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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 197 of 526

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Page 197

द्वितीयोऽध्यायः । १११

मानेन संख्यया चैवोन्मानेन परिमाणकैः ।
अवशिष्ट आय के विविध भेद— अवशिष्ट आय और पृथक् २ कारण, प्रमाण, संबन्ध (संयोग), कार्याङ्ग (कार्यों के अवान्तर व्यापार), व्याप्य (थोड़े विषय), व्यापक (बहुत विषय), मान, संख्या, उन्मान और परिमाण इन सबों के द्वारा बहुत प्रकार से भिन्न २ होते हैं।

क्वचित्संख्या क्वचिन्मानमुन्मानं परिमाणकम् ॥ ३५३ ॥
समाहारः क्वचिच्चेष्टो व्यवहारार्य तद्विदाम् ।
किसी प्रदेश में मानादि का ज्ञान रखनेवाले लोगों को व्यवहार के लिये संख्या, कहीं पर मान, कहीं पर उन्मान, कहीं पर परिमाण और कहीं पर समाहार (संख्यादियों का समुदाय) अभीष्ट होता है।

अङ्गुलाद्यं स्मृतं मानमुन्मानं तु तुला स्मृता ॥ ३५४ ॥
परिमाणं पात्रमानं संख्यैकद्व्यादिसंज्ञिका ।
मान-उन्मान-परिमाण संख्या के लक्षण— अंगुलि या हाथ आदि से जो नापा जाता है उसे 'उन्मान' और काठ आदि के बने पात्रों से जो नापा जाता है उसे 'परिमाण' एवं एक, दो, तीन आदि गिनती को 'संख्या' कहते हैं।

यत्र यादृग् व्यवहारस्तत्र तादृक्प्रकल्पयेत् ॥ ३५५ ॥
जहाँ पर जैसा व्यवहार हो वहाँ पर वैसा व्यवहार राजा को कराना चाहिये।

रजतस्वर्णताम्रादि व्यवहारार्थमुद्रितम् ।
व्यवहार्य वराटाद्यं रत्नान्तं द्रव्यमीरितम् ॥ ३५६ ॥
सपशुधान्यवस्त्रादि-तृणान्तं धनसंज्ञकम् ।
लोकव्यवहारार्थं द्रव्य तथा धन के लक्षण— लोकव्यवहार के लिये ढाले गये चांदी, सोना एवं तांबे के सिक्कों का व्यवहार प्रजाओं को करना चाहिये। कौड़ी से लेकर रत्न-पर्यन्त की संज्ञा 'द्रव्य' है। पशु, धान्य, वस्त्र से लेकर तृण पर्यन्त की संज्ञा 'धन' है।

व्यवहारे चाधिकृतं स्वर्णाद्यं मूल्य तामियात् ॥ ३५७ ॥
व्यवहार के लिये राजा द्वारा निश्चित स्वर्णादि मुद्रायें प्रत्येक वस्तु की मूल्य समझी जाती हैं।

कारणादिसमायोगात्पदार्थस्तु भवेद् भुवि ।
येन व्ययेन संसिद्धस्तद्व्ययस्तस्य मूल्यकम् ॥ ३५८ ॥
मूल्य की परिभाषा— संसार में कारण आदि के संयोग होने से जो पदार्थ जितने व्यय में सिद्ध होता है उतना व्यय उसका मूल्य होता है।

सुलभासुलभत्वाच्चागुणत्वगुणसंश्रयैः ।