शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 203 of 526
Read in contextद्वितीयोऽध्यायः ११८
निखर्वपद्मशङ्खाब्धि-मध्यमान्तपरार्धकाः ॥ ३६३ ॥
एकादि-परार्ध तक संख्याओं के नाम—एक, दश, शत, सहस्र, अयुत, नियुत, प्रयुत, कोटि, अर्बुद, अब्ज, खर्व, निखर्व, पद्म, शङ्ख, अब्धि, मध्य, अन्त, परार्द्ध ये सब संख्याओं की संज्ञायें हैं।
कालमानं त्रिधा ज्ञेयं चान्द्रं सौरं च सावनम्।
भृतिदाने सदा सौरं चान्द्रं कौसीदवृद्विषु ॥ ३६४ ॥
कल्पयेत्सावनं नित्यं दिनभृत्येष्ववधौ सदा।
कालमान का त्रैविध्य एवं चान्द्रादिकों की व्यवस्था—चान्द्र (चन्द्र की वृद्धि-क्रम से शुक्ल १ प्रतिपदा से अमावस्या ३० पर्यन्त) मास, सौर (एक संक्रान्ति से दूसरी संक्रान्ति पर्यन्त), सावन (जिस दिन से कोई कार्य आरम्भ किया जाता है और जिस दिन समाप्त होता है वहाँ तक दिन की संख्या के अनुसार गणना करना—इसमें पूरे ३० दिन का १ मास होता है) इन भेदों से काल मान ३ प्रकार का होता है। वेतन देने में सदा सौर मान का, ऋण-व्यवहार में नित्य चान्द्रमान का एवं दैनिक मजदूरों को मजदूरी देने और अवधि (इतने दिन तक कार्य करो ऐसी अवधि) में सदा सावन मान का व्यवहार करना चाहिये।
कार्यमाना कालमाना कार्यकालामित्रिधा ॥ ३९५ ॥
भृतिरुक्ता तु तद्विज्ञैः सा देया भाषिता यथा।
भृति के ३ प्रकारों का निर्देश—कार्यमाना (कार्य के परिमाण के अनुसार दी जानेवाली), कालमाना (काल के परिमाण के अनुसार दी जानेवाली), कार्यकालमिति (कार्य तथा काल के प्रमाणानुसार दी जानेवाली) इन भेदों से भृति (मजदूरी या वेतन) ३ प्रकार की पण्डितों ने कही है। जैसी कही है वैसी हिसाब करके भृति देनी चाहिये।
अयं भारस्त्वया तत्र स्थाप्यस्त्वेतावतीं भृतिम् ॥ ३६६ ॥
दास्यामि कार्यमाना सा कीर्तिता तद्विदेशकैः।
कार्यमानादिकों के लक्षण—'यह भार यहां से उठाकर वहां पर रख दो, तुम्हें इतनी मजदूरी दी जायगी' यह 'कार्यमाना' भृति पण्डितों ने कही है।
वत्सरे वत्सरे वापि मासि मासि दिने दिने ॥ ३६७ ॥
एतवतीं भृतिं तेऽहं दास्यामीति च कालिका।
'प्रतिवर्ष प्रतिमास एवं प्रतिदिन इतनी भृति तुम्हे मैं दूंगा' इसे 'कालिका' (कालमाना) भृति कहते हैं।
एतावता कार्यमिदं कालेनापि त्वया कृतम् ॥ ३६८ ॥
भृतिमेतावतीं दास्ये कार्यकालमिता च सा।