शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context१०२ | शुक्रनीतिः
वर्ष भर का ), बहुवार्षिक ( बहुत वर्षों का ) रूप में अच्छी तरह से लिखें। और उसे राजा के समक्ष उपस्थित कर दिखावें।
राजाद्यंकितलेख्यस्य धारयेत्स्मृतिपत्रकम् ॥ २९७ ॥
कालेऽतीते विस्मृतिर्वा भ्रान्तिः संजायते नृणाम् ।
राजादि के द्वारा लिखित लेखपत्र का स्मरण दिखानेवाला एक 'स्मृतिपत्र'-फाइल और रसीद रखे। क्योंकि बहुत समय बीतने पर विस्मृति या भ्रम हो जाना मनुष्यों के लिये स्वाभाविक है।
अनुभूतस्य स्मृत्यर्थे लिखितं निर्मितं पुरा ॥ २९८ ॥
यत्नाच्च ब्रह्मणा वाचां वर्ण-स्वर-विचिह्नितम् ।
क्योंकि पुराकाल में ब्रह्माजी ने अनुभव के स्मरणार्थ तथा स्वरों का चिह्न ( अक्षर ) स्वरूप लेख की परिपाटी बनाई थी अर्थात् इसका प्रारम्भ ब्रह्मा जी से हुआ है।
वृत्तलेख्यं तथा चायव्ययलेख्यमिति द्विधा ॥ २९६ ॥
व्यवहारक्रियाभेदादुभयं बहुतां गतम् ।
लेख के दो भेदों का निर्देश—इस लेख के दो भेद हैं—प्रथम—वृत्त ( समाचार ) संबन्धी, द्वितीय—आय-व्यय संबन्धी इनमें प्रत्येक के व्यवहार-संबन्धी क्रियाओं में भेद होने से बहुत से भेद होते हैं।
यथोपन्यस्तसाध्यार्थसंयुक्तं सोत्तरक्रियम् ॥ ३०० ॥
सावधारणकं चैव जयपत्रकमुच्यते ।
जयपत्रक के लक्षण—जिसमें यथायोग्य कहे हुये अभियोग के विषयों का एवं उसके उत्तर में कही हुई बातों का तथा अन्तिम निर्णय का लेख लिखा हो उसे 'जयपत्रक' कहते हैं।
सामन्तेष्वथ भृत्येषु राष्ट्रपालादिकेषु यत् ॥ ३०१ ॥
कार्यमादिश्यते येन तदाज्ञापत्रमुच्यते ।
आज्ञापत्र के लक्षण—जिस लेख द्वारा, सामन्तों ( अधीनवर्त्ती राजाओं ) अथवा राष्ट्रपालादि ( गवर्नर आदि ) भृत्यों को राजा आदेश देता है उसे 'आज्ञापत्र' कहते हैं।
ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमन्येष्वभ्यर्चितेषु च ॥ ३०२ ॥
कार्यं निवेद्यते येन पत्रं प्रज्ञापनाय तत् ।
प्रज्ञापनपत्र के लक्षण—ऋत्विक्, पुरोहित तथा आचार्य एवं अन्य भी पूज्य लोगों के लिये जिस लेख के द्वारा राजा कार्य सूचित करता है, उसे 'प्रज्ञापनपत्र' कहते हैं।
सर्वे शृणुत कर्तव्यमाज्ञया मम निश्चितम् ॥ ३०३ ॥