शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
About this granth
The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.
This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.
The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.
१०२ | शुक्रनीतिः
वर्ष भर का ), बहुवार्षिक ( बहुत वर्षों का ) रूप में अच्छी तरह से लिखें। और उसे राजा के समक्ष उपस्थित कर दिखावें।
राजाद्यंकितलेख्यस्य धारयेत्स्मृतिपत्रकम् ॥ २९७ ॥
कालेऽतीते विस्मृतिर्वा भ्रान्तिः संजायते नृणाम् ।
राजादि के द्वारा लिखित लेखपत्र का स्मरण दिखानेवाला एक 'स्मृतिपत्र'-फाइल और रसीद रखे। क्योंकि बहुत समय बीतने पर विस्मृति या भ्रम हो जाना मनुष्यों के लिये स्वाभाविक है।
अनुभूतस्य स्मृत्यर्थे लिखितं निर्मितं पुरा ॥ २९८ ॥
यत्नाच्च ब्रह्मणा वाचां वर्ण-स्वर-विचिह्नितम् ।
क्योंकि पुराकाल में ब्रह्माजी ने अनुभव के स्मरणार्थ तथा स्वरों का चिह्न ( अक्षर ) स्वरूप लेख की परिपाटी बनाई थी अर्थात् इसका प्रारम्भ ब्रह्मा जी से हुआ है।
वृत्तलेख्यं तथा चायव्ययलेख्यमिति द्विधा ॥ २९६ ॥
व्यवहारक्रियाभेदादुभयं बहुतां गतम् ।
लेख के दो भेदों का निर्देश—इस लेख के दो भेद हैं—प्रथम—वृत्त ( समाचार ) संबन्धी, द्वितीय—आय-व्यय संबन्धी इनमें प्रत्येक के व्यवहार-संबन्धी क्रियाओं में भेद होने से बहुत से भेद होते हैं।
यथोपन्यस्तसाध्यार्थसंयुक्तं सोत्तरक्रियम् ॥ ३०० ॥
सावधारणकं चैव जयपत्रकमुच्यते ।
जयपत्रक के लक्षण—जिसमें यथायोग्य कहे हुये अभियोग के विषयों का एवं उसके उत्तर में कही हुई बातों का तथा अन्तिम निर्णय का लेख लिखा हो उसे 'जयपत्रक' कहते हैं।
सामन्तेष्वथ भृत्येषु राष्ट्रपालादिकेषु यत् ॥ ३०१ ॥
कार्यमादिश्यते येन तदाज्ञापत्रमुच्यते ।
आज्ञापत्र के लक्षण—जिस लेख द्वारा, सामन्तों ( अधीनवर्त्ती राजाओं ) अथवा राष्ट्रपालादि ( गवर्नर आदि ) भृत्यों को राजा आदेश देता है उसे 'आज्ञापत्र' कहते हैं।
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमन्येष्वभ्यर्चितेषु च ॥ ३०२ ॥
कार्यं निवेद्यते येन पत्रं प्रज्ञापनाय तत् ।
प्रज्ञापनपत्र के लक्षण—ऋत्विक्, पुरोहित तथा आचार्य एवं अन्य भी पूज्य लोगों के लिये जिस लेख के द्वारा राजा कार्य सूचित करता है, उसे 'प्रज्ञापनपत्र' कहते हैं।
सर्वे शृणुत कर्तव्यमाज्ञया मम निश्चितम् ॥ ३०३ ॥
द्वितीयोऽध्यायः [१०३]
स्वहस्तकालसम्पन्नं शासनं पत्रमेव तत्।
शासनपत्र के लक्षण— जिसमें यह लिखा रहता है कि—'हे भृत्यो या प्रजा लोगो ! तुम मेरी बात सुनो और मेरी आज्ञा से निश्चित किये हुये कर्त्तव्य कर्म को करो'—ऐसा अपने हस्ताक्षर से सही किया हुआ एवं समय के उल्लेख से युक्त पत्र 'शासनपत्र' कहलाता है।
देशादिकं यस्य राजा लिखितेन प्रयच्छति ॥ ३०४ ॥
सेवाशौर्यादिभिस्तुष्टः प्रसादलिखितं हि तत् ।
प्रसादलिखित के लक्षण— राजा सेवा और शूरता आदि से प्रसन्न होकर जिस लेख के द्वारा किसी के लिये देश आदि को पुरस्कार रूप में देता है उसे 'प्रसादलिखित' कहते हैं।
भोगपत्रं तु करदीकृतं चोपायनीकृतम् ॥ ३०५ ॥
पुरुषावधिकं तत्त कालावधिकमेव वा ।
भोग-कर-उपायन-पुरुषावधिक और कालावधिक पत्रों के लक्षण— और 'तुम इसका उपभोग करो' यह जिसमें लिख कर दिया जाता है, उसे 'भोगपत्र' कहते हैं। 'इसका यह राजस्व (कर = मालगुजारी) है' यह जिसमें लिखकर दिया जाता है उसे 'करपत्र' एवं उपहार रूप में जो द्रव्य दिया जाता है उसके विषय में जो लेख है उसे 'उपायनपत्र' कहते हैं। 'इस वस्तु का एक, दो या तीन पुरुषों को उपभोग करना चाहिये' यह लिखकर जो दिया जाता है, उसे 'पुरुषावधिक' एवं 'इस वस्तु का इतने समय तक उपभोग करना चाहिये' इस भांति से काल का उल्लेख करके जो दिया जाता है उसे 'कालावधिक' पत्र कहते हैं।
विभक्ता ये च भ्रात्राद्याः स्वरुच्या तु परस्परम् ॥ ३०६ ॥
विभागपत्रं कुर्वन्ति भागलेख्यं तदुच्यते ।
विभागपत्र या भागलेख्य के लक्षण— अपनी इच्छा से परस्पर अलग हुये भाई लोग जो विभाग-सम्बन्धी लेख जिसमें लिखते हैं उसे 'विभागपत्र' अथवा 'भागलेख्य' कहते हैं।
गृहभूम्यादिकं दत्त्वा पत्रं कुर्यात्प्रकाशकम् ॥ ३०७ ॥
अनुच्छेद्यमनाहार्यं दानलेख्यं तदुच्यते।
दानपत्र के लक्षण— किसी को दानरूप में गृहादिक देकर उसके सम्बन्ध में यह लिखे कि 'इसका कोई खण्डन या अपहरण न करे' इस विषय को जनता के समक्ष घोषित करने वालापत्र 'दान पत्र' कहलाता है।
गृहक्षेत्रादिकं क्रीत्वा तुल्यमूल्यप्रमाणयुक् ॥ ३०८ ॥
पत्रं कारयते यत्तु क्रयलेख्यं तदुच्यते।
| १०४ | शुक्रनीतिः |
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**क्रयपत्र के लक्षण—**गृह, क्षेत्र ( खेत ) आदि को योग्य मूल्य और परिमाण के साथ खरीद कर उसके विषय में जो लेख लिखा जाता है उसे 'क्रयपत्र' कहते हैं ।
जङ्गमस्थावरं बन्धं कृत्वा लेख्यं करोति यत् ॥ ३०६ ॥
गोप्यभोग्यक्रियायुक्तं साधिलेख्यं तदुच्यते ।
**साधिलेख्य के लक्षण—**जिसमें जङ्गम ( सोना-चांदी आदि ) और स्थावर ( गृह-भूमि आदि ) को बन्धक रूप में रखकर उसके संबन्ध में यह लिखता है कि—'यह रक्षणीय तथा उपभोग करने योग्य है' उसे 'साधिलेख्य' कहते हैं ।
ग्रामो देशश्च यत्कुर्यात्सत्यलेख्यं परस्परम् ॥ ३१० ॥
राजाविरोधिधर्मार्थं संवित्पत्रं तदुच्यते ।
**संवित्पत्र के लक्षण—**ग्राम तथा नगर के लोग जो परस्पर राजा का अवि-रोधी धर्मरक्षा के लिये प्रतिज्ञाबद्ध होकर लिखते हैं उसे 'संवित्पत्र' कहते हैं ।
वृद्ध्यर्थं धनं गृहीत्वा तु कृतं वा कारितं च यत् ॥ ३११ ॥
ससाक्षिमच्च तत्प्रोक्तमृणलेख्यं मनीषिभिः ।
**ऋणलेख्य के लक्षण—**सूद पर रुपया लेकर साक्षियों के साथ भली-भाँति स्वयं लिखे हुये या लिखाये हुये लेख को पण्डित लोग 'ऋणलेख्य' कहते हैं ।
अभिशापे समुत्तीर्णे प्रायश्चित्ते कृते बुधैः ॥ ३१२ ॥
दत्तं लेख्यं साक्षिमयच्छुद्धिपत्रं तदुच्यते ।
**शुद्धिपत्र के लक्षण—**लगाये हुये अपवाद के प्रमाणित न होने से दूर होने पर, एवं प्रायश्चित्त कर चुकने.पर साक्षी ( गवाही ) लोगों के हस्ताक्षरयुक्त विद्वानों के द्वारा जो लेख लिखकर प्रमाण रूप में दिया जाता है, उसे 'शुद्धिपत्र' कहते हैं ।
मेलयित्वा स्वधनांशान् व्यवहाराय साधकाः ॥ ३१३ ॥
कुर्वन्ति लेखपत्रं यत्तच्च सामयिकं स्मृतम् ।
**सामयिक लेख्यपत्र लक्षण—**मिलकर के ( कम्पनी के रूप में ) व्यवसाय करनेवाले जो लोग हैं वे लोग अपने-अपने हिस्सों के अनुसार धन को उस (व्यवसाय) में लगा कर जो लेखपत्र लिखते हैं, उसको 'सामयिक' लेखपत्र कहते हैं ।
सभ्याधिकारिप्रकृतिसभासद्भिर्न यः कृतः ॥ ३१४ ॥
तत्पत्रं वादिमान्यं चेज्ज्ञेयं संमतिसंज्ञकम् ।
**संमतिसंज्ञक पत्र के लक्षण—**श्रेष्ठ अधिकारी गण या अमात्यादि प्रधान पुरुष अथवा सभासद् ( जूरी ) लोगों ने जो अपने निर्णयों को नहीं प्रदर्शित
द्वितीयोऽध्यायः १०५
द्वितीयोऽध्यायः १०५
किया है वे यदि वादी को मान्य हों तो उसके विषय में लिखे हुये पत्र को 'संमतिसंज्ञक पत्र' कहते हैं।
स्वकीयवृत्त-ज्ञानार्थं लिख्यते यत्परस्परम् ॥ ३१५ ॥
श्रीमंगलपदाढ्यं वा सपूर्वोत्तरपक्षकम् ।
असंदिग्धमगूढार्थं स्पष्टाक्षरपदं सदा ॥ ३१६ ॥
अन्यव्यावर्त्तकस्वात्म-परपित्रादिनामयुक् ।
एक-द्वि-बहुवचनै-र्यथार्ह-स्तुतिसंयुतम् ॥ ३१७ ॥
समामासतदर्द्धार्हनामजात्यादिचिह्नितम् ।
कार्यबोधि सुसम्बन्धं नत्याशीर्वादपूर्वकम् ॥ ३१८ ॥
स्वाम्यसेवकसेव्यार्थं क्षेमपत्रं तु तत्स्मृतम् ।
**क्षेमपत्र के लक्षण—**अपने समाचारों को सूचित करने के लिये सदा श्री तथा मङ्गलसूचकशब्दों से प्रारम्भ करके प्रश्न तथा उत्तरों से युक्त, सन्देहरहित, स्पष्ट अर्थ तथा वांचने योग्य अक्षरों से युक्त शब्दों से भरा हुआ, दूसरे का ग्रहण न हो इसलिये अपने तथा दूसरे के पिता आदि के नामों से युक्त, एक, दो या बहुवचनों से यथायोग्य प्रशंसा से भरे हुये, वर्ष, मास, पक्ष तथा दिन नाम तथा जातिबोधक शब्दों से युक्त, कार्य को सूचित करनेवाला, सुसंगत, नमस्कार ( बड़ों के लिये ) एवं आशीर्वाद ( छोटों के लिये ) पूर्वक, स्वामी तथा सेवक का परस्पर सेवा-संबन्ध को लेकर जो पत्र लिखा जाता है उसे 'क्षेमपत्र' कहते हैं।
एभिरेव गुणैर्युक्तं स्वार्थाधर्षकविबोधकम् ॥ ३१९ ॥
भाषापत्रं तु तज्ज्ञेयमथवा वेदनार्थकम् ।
**वेदनार्थक पत्र के लक्षण—**उपर्युक्त इन्हीं सभी गुणों से युक्त, अपनी पीड़ाओं को व्यक्त करनेवाला जो पत्र होता है उसे 'भाषापत्र' अथवा 'वेदनार्थक पत्र' कहते हैं।
प्रदर्शितं वृत्तलेख्यं-समासाल्लक्षणान्वितम् ॥ ३२० ॥
समासात्कथ्यते चान्यच्छ्रेष्ठायव्ययबोधकम् ।
**आय-व्यय लेख्य के लक्षण—**इस तरह से संक्षेप में अपने-अपने लक्षणों से युक्त प्रथम 'वृत्त लेख्य' के भेदों को प्रदर्शित किया अब द्वितीय 'आय-व्यय-लेख्य' का संक्षेप से वर्णन कर रहे हैं।
व्याप्यव्यापकभेदैश्च मूल्यमानादिभिः पृथक् ॥ ३२१ ॥
विशिष्टसंज्ञितैस्तद्धि यथार्थैर्बहुभेदयुक् ।
**राजाओं के आय-व्ययादिक के लक्षण—**आय-व्यय-लेख्य या पत्र व्याप्य (अल्पविषयक) और व्यापक (बहुविषयक) भेदों से, बहुत या थोड़ा होने से,
१०६ शुक्रनीतिः
पृथक्-पृथक् यथार्थ मूल्य और मान (तौल) आदि से अनेक भेदों से युक्त अनेक प्रकार का) होता है।
वत्सरे वत्सरे वापि मासि मासि दिने दिने ॥ ३२२ ॥
हिरण्यपशुधान्यादि स्वाधीनं त्वायसंज्ञकम् ।
पराधीनं कृतं यत्त व्ययसंज्ञं धनं च तत् ॥ ३२३ ॥
प्रतिवर्ष, प्रतिमास और प्रतिदिन जो सोना, पशु तथा धान्य आदि जो अपने अधीन हो जाता है अर्थात् अपने पास आता है। वह 'आय' कहलाता है। और जो सोना आदि धन दूसरे के आधीन कर दिया (दे दिया) जाता है वह 'व्यय' कहलाता है।
सद्यस्कश्चैव प्राचीन आयः सञ्चितसंज्ञकः ।
व्ययो द्विधा चोपभुक्तस्तथा विनिमयात्मकः ॥ ३२४ ॥
आय के भेद— और आय दो प्रकार का होता है, एक तात्कालिक दूसरा प्राचीन, जिसे 'संचित' भी कहते हैं। एवं व्यय भी दो प्रकार का होता है, एक उपभुक्त (उपभोग किया हुआ), दूसरा विनिमयात्मक (किसी वस्तु के बदले के रूप में दिया हुआ)।
निश्चितअन्यस्वामिकञ्चानिश्चितस्वामिकन्तथा ।
स्वस्वत्वनिश्चितं चेति त्रिविधं सञ्चितं मतम् ॥ ३२५ ॥
संचित आय के भेद— सञ्चित आय तीन प्रकार का होता है। एक निश्चितअन्यस्वामिक (जिसका दूसरा कोई स्वामी निश्चित है), दूसरा-अनिश्चितस्वामिक (जिसके स्वामी का निश्चय नहीं है), तीसरा स्व-स्वत्वनिश्चित (अपना स्वत्व जिस पर निश्चित है अर्थात् निजी) संज्ञक सञ्चित आय है।
निश्चितअन्यस्वामिकं यद्धनं तु त्रिविधं हि तत् ।
औपनिध्यं याचितकमौत्तमर्णिकमेव च ॥ ३२६ ॥
निश्चितअन्यस्वामिक संचित धन के भेद— इसमें प्रथम जो निश्चितअन्यस्वामिक संचित धन है, वह तीन प्रकार का है उसमें पहला औपनिध्य, दूसरा याचितक तीसरा औत्तमर्णिक है।
विस्रम्भान्निहितं सद्भिर्र्यदौपनिधिकं हि तत् ।
अवृद्धिकं गृहीतान्यालङ्कारादि च याचितम् ॥ ३२७ ॥
सवृद्धिकं गृहीतं यदृण तच्चौत्तमर्णिकम् ।
औपनिध्य-याचित-औत्तमर्णिक के लक्षण— जो धन किसी सज्जन द्वारा विश्वास मानकर किसी के पास रखा जाता है वह 'औपनिधिक' (औपनिध्य) कहलाता है। जो बिना सूद का दूसरे से अलङ्कार आदि (रुपया आदि) लिया जाता है वह 'याचित' कहलाता है। और जो सूद पर ऋण लिया जाता है वह 'औत्तमर्णिक' कहलाता है।
द्वितीयोऽध्यायः १०७
द्वितीयोऽध्यायः १०७
निध्यादिकं च मार्गादौ प्राप्तमज्ञातस्वामिकम् ॥ ३२८ ॥
अज्ञातस्वामिक के लक्षण— और जो मार्ग आदि में किसी का भूल से छूट गया, गिरा हुआ किंवा कहीं पर गड़ा हुआ निध्यादि धन मिल जाता है वह 'अज्ञातस्वामिक' अर्थात् 'अनिश्चितस्वामिक' कहलाता है ।
साहजिकं चाधिकं च द्विधा स्वत्वविनिश्चितम् ।
स्वत्वविनिश्चित के भेद— और स्वत्वविनिश्चितअर्थात् स्वस्वत्वनिश्चित किंवा निश्चितस्वस्वत्व धन दो प्रकार का होता है प्रथम साहजिक, द्वितीय अधिक कहलाता है ।
उत्पद्यते यो नियतो दिने मासि च वत्सरे ॥ ३२९ ॥
आयः साहजिकः सैव दायाद्यश्च स्ववृत्तितः ।
साहजिक के लक्षण— इनमें जो धन का आय दाय ( पैत्रिक संपत्ति में से अपने हिस्से ) या वृत्ति ( व्यवसाय आदि ) के द्वारा निश्चित रूप से दिन, मास अथवा वर्ष भर में होता है वह 'साहजिक' कहलाता है ।
दायः परिग्रहो यस्तु प्रकृष्टं तत्स्वभावजम् ॥ ३३० ॥
और दाय ( पैत्रिक धन ) एवं परिग्रह ( दान लेने ) से जो आय होता है वह बिना क्लेश के मिलने से उत्तम स्वभावज ( साहजिक ) कहलाता है ।
मौल्याधिक्यं कुसीदं च गृहीतं याजनादिभिः ।
पारितोष्यं भृतिप्राप्तं विजिताद्यं धनं च यत् ॥ ३३१ ॥
स्वस्वत्वेऽधिकसंज्ञं तदन्यत्साहजिकं स्मृतम् ।
अधिक के लक्षण— जो उचित मूल्य से अधिक रूप में या सूद रूप में किंवा यज्ञ आदि कराने से प्राप्त हुआ एवं पारितोषिक ( इनाम ) या वेतन किंवा युद्ध आदि के द्वारा जीत रूप में प्राप्त हुआ धन है वह अपने स्वत्व से अधिक होने से 'अधिक' संज्ञक कहलाता है । इससे अन्य रीति से जो धन प्राप्त होता है वह 'साहजिक' कहलाता है ।
पूर्ववत्सरशेषं च वर्तमानोब्दसम्भवम् ॥ ३३२ ॥
स्वाधीनं सञ्चितं द्वेधा धनं सर्वं प्रकीर्तितम् ।
संचित धन के लक्षण— स्वाधीन संचित सम्पूर्ण धन दो प्रकार का होता है प्रथम-पूर्व वर्ष का शेष, और वर्त्तमान वर्ष का संचित धन है ।
द्वेधाधिकं साहजिकं पार्थिवेतरभेदतः ॥ ३३३ ॥
भूमिभागसमुद्भूत आयः पार्थिव उच्यते ।
संचित धन के भेद— अधिक और साहजिक भेद से पूर्वोक्त दो प्रकार के जो आय हैं वे प्रत्येक पार्थिव ( स्थावर ) तथा इतर ( जङ्गम = चल ) भेद
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से दो प्रकार के हैं। इनमें से पार्थिव आय वह कहलाता है जो भूमि के भागों से उत्पन्न हो ।
स देवकृत्रिमजलैर्देशग्रामपुरैः पृथक् ॥ ३३४ ॥
बहुमध्याल्पफलतो भिद्यते भूविभागतः ।
**पार्थिव संज्ञक आय के भेद—**उस पार्थिवसंज्ञक आय के देवालयों, कृत्रिम ( कल्पित ) वस्तुओं, जल, देश, ग्राम तथा पुरों से पृथक्-पृथक् विभिन्न हुये भूमि-संबन्धी विभागों से एवं बहुत ( अधिक ), मध्यम तथा अल्प फलों से अनेक भेद होते हैं ।
शुल्कदण्डाकरकरभाटकोपायनादिभिः ॥ ३३५ ॥
इतरः कीर्त्तितस्तज्ज्ञैरायो लेखविशारदैः ।
**चल संज्ञक आय के लक्षण—**और व्यवसायी आदि लोगों से प्राप्त होने वाले शुल्क ( चुंगी-टैक्स ), दण्ड ( जुर्माना ), खान, कर ( मालगुजारी ), भाटक ( भाड़ा ), उपायन ( नजर-भेंट ), इत्यादि से होनेवाले आय को आय का ज्ञान रखनेवाले एवं लिखने में ( हिसाब लिखने में ) चतुर लोगों ने इतर अर्थात् चल-संज्ञक कहा है ।
यन्निमित्तो भवेदायो व्ययस्तन्नामपूर्वकः ॥ ३३६ ॥
व्ययश्चैव समुद्दिष्टो व्याप्यव्यापकसंयुतः ।
**विभागानुसार आय-व्यय के व्याप्य-व्यापक का निर्देश—**जिस निमित्त ( विभाग ) से जो आय होता है व्यय भी उसी निमित्त ( विभाग ) के नाम में होता है । अर्थात् जिस विभाग में आय होता है उस विभाग में व्यय भी होता है। और आय की भांति व्यय भी व्याप्य-व्यापक से युक्त है अर्थात् स्वल्प तथा बहुविषयक कहा हुआ है ।
पुनरावर्तकः स्वत्वनिवर्त्तक इति द्विधा ॥ ३३७ ॥
व्ययो यन्निध्युपनिधीकृतो विनिमयीकृतः ।
सकुसीदाकुसीदाधमर्णिकश्चावृत्तः स्मृतः ॥ ३३८ ॥
**व्यय के भेदों एवं पुनरावर्त्तक के लक्षण—**वह व्यय दो प्रकार का होता है, एक-पुनरावर्त्तक ( फिर लौटकर आनेवाला ), दूसरा स्वत्वनिवर्त्तक ( देने वाले के स्वत्व को निवृत्त करनेवाला ) कहलाता है । जो व्यय निधि, उपनिधि या विनिमय रूप में हुआ है एवं सूद-सहित या बिना सूद का इस भांति से दो प्रकार का आधमर्णिक ये सब आवृत्त ( पुनरावर्त्तक ) संज्ञक कहलाते हैं ।
निधिर्भूमौ विनिहितोऽन्यस्मिन्तुपनिधिः स्थितः ।
दत्तमूल्यादिसंप्राप्तः स वै विनिमयीकृतः ॥ ३३६ ॥
वृद्ध्याऽवृद्ध्या च यो दत्तः स वै स्यादाधमर्णिकः ।
द्वितीयोऽध्यायः [१०६]
सवृद्धिकमृणं दत्तमकुसीदं तु याचितम् ॥ ३४० ॥
निधि, उपनिधि आदि व्यय के लक्षण— निधि (निधीकृत) व्यय उसे कहते हैं जो पृथ्वी में गाड़ दिया जाता है, इसको अत्यन्त कष्ट पड़ने पर भी ग्रहण नहीं किया जाता है—अतः यह भी एक प्रकार का व्यय ही है। उप-निधि (उपनिधीकृत) व्यय वह है जो दूसरे के पास रखा हुआ है। विनिमयीकृत व्यय उसे कहते हैं जो दिये हुये मूल्यादि से बदले में मिला हुआ है। सूद पर या बिना सूद के जो दिया गया है उसे आधमर्णिक व्यय कहते हैं। इसमें सूद पर जो दिया जाता है उसे ऋण और बिना सूद के जो दिया जाता है उसे याचित (हथ-उधार) कहते हैं।
स्वत्वनिवर्त्तको द्वेधा त्वैहिकः पारलौकिकः ।
स्वत्वनिवर्त्तक के भेद— स्वत्वनिवर्त्तक व्यय दो प्रकार का होता है प्रथम—ऐहिक, द्वितीय—पारलौकिक।
प्रतिदानं परितोष्यं वेतनं भोग्यमैहिकः ॥ ३४१ ॥
चतुर्विधस्तथा पारलौकिकोऽनन्तभेदभाक् ।
शेषं संयोजयेन्नित्यं पुनरावर्तको व्ययः ॥ ३४२ ॥
ऐहिक तथा पारलौकिक व्यय के भेद— उसमें प्रतिदान, परितोष्य वेतन और भोग्य रूप से ऐहिक के ४ भेद होते हैं। और पारलौकिक के अनन्त भेद होते हैं। जो नित्य शेष को रोकड़ में मिलाया जाता है वह भी पुनरावर्त्तक व्यय कहलाता है।
मूल्यत्वेन च यद्दत्तं प्रतिदानं स्मृतं हि तत् ।
सेवाशौर्यादिसंतुष्टैर्दत्तं तत्पारितोषिकम् ॥ ३४३ ॥
भृतिरूपेण संदत्तं वेतनं तत् प्रकीर्तितम् ।
प्रतिदान, पारितोषिक और वेतन व्यय के लक्षण— मूल्य रूप में जो दिया जाता है उसे 'प्रतिदान' कहते हैं। सेवा तथा शूरता आदि से प्रसन्न होकर जो दिया जाता है, उसे 'पारितोषिक' (परितोष्य) कहते हैं। भरण-पोषणार्थ जो भृत्यों को दिया जाता है उसे 'वेतन' कहते हैं।
धान्यवस्त्रगृहाराम-गोगजादिरथार्थकम् ॥ ३४४ ॥
विद्याराज्याद्यर्जनार्थं धनाप्त्यर्थं तथैव च ।
व्ययीकृतं रक्षणार्थमुपभोग्यं तदुच्यते ॥ ३४५ ॥
उपभोग्य के लक्षण— धान्य, वस्त्र, गृह, बगीचा, गो, गज आदि तथा रथ के लिये एवं विद्या तथा राज्य आदि के उपार्जन के लिये और धन आदि की प्राप्ति के लिये एवं इन सबों की रक्षा के लिये जो व्यय किया जाता है उसे 'उपभोग्य' कहते हैं।
| ११० | शुक्रनीतिः |
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सुवर्णरत्नरजतनिष्क्शालास्तथैव च ।
रथाश्वगोगजोष्ट्राजावीनशालाः पृथक् पृथक् ॥ ३४६ ॥
वाद्यशास्त्रास्त्रवस्त्राणां धान्यसम्भारयोस्तथा ।
मन्त्रिशिल्पनाट्यवैद्यमृगाणां पाकपक्षिणाम् ॥ ३४७ ॥
शाला भोग्ये निविष्टास्तु तद्व्ययो भोग्य उच्यते ।
**भोग्य व्यय के लक्षण—**सोना, रत्न, चांदी, निष्क (मोहर-स्वर्ण मुद्रा) रखने के जो स्थान हैं एवं रथ, घोड़े, गौ, गज, ऊंट, बकरे, मेडे आदि के तथा इनके अध्यक्षों के लिये पृथक्-पृथक् बने हुये जो स्थान (गृह) हैं। और वाद्य (बाजे), शस्त्र, अस्त्र, धान्य, संभार (नाना प्रकार की सामग्री) रखने के लिये जो स्थान हैं तथा मन्त्री, शिल्प, नाट्य (नाटक-संबन्धी), वैद्य, मृग, पाक, पक्षी इनके लिये जो स्थान हैं, उन सबों की गणना भोग्य के अन्दर है अतः इन सबों के संबन्ध में होनेवाले व्यय को भी 'भोग्य' कहते हैं।
जपहोमार्चनैर्दानैश्चतुर्धा पारलौकिकः ॥ ३४८ ॥
पुनर्यातो निवृत्तश्च विशेषायायव्ययौ च तौ।
आवर्तको निवर्ती च व्ययायौ तु पृथग्विधा ॥ ३४९ ॥
**पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण—**जप, होम, पूजन तथा दान भेद से पारलौकिक व्यय के मुख्य चार भेद होते हैं। और जो आय आकर पुनः जानेवाला हो उसे विशेष आय एवं जो व्यय जाकर पुनः आनेवाला हो उसे विशेष व्यय कहते हैं। अतः व्यय तथा आय ये दोनों पृथक् २ आवर्त्तक (वापस आनेवाले) निवर्ती (नहीं वापस आनेवाले) भेदों से दो २ प्रकार के होते हैं ।।
आवर्तकविहीनौ तु व्ययायौ लेखको लिखेत् ।
**आय-व्यय-लेखक के कर्तव्य—**लेखक वापस आनेवाले और वापस न आनेवाले व्यय तथा आयको लिखे।
क्रयाधमर्णघटनान्यस्थलाप्तो विवर्तकः ॥ ३५० ॥
द्रव्यं लिखित्वा दद्यात्तु गृहीत्वा विलिखेत्स्वयम् ।
क्रय (खरीदना), अधमर्ण की घटनाओं (ऋणादि व्यवहारों) एवं अन्य विषयों में विश्वासपात्र लेखक स्वयं द्रव्य लिखकर तब देवे या लेवे।
हीयते वर्धते नैवमायव्ययविलेखकः ॥ ३५१ ॥
इस प्रकार से आय-व्यय के लिखनेवाले का लिखा आय तथा व्यय न कम होता है और न बढ़ता है।
हेतुप्रमाणसम्बन्धकार्याङ्गव्याप्यव्यापकैः ।
आयाश्च बहुधा भिन्ना व्ययाः शेषं पृथक् पृथक् ॥ ३५२ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । १११
मानेन संख्यया चैवोन्मानेन परिमाणकैः ।
अवशिष्ट आय के विविध भेद— अवशिष्ट आय और पृथक् २ कारण, प्रमाण, संबन्ध (संयोग), कार्याङ्ग (कार्यों के अवान्तर व्यापार), व्याप्य (थोड़े विषय), व्यापक (बहुत विषय), मान, संख्या, उन्मान और परिमाण इन सबों के द्वारा बहुत प्रकार से भिन्न २ होते हैं।
क्वचित्संख्या क्वचिन्मानमुन्मानं परिमाणकम् ॥ ३५३ ॥
समाहारः क्वचिच्चेष्टो व्यवहारार्य तद्विदाम् ।
किसी प्रदेश में मानादि का ज्ञान रखनेवाले लोगों को व्यवहार के लिये संख्या, कहीं पर मान, कहीं पर उन्मान, कहीं पर परिमाण और कहीं पर समाहार (संख्यादियों का समुदाय) अभीष्ट होता है।
अङ्गुलाद्यं स्मृतं मानमुन्मानं तु तुला स्मृता ॥ ३५४ ॥
परिमाणं पात्रमानं संख्यैकद्व्यादिसंज्ञिका ।
मान-उन्मान-परिमाण संख्या के लक्षण— अंगुलि या हाथ आदि से जो नापा जाता है उसे 'उन्मान' और काठ आदि के बने पात्रों से जो नापा जाता है उसे 'परिमाण' एवं एक, दो, तीन आदि गिनती को 'संख्या' कहते हैं।
यत्र यादृग् व्यवहारस्तत्र तादृक्प्रकल्पयेत् ॥ ३५५ ॥
जहाँ पर जैसा व्यवहार हो वहाँ पर वैसा व्यवहार राजा को कराना चाहिये।
रजतस्वर्णताम्रादि व्यवहारार्थमुद्रितम् ।
व्यवहार्य वराटाद्यं रत्नान्तं द्रव्यमीरितम् ॥ ३५६ ॥
सपशुधान्यवस्त्रादि-तृणान्तं धनसंज्ञकम् ।
लोकव्यवहारार्थं द्रव्य तथा धन के लक्षण— लोकव्यवहार के लिये ढाले गये चांदी, सोना एवं तांबे के सिक्कों का व्यवहार प्रजाओं को करना चाहिये। कौड़ी से लेकर रत्न-पर्यन्त की संज्ञा 'द्रव्य' है। पशु, धान्य, वस्त्र से लेकर तृण पर्यन्त की संज्ञा 'धन' है।
व्यवहारे चाधिकृतं स्वर्णाद्यं मूल्य तामियात् ॥ ३५७ ॥
व्यवहार के लिये राजा द्वारा निश्चित स्वर्णादि मुद्रायें प्रत्येक वस्तु की मूल्य समझी जाती हैं।
कारणादिसमायोगात्पदार्थस्तु भवेद् भुवि ।
येन व्ययेन संसिद्धस्तद्व्ययस्तस्य मूल्यकम् ॥ ३५८ ॥
मूल्य की परिभाषा— संसार में कारण आदि के संयोग होने से जो पदार्थ जितने व्यय में सिद्ध होता है उतना व्यय उसका मूल्य होता है।
सुलभासुलभत्वाच्चागुणत्वगुणसंश्रयैः ।
११२ | शुक्रनीतिः
यथाकामात्पदार्थानामर्घं हीनाधिकं भवेत् ॥ ३५९ ॥
मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश— पदार्थों की सुलभता या दुर्लभता से किंवा अच्छा या बुरा होने से (तारतम्यानुसार) उनका मूल्य विक्रेता के इच्छानुसार अधिक या कम होता है।
न हीनं मणिधातूनां क्वचिन्मूल्यं प्रकल्पयेत् ।
मूल्यहानिस्तु चैतेषां राजदौष्ट्येन जायते ॥ ३६० ॥
किसी प्रदेश में भी राजा मणियों तथा सोना, चांदी आदि धातुओं का मूल्य थोड़ा न रखे । इन सबों के मूल्य में कमी जब होती है तब राजा की दुष्टता से न कि प्रजा की ।
दीर्घे चतुर्भागभूतपत्रे तिर्यग्गतावलिः ।
त्र्यंशगाभ्यन्तरगता चार्धगा पादगापि वा ॥ ३६१ ॥
कार्या व्यापकव्याप्यानां लेखने पदसंज्ञिका ।
पत्रलेखन प्रकार— थोड़ा या ज्यादा विषयों के अनुसार लेख लिखने के लिये प्रशस्त पत्र (कागज) के ऊपर चार भाग करने पर उसमें से ३ भाग के अन्दर या आधे भाग किंवा चौथाई भाग के अन्दर आड़ी लकीरों की पंक्ति बनाकर पदों (अक्षरों) को लिखना चाहिये ।
श्रेष्ठाभ्यन्तरगा तासु वामतस्त्र्यंशगाऽप्यनु ॥ ३६२ ॥
दक्षत्र्यंशगता चानु ह्यर्धगा पादगा ततः ।
उक्त ३ प्रकार की पदावलियों में जो पत्र के अन्दर वामभाग से शुरू होकर तीन भाग में लिखी होती है वह श्रेष्ठ है। और दक्षिण से वामभाग की ओर तीन भाग तक लिखी होती है वह उसकी अपेक्षा हीन है। अर्द्धांश में लिखी हुई उससे भी हीन, इसके बाद चतुर्थांश में लिखी हुई सबसे हीन है ।
स्वभ्यन्तरे स्वभेदाः स्युः सदृशाः सदृशे पदे ॥ ३६३ ॥
स्वारम्भपूर्तिसदृशे पत्रे स्तः सदैव हि ।
लाइनों की दूरी परस्पर समान भाव से होने से सब एक सी हों और उनमें अक्षर भी समान हों । अर्थात् जो समान पद हों उनमें सर्वत्र अक्षर समान लिखे जांय । और आरम्भ किये गये विषयों की पूर्ति के अनुरूप पत्र हों एवं उनमें अक्षर और लाइनें उसी के अनुसार अंकित हों ।
राजा स्वलेख्यचिह्नं तु यथाभिलषितं तथा ॥ ३६४ ॥
लेखानुपूर्वं कुर्याद्धि दृष्ट्वा लेख्यं विचार्य च ।
राजा लेख को देखकर उसके बाद विचार कर लेखानुसार जो उचित प्रतीत हो उसे इच्छानुकूल अपने लेख से अङ्कित कर देवे अर्थात् लिख देवे ।
द्वितीयोऽध्यायः [११९]
मंत्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसंज्ञकः ॥ ३६५ ॥
स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ।
मन्त्री, विचारपति, पण्डित और दूत आदि ये सब प्रथम राजा को दिखाने के लिये 'यह लेख मुझे अभिमत है' ऐसा लिखें ।
अमात्यः साधु लिखनमस्त्येतत्प्राग् लिखेदयम् ॥ ३६६ ॥
सम्यग्विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ।
इनमें से जो अमात्य है वह 'यह लेख अच्छा है' ऐसा पत्र में प्रथम लिखे । उसके बाद सुमन्त्र 'मैंने इस पर भली-भांति विचार किया है' ऐसा लिखे ।
सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत्स्वयम् ॥ ३६७ ॥
अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् ।
और 'प्रधान' 'यह वस्तुतः यथार्थ है' यह स्वयं लिखे उसके बाद प्रतिनिधि 'यह अङ्गीकार करने योग्य है' ऐसा लिखे ।
अङ्गीकर्तव्यमिति च युवराजो लिखेत्स्वयम् ॥ ३६८ ॥
लेख्यं स्वाभिमतं चैतद्विलिखेच्च पुरोहितः ।
उसके बाद युवराज 'इसे अङ्गीकार करना चाहिये' ऐसा स्वयं लिखे । और 'पुरोहित' 'यह लेख मुझे अभिमत है' ऐसा लिखे ।
स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युुरेव हि ॥ ३६९ ॥
अङ्गीकृतमिति लिखेन्मुद्रयेच्च ततो नृपः ।
**सब लेखों पर स्व-स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश—**और मन्त्री आदियों को लेख के अन्त में अपनी २ मुहर लगा देनी चाहिये । और अन्त में राजा भी 'यह अङ्गीकृत है' ऐसा लिखे और उस पर अपनी मुहर कर दे ।
कार्यान्तरस्याकुलत्वात्सम्यग्द्रष्टुं न शक्यते ॥ ३७० ॥
युवराजादिभिर्लेख्यं तदनेन च दर्शितम् ।
युवराज आदि को कार्यान्तर में (दूसरे २ कार्यों में) व्यस्तचित्त होने से अच्छी तरह से लेख के संपूर्ण विषयों को न देख सकने से 'इस आदमी ने जो दिखाया उस पर मैंने अच्छी तरह से विचार किया' यह भी मन्त्री आदि को लिखना चाहिये ।
समुद्द्रं विलिखेयुर्वै सर्वे मन्त्रिगणास्ततः ॥ ३७१ ॥
राजा दृष्टमिति लिखेद् द्राक् सम्यग्दर्शनाक्षमः ।
सभी मन्त्री लोगों को सभी लेखों पर मुहर से अङ्कित करके अपना २ हस्ताक्षर करना चाहिये और भली-भांति से देखने में असमर्थ राजा शीघ्र उन सब लेखों पर 'मैंने देखा' यह लिख दे क्योंकि उसका मन्त्री आदि के लेखों पर पूर्ण विश्वास रहता है ।
८ शु०
११४ | शुक्रनीतिः
आयमादौ लिखेत्सम्यग् व्ययं पश्चात्तथागतम् ॥ ३७२ ॥
वामे चायं व्ययं दक्षे पत्रभागे च लेखयेत् ।
पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार— बही खाते पर पहले सम्पूर्ण आय ( आमदनी ) लिखे पीछे जो व्यय हुआ हो उसे लिखे । और बही के बाईं ही ओर आय और दाहिनी ओर व्यय लिखे ।
यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ वामोर्ध्वभागगौ क्रमात् ॥ ३७३ ॥
आधाराधेयरूपौ वा कालार्थं गणितं हि तत् ।
जहां पर आय तथा व्यय ये दोनों अधिक या अल्प अथवा आश्रय तथा आश्रयी रूप से हों वहां पर उन दोनों को बही के वाम भाग में यथाक्रम ऊपर की ओर रखना चाहिये । ऐसी व्यवस्था नियम के लिये है ।
अधोधश्च क्रमात्तत्र व्यापकं वामतो लिखेत् ॥ ३७४ ॥
व्याप्यानां मूल्यमानादि तत्पंक्त्यां विनिवेशयेत् ।
उसमें व्यापक को वामभाग में क्रम से नीचे-नीचे लिखे । और व्याप्यों का मूल्य और मानादि उन्हीं की पंक्ति में लिखे ।
ऊर्ध्वगानां तु गणितमधः पंक्त्यां प्रजायते ॥ ३७५ ॥
यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ व्यापकत्वेन संस्थितौ ।
जहां पर वे दोनों व्यापक और व्याप्य बहुसंख्यक हों वहाँ पर ऊपरवालों की गणना नीचे की पंक्ति में होती है ।
व्यापकं बहुवृत्तित्वं व्याप्यं स्यान्न्यूनवृत्तिकम् ॥ ३७६ ॥
व्याप्याश्चावयवाः प्रोक्ता व्यापकोऽवयवी स्मृतः ।
व्यापक-व्याप्य के लक्षण— बहुत स्थलों पर रहनेवालों को 'व्यापक' कम स्थलों पर रहनेवालों को 'व्याप्य' कहते हैं । और व्याप्य अवयव ( अङ्ग ) एवं व्यापक ( अवयवी ) कहलाते हैं ।
सजातीनां च लिखनं कुर्याच्च समुदायतः ॥ ३७७ ॥
यथाप्राप्तं तु लिखनमाद्यन्तसमुदायतः ।
समान जातिवाले विषयों का समुदाय रूप से एक स्थान पर ही लिखना उचित होता है । और नाना प्रकार के विषयों का जहां जैसा मौका हो वहीं उसके अनुसार आदि, अन्त और सर्वत्र लिखना उचित है ।
व्यापकाश्च पदार्था वा यत्र संति स्थलानि हि ॥ ३७८ ॥
व्याप्यमायव्ययं तत्र कुर्यात्कालेन सर्वदा ।
जहां पर पदार्थ व्यापक ( बहुत) हों एवं स्थल भी बहुत हों वहां सर्वदा आय-व्यय को काल से व्याप्य कर लेना चाहिये ।
स्थानटिप्पनिका चैषा ततोऽन्यत् संघटिप्पनम् ॥ ३७९ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ११५
विशिष्टसंज्ञितं तत्र व्यापकं लेख्यभाषितम् ।
स्थान-टिप्पणादि के भेद— यह स्थान-संबन्धी विवरण अन्य है और वस्तु-समूहसंबन्धी विवरण इससे अन्य है, उसमें लेखोक्त व्यापक की संज्ञा विशिष्ट है ।
आयाः कति व्ययाः कस्य शेषं द्रव्यस्य चास्ति वै ॥ ३८० ॥
विशिष्टसंज्ञकैरेषां संविज्ञानं प्रजायते ।
आय कितने हैं और व्यय कितने हैं और किस द्रव्य का कितना शेष है ? इन सबों का भली-भांति ज्ञान विशिष्टसंज्ञक पूर्वोक्त व्यापक लेख विशेष से होता है ।
आदौ लेख्यं यथा प्राप्तं पश्चात्तद्गणितं लिखेत् ॥ ३८१ ॥
यथा द्रव्यं च स्थानं चाधिकसंज्ञं च टिप्पणैः ।
पहले जो वस्तु जिस तरह से प्राप्त हो उसे लिखे उसके पश्चात् उसकी संख्या लिखनी चाहिये । उसके बाद विवरण के साथ जैसा द्रव्य, स्थान तथा अधिकसंज्ञक हो उसे लिखे ।
शेषायाव्ययविज्ञानं क्रमाल्लेख्यैः प्रजायते ॥ ३८२ ॥
स्थलायव्ययविज्ञानं व्यापकं स्थलतो भवेत् ।
शेषायाव्यय-स्थलायव्ययज्ञान— अवशिष्ट आय तथा व्यय का पूर्ण ज्ञान बहियों से होता है । और बहुत स्थानों के आय-व्यय का पूर्ण ज्ञान स्थानों के ज्ञान से ही हो जाता है ।
पदार्थस्य स्थलानि स्युः पदार्थाश्च स्थलस्य तु ॥ ३८३ ॥
व्याप्यास्तिष्ठन्त्यथैतेषां यथेष्टं लेखने नृणाम् ।
टिप्प्यादि लिखने का निर्देश— स्थल पदार्थके एवं पदार्थ स्थल के व्याप्य होते हैं। मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार लिखने में टिप्प्यादि रखनी चाहिये ।
निश्चितान्यस्वामिकाद्या आया ये इतरान्तगाः ॥ ३८४ ॥
विशिष्टसंज्ञका ये च पुनरावर्तकादयः ।
व्ययाश्च परलेखान्ता अन्तिमव्यापकाश्च ते ॥ ३८५ ॥
पूर्वोक्त निश्चितान्यस्वामिक (निश्चित है अन्य स्वामी जिसका) से लेकर इतर (पार्थिव से भिन्न-जङ्गम-शुल्कादि) तक जितने आय हैं और विशिष्टसंज्ञक जो पुनरावर्तकादि व्यय हैं वे सब दूसरों के लेख हैं अन्त में जिसके ऐसे एवं अन्तिम व्यापकवाले (बहुत शेषवाले) हैं।
इच्छया ताडितं कृत्वादौ प्रमाणफलं ततः ।
प्रमाणभक्तं तल्लब्धं भवेदिच्छाफलं नृणाम् ॥ ३८६ ॥
पहले प्रमाण फल (सिद्धवस्तु) को इच्छा (साध्यवस्तु) से गुणित
११६ | शुक्रनीतिः
करके प्रमाण से भाग करने पर जो लब्धि हो उसे मनुष्यों का इच्छा-फल कहते हैं ।
समासतो लेख्यमुक्तं सर्वेषां स्मृतिसाधनम् ।
इस प्रकार से संक्षेप से सभी विषयों की स्मृति का साधन (कारण) लेख्य (बही या पत्र) का वर्णन किया गया ।
गुञ्जा माषस्तथा कर्षः पदार्धः प्रस्थ एव हि ॥ ३८७ ॥
यथोत्तरा दशगुणाः पञ्च प्रस्थस्य चाढकः ।
ततश्चाष्टाढकः प्रोक्तो ह्यर्मणस्ते तु विंशतिः ॥ ३८८ ॥
खारिका स्याद्विद्यते तद् देशे देशे प्रमाणकम् ।
**गुञ्जादिकों का लक्षण—**गुञ्जा (रत्ती), माष (माशा), कर्ष (एक रुपया भर), पदार्द्ध, प्रस्थ ये सब उत्तरोत्तर क्रम से दशगुने होते हैं अर्थात् १० गुञ्जाओं का १ माष, १० माषों का १ कर्ष, १० कर्षों का १ पदार्द्ध, १० पदार्द्धों का १ प्रस्थ होता है । ५ प्रस्थों का १ आढक, १० आढकों का १ अर्मण, २० अर्मणों का १ खारिका (खारी) होती है । देश-भेद से ये परिमाणों में भिन्नतायें होती हैं ।
पञ्चाङ्गुलाबटं पात्रं चतुरङ्गुलविस्तृतम् ॥ ३८९ ॥
प्रस्थपादं तु तज्ज्ञेयं परिमाणे सदा बुधैः ।
**प्रस्थपाद का लक्षण—**५ अङ्गुल गहरा, ४ अङ्गुल चौड़ा जो पात्र होता है, उसे पण्डित लोग सदा नापने में 'प्रस्थपाद' कहते हैं। इसी को लोक में 'माना' भी कहते हैं ।
ऊर्ध्वांकश्च यथासंज्ञस्त्वधस्थाश्च वामगाः ॥ ३९० ॥
क्रमात्स्वदशगुणिताः परार्द्धान्ताः प्रकीर्त्तिताः ।
**संख्या का प्रमाण—**संज्ञानुसार ऊपर लिखे हुये अङ्क के नीचे बाईं ओर एक २ इकाई क्रम से बढ़ाने पर अपने से दशगुणी अधिक परार्द्ध पर्यन्त अङ्कों की गिनती होती है ।
न कर्तुं शक्यते संख्यासंज्ञा कालस्य दुर्गमात् ॥ ३९१ ॥
ब्रह्मणो द्विपरार्धं तु आयुरुक्तं मनीषिभिः ।
**संख्या की अनन्तता—**काल की समाप्ति होना असंभव है अतः संख्या की संज्ञा परार्द्ध से अधिक नहीं हो सकती है। और विद्वानों ने ब्रह्मा की आयु का प्रमाण दो परार्द्ध तक कहा है क्योंकि परार्द्ध से अतिरिक्त संख्या की संज्ञा नहीं है ।
एको दश शतं चैव सहस्रं चायुतं क्रमात् ॥ ३९२ ॥
नियुतं प्रयुतं कोटिरर्बुदं चाब्जखर्वकौ ।
द्वितीयोऽध्यायः ११८
द्वितीयोऽध्यायः ११८
निखर्वपद्मशङ्खाब्धि-मध्यमान्तपरार्धकाः ॥ ३६३ ॥
एकादि-परार्ध तक संख्याओं के नाम—एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, पद्म, शङ्ख, अब्धि, मध्य, अन्त, परार्द्ध ये सब संख्याओं की संज्ञायें हैं।
कालमानं त्रिधा ज्ञेयं चान्द्रं सौरं च सावनम्।
भृतिदाने सदा सौरं चान्द्रं कौसीदवृद्विषु ॥ ३६४ ॥
कल्पयेत्सावनं नित्यं दिनभृत्येष्ववधौ सदा।
कालमान का त्रैविध्य एवं चान्द्रादिकों की व्यवस्था—चान्द्र (चन्द्र की वृद्धि-क्रम से शुक्ल १ प्रतिपदा से अमावस्या ३० पर्यन्त) मास, सौर (एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति पर्यन्त), सावन (जिस दिन से कोई कार्य आरम्भ किया जाता है और जिस दिन समाप्त होता है वहाँ तक दिन की संख्या के अनुसार गणना करना—इसमें पूरे ३० दिन का १ मास होता है) इन भेदों से काल मान ३ प्रकार का होता है। वेतन देने में सदा सौर मान का, ऋण-व्यवहार में नित्य चान्द्रमान का एवं दैनिक मजदूरों को मजदूरी देने और अवधि (इतने दिन तक कार्य करो ऐसी अवधि) में सदा सावन मान का व्यवहार करना चाहिये।
कार्यमाना कालमाना कार्यकालामित्रिधा ॥ ३९५ ॥
भृतिरुक्ता तु तद्विज्ञैः सा देया भाषिता यथा।
भृति के ३ प्रकारों का निर्देश—कार्यमाना (कार्य के परिमाण के अनुसार दी जानेवाली), कालमाना (काल के परिमाण के अनुसार दी जानेवाली), कार्यकालमिति (कार्य तथा काल के प्रमाणानुसार दी जानेवाली) इन भेदों से भृति (मजदूरी या वेतन) ३ प्रकार की पण्डितों ने कही है। जैसी कही है वैसी हिसाब करके भृति देनी चाहिये।
अयं भारस्त्वया तत्र स्थाप्यस्त्वेतावतीं भृतिम् ॥ ३६६ ॥
दास्यामि कार्यमाना सा कीर्तिता तद्विदेशकैः।
कार्यमानादिकों के लक्षण—'यह भार यहां से उठाकर वहां पर रख दो, तुम्हें इतनी मजदूरी दी जायगी' यह 'कार्यमाना' भृति पण्डितों ने कही है।
वत्सरे वत्सरे वापि मासि मासि दिने दिने ॥ ३६७ ॥
एतवतीं भृतिं तेऽहं दास्यामीति च कालिका।
'प्रतिवर्ष प्रतिमास एवं प्रतिदिन इतनी भृति तुम्हे मैं दूंगा' इसे 'कालिका' (कालमाना) भृति कहते हैं।
एतावता कार्यमिदं कालेनापि त्वया कृतम् ॥ ३६८ ॥
भृतिमेतावतीं दास्ये कार्यकालमिता च सा।
| ११८ | शुक्रनीतिः |
|---|
'इतने काल के अन्दर इस कार्य के करने पर मैं तुम्हें इतनी भृति दूंगा' इसे 'कार्यकालमिता' (कार्यकालमिति) भृति कहते हैं ।
न कुर्याद् भृतिलोपं तु तथा भृतिविलम्बनम् ॥ ३९९ ॥
अवश्यपोष्यभरणा भृतिर्मध्या प्रकीर्तिता ।
परिपोष्या भृतिः श्रेष्ठा समानाच्छादनार्थिका ॥ ४०० ॥
भवेदेकस्य भरणं यया सा हीनसंज्ञिका ।
मध्यमादि भृति के लक्षण— मध्य में भृति का लोप तथा भृति देने में विलम्ब नहीं करना चाहिये । अवश्यपोष्य (पोषण करने योग्य) माता-पिता आदि का भरण-पोषण जितने से हो जाय उतनी भृति को 'मध्या' और अवश्य पोष्य लोगों के अतिरिक्त अन्य लोगों का भी पोषण जिससे हो उस भृति को 'श्रेष्ठा' अन्न-वस्त्र मात्र के लिये केवल पर्याप्त होनेवाली भृति को 'समा' एवं जिससे केवल अपना ही भरण-पोषण हो सके उसे 'हीना' भृति कहते हैं ।
यथा यथा तु गुणवान्भृतकस्तद्भृतिस्तथा ॥ ४०१ ॥
संयोज्या तु प्रयत्नेन नृपेणात्महिताय वै ।
पोषण-योग्य भृति नियत करने का निर्देश— भृतक (भृत्य) जैसे २ गुणवान् (योग्य) होता जाय वैसे २ उसकी भृति (वेतन) अपने हित के लिये राजा को यत्नपूर्वक बढ़ा देनी चाहिये अथवा योग्यतानुसार वेतन देना चाहिये ।
अवश्यपोष्यवर्गस्य भरणं भृतकाद्भवेत् ॥ ४०२ ॥
तथा भृतिस्तु संयोज्या यथोग्या भृतकाय वै ।
वेतनभोगी के माता-पिता आदि अवश्य-पोषण करने योग्य लोगों का उसके द्वारा जितने वेतन से पालन-पोषण हो सके उतना वेतन योग्यतानुसार भृत्य के लिये नियुक्त करना चाहिये ।
ये भृत्या हीनभृतिकाः शत्रवस्ते स्वयंकृताः ॥ ४०३ ॥
परस्य साधकास्ते तु छिद्रकोशप्रजाहराः ।
हीन भृति देने से अनर्थ का निर्देश— जो अत्यल्प वेतन पानेवाले भृत्य हैं उन्हें राजा अत्यल्प वेतन देकर अपना शत्रु स्वयं बना लेता है क्योंकि वे पेट न भर सकने के कारण राजा का कार्य छोड़कर दूसरे का भी कार्य करके पेट भरते हैं और सदा राजा के छिद्र खोजते-फिरते हैं एवं उसके धन हरते हैं तथा प्रजा को लूटते हैं ।
अन्नाच्छादनमात्रा हि भृतिः शूद्रादिषु स्मृता ॥ ४०४ ॥
तत्पापभागन्यथा स्यात्पोषको मांसभोजिषु ।
शूद्रादिकों को आच्छादन मात्र देने का निर्देश— केवल शूद्रादि लोगों के
द्वितीयोऽध्यायः । ११६
लिये अन्न-वस्त्र मात्र के लिये पर्याप्त वेतन देना उचित कहा है अन्य के लिये नहीं। अन्यथा अर्थात् अन्न-वस्त्र से अतिरिक्त भी कार्यों का निर्वाह करनेवाला वेतन देने से मांसभोजी उन शूद्रादि लोगों का पोषण करनेवाला राजा उसके पाप कर्मों का स्वयं भी भागी (भोग करनेवाला) होता है।
यद्ब्राह्मणायोनापहृतं धनं तत्परलोकदम् ॥ ४०५ ॥
शूद्राय दत्तमपि यन्नरकायैव केवलम् ।
और ब्राह्मण यदि धन चुरा भी ले तो उससे जिसका धन चुराता है उस पुरुष को परलोक में शुभ फल मिलता है किन्तु यदि शूद्र को स्वयं धन दिया जाय तो उससे केवल दाता को नरक ही मिलता है।
मन्दो मध्यस्तथा शीघ्रस्त्रिविधं भृत्य उच्यते ॥ ४०६ ॥
समा मध्या च श्रेष्ठा च भृतिस्तेषां क्रमात्स्मृता ।
भृत्य के तीन भेद— मन्द (धीरे २ कार्य करनेवाला सुस्त), मध्य (न धीरे और न जल्दी कार्य करनेवाला) और शीघ्र (शीघ्र कार्य पूर्ण करनेवाला) इन भेदों से भृत्य ३ प्रकार का होता है। अतः इन सबों की क्रम से समा, मध्या तथा श्रेष्ठा नामक ३ प्रकार की भृतियों का देना उचित कहा है।
भृत्यानां गृहकृत्यार्थं दिवा यामं समुत्सृजेत् ॥ ४०७ ॥
निशि यामत्रयं नित्यं दिनभृत्येऽर्धयामकम् ।
भृत्यों को छुट्टी देने का नियम— भृत्यों को प्रतिदिन अपना गृहकृत्य करने के लिये दिन में १ प्रहर (३ घण्टे) की और रात्रि में तीन प्रहर की छुट्टी देनी चाहिये। और दिन-भृत्यों (रोजाना मजदूरी पर कार्य करनेवालों) को दिन में आधा प्रहर (डेढ़ घण्टे) की छुट्टी देना चाहिये।
तेभ्यः कार्यं कारयीत ह्युत्सवाद्यैर्विना नृपः ॥ ४०८ ॥
अत्यावश्यकं तूत्सवेऽपि हित्वा श्राद्धदिनं सदा ।
राजा उत्सवादि-दिनों को छोड़कर अन्य दिनों में उन भृत्यों से कार्य कराये और श्राद्धवाले दिन को छोड़कर अन्य उत्सवदिनों में भी अत्यावश्यक कार्यों को तो सदा कराये।
पादहीनां भृतिं त्वार्ते दद्यात्त्रैमासिकीं ततः ॥ ४०९ ॥
पञ्चवत्सरभृत्ये तु न्यूनाधिक्यं यथा तथा।
रोग के समय भृति देने का प्रकार— ५ वर्ष तक कार्य करनेवाले भृत्यों को पीड़ित अवस्था (बीमारी आदि) में चतुर्थांश कम वेतन दे और यदि १ वर्ष तक पीड़ित हों तो उन्हें ३ मास का वेतन (चतुर्थांश) दे। और पीड़ा आदि की जैसी न्यूनाधिकता हो उसके अनुसार वेतन देने में भी न्यूनाधिकता करनी चाहिये।
१२० : शुक्रनीति:
षाण्मासिकीं तु दीर्घार्त्ते तदूर्ध्वं न च कल्पयेत् ॥ ४१० ॥
नैव पक्षार्द्धमार्त्तस्य हातव्याऽल्पापि वै भृतिः ।
और दीर्घ काल तक ( १ वर्ष के ऊपर ) यदि पीड़ित हो तो उसे ६ मास का वेतन दे । इसके ऊपर न दे । और १ सप्ताह तक पीड़ित भृत्यों का वेतन भी कुछ नहीं काटना चाहिये ।
संवत्सरोषितस्यापि प्राज्ञः प्रतिनिधिस्ततः ॥ ४११ ॥
सुमहद्गुणिनं त्वार्त्तं भृत्यर्थं कल्पयेत्सदा ।
बार-बार रोगग्रस्त के स्थान पर प्रतिनिधि रखने का निर्देश—१ वर्ष तक छुट्टी लिये हुये भृत्य का प्रतिनिधि उसी के द्वारा निर्णीत रखना चाहिये । और अत्यन्त योग्य भृत्यों को बीमार पड़ने पर सदा उसको आधा वेतन देना चाहिये ।
सेवा विना नृपः पक्षं दद्याद् भृत्याय वत्सरे ॥ ४१२ ॥
सेवा के बिना ही भृति देने का निर्देश—राजा बिना सेवा कराये ही प्रतिवर्ष १ पक्ष का वेतन भृत्यों को देवे ।
चत्वारिंशत्समा नीताः सेवया येन वै नृपः ।
ततः सेवां विना तस्मै भृत्यर्थं कल्पयेत्सदा ॥ ४१३ ॥
यावज्जीवं तु तत्पुत्रेऽक्षमे बाले तदर्धकम् ।
भार्यायां वा सुशीलायां कन्यायां वा स्वश्रेयसे ॥ ४१४ ॥
जिस भृत्य ने सेवा करते हुये ४० वर्ष बितादिये राजा उसे विना सेवा लिये ( घर पर ) आजीवन पेंशन के रूप में आधा वेतन सदा देता रहे और उसके बच्चे जब तक कार्य करने योग्य न हों जाँय तब तक उन्हें अपने कल्याणार्थ भृत्य के आधे वेतन से आधा वेतन दे इसी भांति उस की सुशीला स्त्री तथा अविवाहिता कन्या को भी पेंशन का आधा वेतन देवे ।
अष्टमांशं पारितोष्यं दद्याद् भृत्याय वत्सरे ।
कार्याष्टमांशं वा दद्यात् कार्यं द्रागधिकं कृतम् ॥ ४१५ ॥
और भृत्य के लिये प्रतिवर्ष वेतन का अष्टमांश पारितोषिक-रूप में देवे । अथवा यदि शीघ्रता के साथ अधिक कार्य किया हो तो कार्य के अष्टमांश को पारितोषिक रूप में देवे अर्थात् उस कार्य के करने में जो वेतन हो उसका अष्टमांश देवे ।
स्वामिकार्ये विनष्टो यस्तत्पुत्रे तद् भृतिं वहेत् ।
यावद्वालोऽन्यथा पुत्रगुणान्दृष्ट्वा भृतिं वहेत् ॥ ४१६ ॥
स्वामी के कार्य करने में यदि भृत्य मरजाय तो उसका पुत्र उसके वेतन को प्राप्त करे, जब तक कि वह बड़ा कार्य करने योग्य न हो जाय, अन्यथा अर्थात्
षष्ठांशं वा चतुर्थांशं भृतेर्भृत्यस्य पालयेत्।
द्वितीयोऽध्यायः [१२१]
जब बड़ा हो जाय तो उसके गुणों को देखकर तदनुसार वेतन प्राप्त करे।
षष्ठांशं वा चतुर्थांशं भृतेर्भृत्यस्य पालयेत्।
दद्यात्तदधं भृत्याय द्वित्रिवर्षेऽखिलं तु वा ॥ ४१७ ॥
भृत्य के वेतन का षष्ठांश या चतुर्थांश काटकर राजा अपने यहां जमा करता रहे और जब दो-तीन वर्ष हो जाय तब आधी या पूरी रकम उसे दे देवे।
वाक्यपारुष्यान्न्यूनभृत्या स्वामी प्रबलदण्डतः।
भृत्यं प्रशिक्षयेन्नित्यं शत्रुत्वं त्वपमानतः ॥ ४१८ ॥
कटुभाषी भृत्य का भृति-दान-प्रकार—यदि स्वामी या राजा भृत्यों से कठोर बातें करता है या वेतन पूरा नहीं देता है या प्रबल दण्ड देता है किंवा अपमान करता है तो इन सब व्यवहारों से वह अपने भृत्यों को शत्रुता करना सिखाता है।
भृतिदानेन संतुष्टा मानेन परिवर्धिताः।
सान्त्विता मृदुवाचा ये न त्यजन्त्यधिपं हि ते ॥ ४१९ ॥
और समय पर वेतन देने से संतुष्ट किये हुये, संमान से गौरव पद पर पहुँचाये हुये, मृदु वचनों से समझाये हुये जो भृत्य हैं वे अपने स्वामी को नहीं छोड़ते हैं।
अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ तु मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम् ॥ ४२० ॥
जो केवल धन चाहते हैं वे 'अधम' जो धन तथा मान दोनों चाहते हैं वे 'मध्यम' एवं जो केवल मान चाहते हैं वे 'उत्तम' जन कहलाते हैं। क्योंकि बड़े लोगों का धन मान (आदर) ही है।
यथागुणान्स्वभृत्यांश्च प्रजाः संरक्षयेन्नृपः।
शाखाप्रदानतः कांश्चिदपरान् फलदानतः ॥ ४२१ ॥
अन्यान् सुचक्षुषा हास्यैस्तथा कोमलया गिरा।
सुभोजनैः सुवसनैस्ताम्बूलैश्च धनैरपि ॥ ४२२ ॥
कांश्चित् सुकुशलप्रश्नैरधिकारप्रदानतः।
वाहनानां प्रदानेन योग्याभरणदानतः ॥ ४२३ ॥
छत्रातपत्रचमरदीपिकानां प्रदानतः।
क्षमया प्रणिपातेन मानेनाभिगमेन च ॥ ४२४ ॥
सत्कारेण च ज्ञानेन ह्यादरेण शमेन च।
प्रेम्णा समीपवासेन स्वार्धासनप्रदानतः ॥ ४२५ ॥
सम्पूर्णासनदानेन स्तुत्योपकारकीर्तनात्।