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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 365 of 526

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Page 365

चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७९

(बयान) का कभी भी अनुमोदन न करें। यदि वे लोग अपने अधिकार के बल से उक्त लेख का अनुमोदन करें तो राजा उन लोगों को चोर की भाँति दण्ड दे।

प्राड्विवाको नृपाभावे पृच्छेदेवं समागतम् ॥ ६२ ॥

**राजा के अभाव में प्राड्विवाक को पूछने का निर्देश—**और राजा के उपस्थित न रहने पर प्राड्विवाक (जज) न्यायालय में उपस्थित वादी से पूर्वोक्त रीति से पूछे।

वादिनौ पृच्छति प्राङ् वा विवाको विविनक्त्यतः ।
विचारयति सभ्यैर्वा धर्माऽधर्मान् विवक्ति वा ॥ ६३ ॥

**प्राड्विवाक शब्द के अर्थका निर्देश—**विचारपति (जज) को 'प्राड्विवाक' इसलिये कहते हैं कि—वह वादी-प्रतिवादी से पूछता है अतः 'प्राङ्' कहलाता है और विचार करता है अतः 'विवाक' कहलाता है अतः दोनों मिलकर 'प्राड्विवाक' सिद्ध होता है और वही विचारपति सभ्यों के साथ मिलकर धर्माधर्म का विचार करता है अथवा विशेष रूप से अपना निर्णय कहता है।

सभायां ये हिता योग्याः सभ्यास्ते चापि साधवः।

राजसभा (न्यायालय) में जो हित चाहनेवाले, कार्य करने में चतुर एवं सज्जन हों, उन्हीं को सभ्य (जूरी) बनाना चाहिये।

स्मृत्याचारव्यपेतेन मार्गेणाधर्षितः परैः ॥ ६४ ॥
आवेदयति चेद्राज्ञे व्यवहारपदं हि तत्।

**व्यवहार पद का कथन—**धर्मशास्त्र एवं सदाचार से विरुद्ध मार्ग का आश्रय लेकर दूसरों के द्वारा पीडित किये जाने पर यदि कोई राजा के पास न्यायालय में आवेदन पत्र देता है उसे 'व्यवहार पद' (मुकदमा दायर करना) का स्थान कहते हैं।

नोत्पादयेत् स्वयं कार्यं राजा नाप्यस्य पूरुषः ॥ ६५ ॥
न रागेण न लोभेन न क्रोधेन प्रसेन्नृपः।
परैरप्रापितानर्थांश्च चापि स्वमनीषया ॥ ६६ ॥

**राजा या राजपुरुष को स्वयं व्यवहार को पैदा करने का निषेध—**राजा या उसके अधिकारी पुरुष स्वयं किसी विवाद (मुकदमा) को न्यायालय में न उपस्थित करें। और राजा अनुराग, लोभ या क्रोध के वशीभूत होकर किसी को पीड़ित न करे। और वादी-प्रतिवादी के बिना उपस्थित किये राजा अपनी बुद्धि से किसी मुकदमा को न्यायालय में न उपस्थित करे।

छलानि चापराधांश्च पदानि नृपतेस्तथा।