Skip to content
SarvaKosh
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 202 of 526

Read in context
Page 202

११६ | शुक्रनीतिः

करके प्रमाण से भाग करने पर जो लब्धि हो उसे मनुष्यों का इच्छा-फल कहते हैं ।

समासतो लेख्यमुक्तं सर्वेषां स्मृतिसाधनम् ।

इस प्रकार से संक्षेप से सभी विषयों की स्मृति का साधन (कारण) लेख्य (बही या पत्र) का वर्णन किया गया ।

गुञ्जा माषस्तथा कर्षः पदार्धः प्रस्थ एव हि ॥ ३८७ ॥
यथोत्तरा दशगुणाः पञ्च प्रस्थस्य चाढकः ।
ततश्चाष्टाढकः प्रोक्तो ह्यर्मणस्ते तु विंशतिः ॥ ३८८ ॥
खारिका स्याद्विद्यते तद् देशे देशे प्रमाणकम् ।

**गुञ्जादिकों का लक्षण—**गुञ्जा (रत्ती), माष (माशा), कर्ष (एक रुपया भर), पदार्द्ध, प्रस्थ ये सब उत्तरोत्तर क्रम से दशगुने होते हैं अर्थात् १० गुञ्जाओं का १ माष, १० माषों का १ कर्ष, १० कर्षों का १ पदार्द्ध, १० पदार्द्धों का १ प्रस्थ होता है । ५ प्रस्थों का १ आढक, १० आढकों का १ अर्मण, २० अर्मणों का १ खारिका (खारी) होती है । देश-भेद से ये परिमाणों में भिन्नतायें होती हैं ।

पञ्चाङ्गुलाबटं पात्रं चतुरङ्गुलविस्तृतम् ॥ ३८९ ॥
प्रस्थपादं तु तज्ज्ञेयं परिमाणे सदा बुधैः ।

**प्रस्थपाद का लक्षण—**५ अङ्गुल गहरा, ४ अङ्गुल चौड़ा जो पात्र होता है, उसे पण्डित लोग सदा नापने में 'प्रस्थपाद' कहते हैं। इसी को लोक में 'माना' भी कहते हैं ।

ऊर्ध्वांकश्च यथासंज्ञस्त्वधस्थाश्च वामगाः ॥ ३९० ॥
क्रमात्स्वदशगुणिताः परार्द्धान्ताः प्रकीर्त्तिताः ।

**संख्या का प्रमाण—**संज्ञानुसार ऊपर लिखे हुये अङ्क के नीचे बाईं ओर एक २ इकाई क्रम से बढ़ाने पर अपने से दशगुणी अधिक परार्द्ध पर्यन्त अङ्कों की गिनती होती है ।

न कर्तुं शक्यते संख्यासंज्ञा कालस्य दुर्गमात् ॥ ३९१ ॥
ब्रह्मणो द्विपरार्धं तु आयुरुक्तं मनीषिभिः ।

**संख्या की अनन्तता—**काल की समाप्ति होना असंभव है अतः संख्या की संज्ञा परार्द्ध से अधिक नहीं हो सकती है। और विद्वानों ने ब्रह्मा की आयु का प्रमाण दो परार्द्ध तक कहा है क्योंकि परार्द्ध से अतिरिक्त संख्या की संज्ञा नहीं है ।

एको दश शतं चैव सहस्रं चायुतं क्रमात् ॥ ३९२ ॥
नियुतं प्रयुतं कोटिरर्बुदं चाब्जखर्वकौ ।