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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 195 of 526

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Page 195

द्वितीयोऽध्यायः [१०६]

सवृद्धिकमृणं दत्तमकुसीदं तु याचितम् ॥ ३४० ॥

निधि, उपनिधि आदि व्यय के लक्षण— निधि (निधीकृत) व्यय उसे कहते हैं जो पृथ्वी में गाड़ दिया जाता है, इसको अत्यन्त कष्ट पड़ने पर भी ग्रहण नहीं किया जाता है—अतः यह भी एक प्रकार का व्यय ही है। उप-निधि (उपनिधीकृत) व्यय वह है जो दूसरे के पास रखा हुआ है। विनिमयीकृत व्यय उसे कहते हैं जो दिये हुये मूल्यादि से बदले में मिला हुआ है। सूद पर या बिना सूद के जो दिया गया है उसे आधमर्णिक व्यय कहते हैं। इसमें सूद पर जो दिया जाता है उसे ऋण और बिना सूद के जो दिया जाता है उसे याचित (हथ-उधार) कहते हैं।

स्वत्वनिवर्त्तको द्वेधा त्वैहिकः पारलौकिकः ।

स्वत्वनिवर्त्तक के भेद— स्वत्वनिवर्त्तक व्यय दो प्रकार का होता है प्रथम—ऐहिक, द्वितीय—पारलौकिक।

प्रतिदानं परितोष्यं वेतनं भोग्यमैहिकः ॥ ३४१ ॥
चतुर्विधस्तथा पारलौकिकोऽनन्तभेदभाक् ।
शेषं संयोजयेन्नित्यं पुनरावर्तको व्ययः ॥ ३४२ ॥

ऐहिक तथा पारलौकिक व्यय के भेद— उसमें प्रतिदान, परितोष्य वेतन और भोग्य रूप से ऐहिक के ४ भेद होते हैं। और पारलौकिक के अनन्त भेद होते हैं। जो नित्य शेष को रोकड़ में मिलाया जाता है वह भी पुनरावर्त्तक व्यय कहलाता है।

मूल्यत्वेन च यद्दत्तं प्रतिदानं स्मृतं हि तत् ।
सेवाशौर्यादिसंतुष्टैर्दत्तं तत्पारितोषिकम् ॥ ३४३ ॥
भृतिरूपेण संदत्तं वेतनं तत् प्रकीर्तितम् ।

प्रतिदान, पारितोषिक और वेतन व्यय के लक्षण— मूल्य रूप में जो दिया जाता है उसे 'प्रतिदान' कहते हैं। सेवा तथा शूरता आदि से प्रसन्न होकर जो दिया जाता है, उसे 'पारितोषिक' (परितोष्य) कहते हैं। भरण-पोषणार्थ जो भृत्यों को दिया जाता है उसे 'वेतन' कहते हैं।

धान्यवस्त्रगृहाराम-गोगजादिरथार्थकम् ॥ ३४४ ॥
विद्याराज्याद्यर्जनार्थं धनाप्त्यर्थं तथैव च ।
व्ययीकृतं रक्षणार्थमुपभोग्यं तदुच्यते ॥ ३४५ ॥

उपभोग्य के लक्षण— धान्य, वस्त्र, गृह, बगीचा, गो, गज आदि तथा रथ के लिये एवं विद्या तथा राज्य आदि के उपार्जन के लिये और धन आदि की प्राप्ति के लिये एवं इन सबों की रक्षा के लिये जो व्यय किया जाता है उसे 'उपभोग्य' कहते हैं।