शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context१०६ शुक्रनीतिः
पृथक्-पृथक् यथार्थ मूल्य और मान (तौल) आदि से अनेक भेदों से युक्त अनेक प्रकार का) होता है।
वत्सरे वत्सरे वापि मासि मासि दिने दिने ॥ ३२२ ॥
हिरण्यपशुधान्यादि स्वाधीनं त्वायसंज्ञकम् ।
पराधीनं कृतं यत्त व्ययसंज्ञं धनं च तत् ॥ ३२३ ॥
प्रतिवर्ष, प्रतिमास और प्रतिदिन जो सोना, पशु तथा धान्य आदि जो अपने अधीन हो जाता है अर्थात् अपने पास आता है। वह 'आय' कहलाता है। और जो सोना आदि धन दूसरे के आधीन कर दिया (दे दिया) जाता है वह 'व्यय' कहलाता है।
सद्यस्कश्चैव प्राचीन आयः सञ्चितसंज्ञकः ।
व्ययो द्विधा चोपभुक्तस्तथा विनिमयात्मकः ॥ ३२४ ॥
आय के भेद— और आय दो प्रकार का होता है, एक तात्कालिक दूसरा प्राचीन, जिसे 'संचित' भी कहते हैं। एवं व्यय भी दो प्रकार का होता है, एक उपभुक्त (उपभोग किया हुआ), दूसरा विनिमयात्मक (किसी वस्तु के बदले के रूप में दिया हुआ)।
निश्चितअन्यस्वामिकञ्चानिश्चितस्वामिकन्तथा ।
स्वस्वत्वनिश्चितं चेति त्रिविधं सञ्चितं मतम् ॥ ३२५ ॥
संचित आय के भेद— सञ्चित आय तीन प्रकार का होता है। एक निश्चितअन्यस्वामिक (जिसका दूसरा कोई स्वामी निश्चित है), दूसरा-अनिश्चितस्वामिक (जिसके स्वामी का निश्चय नहीं है), तीसरा स्व-स्वत्वनिश्चित (अपना स्वत्व जिस पर निश्चित है अर्थात् निजी) संज्ञक सञ्चित आय है।
निश्चितअन्यस्वामिकं यद्धनं तु त्रिविधं हि तत् ।
औपनिध्यं याचितकमौत्तमर्णिकमेव च ॥ ३२६ ॥
निश्चितअन्यस्वामिक संचित धन के भेद— इसमें प्रथम जो निश्चितअन्यस्वामिक संचित धन है, वह तीन प्रकार का है उसमें पहला औपनिध्य, दूसरा याचितक तीसरा औत्तमर्णिक है।
विस्रम्भान्निहितं सद्भिर्र्यदौपनिधिकं हि तत् ।
अवृद्धिकं गृहीतान्यालङ्कारादि च याचितम् ॥ ३२७ ॥
सवृद्धिकं गृहीतं यदृण तच्चौत्तमर्णिकम् ।
औपनिध्य-याचित-औत्तमर्णिक के लक्षण— जो धन किसी सज्जन द्वारा विश्वास मानकर किसी के पास रखा जाता है वह 'औपनिधिक' (औपनिध्य) कहलाता है। जो बिना सूद का दूसरे से अलङ्कार आदि (रुपया आदि) लिया जाता है वह 'याचित' कहलाता है। और जो सूद पर ऋण लिया जाता है वह 'औत्तमर्णिक' कहलाता है।