शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context२७६ | शुक्रनीतिः
अर्थशास्त्र की विवेचना अधिक रूप से की जाय उसे धर्माधिकरण (न्यायालय-कचहरी) कहते हैं।
व्यवहारान् दिदृक्षुस्तु ब्राह्मणैः सह पार्थिवः।
मन्त्रज्ञैर्मन्त्रिभिश्चैव विनीतः प्रविशेत् सभाम् ॥ ४३ ॥
**राजासभा में प्रवेश करने का प्रकार—**व्यवहारों (मुकदमों) को देखने की इच्छा रखने वाला राजा विनीत भाव से मन्त्रणा करने में कुशल ब्राह्मणों तथा मन्त्रियों के साथ न्यायसभा में प्रवेश करे।
धर्मासनमधिष्ठाय कार्यदर्शनमारभेत्।
पूर्वोत्तरसमो भूत्वा राजा पृच्छेद्दिवादिनौ ॥ ४४ ॥
**सभा में राजा के कृत्यों का निर्देश—**इस प्रकार से राजा धर्मासन (न्यायासन) पर बैठकर मुकदमा देखना शुरू करे। वादी-प्रतिवादी दोनों में समभाव रखकर राजा उन दोनों से प्रश्न करे।
प्रत्यहं देशदृष्टैश्च शास्त्रदृष्टैश्च हेतुभिः।
जातिजानपदान् धर्माञ्छ्रेणिधर्मांस्तथैव च ॥ ४५ ॥
समीक्ष्य कुलधर्मांश्च स्वधर्मं प्रतिपालयेत्।
**राजा को पूर्ण विचारपूर्वक सब धर्मों की रक्षा करने का निर्देश—**प्रतिदिन लोक तथा शास्त्रों में देखे गये कारणों के द्वारा जाति, देश, श्रेणि एवं कुल के धर्मों को भलीभांति देख कर राजा अपना (विचारपूर्वक मुकदमों का निर्णय करना रूप) धर्म का पालन करे।
देशजातिकुलानां च ये धर्माः प्राक् प्रवर्तिताः ॥ ४६ ॥
तथैव ते पालनीयाः प्रजा प्रक्षुभ्यतेऽन्यथा।
**देश-जाति-कुलधर्मों का पालन करने का निर्देश—**देश, जाति एवं कुल के जो धर्म जिस भांति से पहले से चले आये हों उनका उसी भांति से पालन करना चाहिये। अन्यथा अपने मनसे यदि राजा कुछ उनमें परिवर्त्तन करे तो उससे प्रजा में क्षोभ उत्पन्न हो जाता है।
उद्वह्यते दाक्षिणात्यैर्मातुलस्य सुता द्विजैः ॥ ४७ ॥
मध्यदेशे कर्मकराः शिल्पिनश्च गवाशिनः।
**देश-जाति-कुलधर्मों के उदाहरणों का निर्देश—**जैसे दक्षिण देश के ब्राह्मण लोग मामा की कन्या (ममेरी बहिन) के साथ विवाह करते हैं। मध्य देश में कर्मकर तथा शिल्पी गोमांसभक्षी होते हैं।
मत्स्यादाश्च नराः सर्वे व्यभिचाररताः स्त्रियः ॥ ४८ ॥
उत्तरे मद्यपा नार्यः स्पृश्या नृणां रजस्वलाः।
और उत्तर देश में सभी लोग मछली खानेवाले होते हैं तथा स्त्रियां