शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context११२ | शुक्रनीतिः
यथाकामात्पदार्थानामर्घं हीनाधिकं भवेत् ॥ ३५९ ॥
मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश— पदार्थों की सुलभता या दुर्लभता से किंवा अच्छा या बुरा होने से (तारतम्यानुसार) उनका मूल्य विक्रेता के इच्छानुसार अधिक या कम होता है।
न हीनं मणिधातूनां क्वचिन्मूल्यं प्रकल्पयेत् ।
मूल्यहानिस्तु चैतेषां राजदौष्ट्येन जायते ॥ ३६० ॥
किसी प्रदेश में भी राजा मणियों तथा सोना, चांदी आदि धातुओं का मूल्य थोड़ा न रखे । इन सबों के मूल्य में कमी जब होती है तब राजा की दुष्टता से न कि प्रजा की ।
दीर्घे चतुर्भागभूतपत्रे तिर्यग्गतावलिः ।
त्र्यंशगाभ्यन्तरगता चार्धगा पादगापि वा ॥ ३६१ ॥
कार्या व्यापकव्याप्यानां लेखने पदसंज्ञिका ।
पत्रलेखन प्रकार— थोड़ा या ज्यादा विषयों के अनुसार लेख लिखने के लिये प्रशस्त पत्र (कागज) के ऊपर चार भाग करने पर उसमें से ३ भाग के अन्दर या आधे भाग किंवा चौथाई भाग के अन्दर आड़ी लकीरों की पंक्ति बनाकर पदों (अक्षरों) को लिखना चाहिये ।
श्रेष्ठाभ्यन्तरगा तासु वामतस्त्र्यंशगाऽप्यनु ॥ ३६२ ॥
दक्षत्र्यंशगता चानु ह्यर्धगा पादगा ततः ।
उक्त ३ प्रकार की पदावलियों में जो पत्र के अन्दर वामभाग से शुरू होकर तीन भाग में लिखी होती है वह श्रेष्ठ है। और दक्षिण से वामभाग की ओर तीन भाग तक लिखी होती है वह उसकी अपेक्षा हीन है। अर्द्धांश में लिखी हुई उससे भी हीन, इसके बाद चतुर्थांश में लिखी हुई सबसे हीन है ।
स्वभ्यन्तरे स्वभेदाः स्युः सदृशाः सदृशे पदे ॥ ३६३ ॥
स्वारम्भपूर्तिसदृशे पत्रे स्तः सदैव हि ।
लाइनों की दूरी परस्पर समान भाव से होने से सब एक सी हों और उनमें अक्षर भी समान हों । अर्थात् जो समान पद हों उनमें सर्वत्र अक्षर समान लिखे जांय । और आरम्भ किये गये विषयों की पूर्ति के अनुरूप पत्र हों एवं उनमें अक्षर और लाइनें उसी के अनुसार अंकित हों ।
राजा स्वलेख्यचिह्नं तु यथाभिलषितं तथा ॥ ३६४ ॥
लेखानुपूर्वं कुर्याद्धि दृष्ट्वा लेख्यं विचार्य च ।
राजा लेख को देखकर उसके बाद विचार कर लेखानुसार जो उचित प्रतीत हो उसे इच्छानुकूल अपने लेख से अङ्कित कर देवे अर्थात् लिख देवे ।