरैः सह ।
**अनुचिन्तन-प्रकार का निर्देश—**राजा सबसे श्रेष्ठ सभ्यों (जूरियों) के साथ मिल कर पृथक् २ मुकदमे की गुरुता-लघुता जैसी हो उसके अनुसार एक बार अथवा २, ३, या ४ बार विचार कर निर्णय करे।

अर्थिप्रत्यर्थिनौ सभ्यांल्लेखकप्रेक्षकांश्च यः ॥ ३५ ॥
धर्मवाक्यै रञ्जयति स सभास्तारतामियात् ।
जो विचारपति या सभ्य ( जूरी ) वादी-प्रतिवादी, सभ्यों (जूरियों), लेखकों या दर्शकों को धर्मयुक्त वचनों से प्रसन्न करता है, वह सभ्यों में श्रेष्ठता को प्राप्त करता है। अर्थात् सर्वोत्तम समझा जाता है।

नृपोऽधिकृतसभ्याश्च स्मृतिर्गणकलेखकौ ॥ ३६ ॥
हेमाग्न्यम्बुस्वपुरुषाः साधनाङ्गानि वै दश ।
**दश साधनों का निर्देश—**१. राजा, २. अधिकारी सभ्य (विद्वान