Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

द्वितीयोऽध्यायः ६५

Page 181Permalink

द्वितीयोऽध्यायः ६५

जिस के ऊपर राजा प्रसन्न हो उसके अनिष्ट की चिन्ता कदापि नहीं करनी चाहिये।

न दर्शयेत्स्वाधिकारगौरवं तु कदाचन ।

और राजा के सामने कभी अपने अधिकार का गौरव नहीं प्रकाशित करना चाहिये।

परस्परं नाभ्यसूयुर्न भेदं प्राप्नुयुः कदा ॥ २५३ ॥
राज्ञा चाधिकृताः संतः स्वस्वाधिकारगुप्तये ।

आपस में भृत्यों के कर्त्तव्य—राजा के द्वारा किसी अधिकार पर नियुक्त किये गये उत्तम भृत्य को चाहिये कि—वह कभी भी अपने २ अधिकार की रक्षा के लिये आपस में एक दूसरे के दोष को नहीं दिखाये और न परस्पर भेद रक्खे।

अधिकारिगणो राजा सद्वृत्तौ यत्र तिष्ठतः ॥ २५४ ॥
उभौ तत्र स्थिरा लक्ष्मीर्विपुला सम्मुखी भवेत् ।

राजा तथा भृत्य के परस्पर अच्छा व्यवहार करने का निर्देश—जहां पर राजा तथा अधिकारी गण (भृत्यगण) ये दोनों परस्पर अच्छा व्यवहार रखते हैं वहां पर विपुल तथा स्थिर लक्ष्मी संमुख उपस्थित रहती है।

अन्याधिकारवृतं तु न ब्रूयाच्छ्रुतमप्यृत ॥ २५५ ॥
राजा न शृणुयादन्यमुखतस्तु कदाचन ।

दूसरे भृत्य के अधिकार-विषयक दोष को सुनकर भी भृत्य राजा से न कहे। और राजा भी दूसरे भृत्य के मुख से किसी दूसरे की बात को कभी न सुने।

न बोधयन्ति च हितमऽहितं वाधिकारिणः ॥ २५६ ॥
प्रच्छन्नवैरिणस्ते तु दास्यरूपमुपाश्रिताः ।

जो अधिकारी लोग हित या अहित बात राजा को नहीं समझाते हैं वे नौकर के रूप में छिपे हुये राजा के शत्रु के समान होते हैं।

हिताहितं न शृणोति राजा मन्त्रिमुखाच्च यः ॥ २५७ ॥
स दस्यू राजरूपेण प्रजानां धनहारकः।

डाकू के समान राजा के लक्षण—जो राजा मन्त्री के मुख से कही हुई हित या अहित की बातों पर ध्यान नहीं देता है वह राजा के रूप में डाकू के समान केवल प्रजा का धन हरण करनेवाला है।

सुपुष्टव्यवहारा ये राजपुत्रैश्च मन्त्रिणः ॥ २५८ ॥
विरुध्यन्ति च तैः साकं ते तु प्रच्छन्नतस्कराः ।

प्रच्छन्न चोर के लक्षण—जो मन्त्री लोग राजपुत्रों के द्वारा व्यवहार-

Page 182Permalink

६६ | शुक्रनीतिः

विषयक ( राजकार्य-विषयक ) प्रश्न को अच्छी तरह से पूछे जाने पर; उनके साथ विरुद्ध व्यवहार करने लगते हैं वे छिपे हुये चोर के समान हैं ।

बाला अपि राजपुत्रा नावमान्यास्तु मन्त्रिभिः ॥ २५९ ॥
सदा सुबहुवचनैः सम्बोध्यास्ते प्रयत्नतः ।

बालक भी राजपुत्र का तिरस्कार का निषेध— छोटी उम्रवाले भी राजपुत्र लोग मन्त्रियों के द्वारा तिरस्कार के योग्य नहीं हैं बल्कि प्रयत्नपूर्वक वे सदा सुन्दर बहुवचनान्त आदरसूचक शब्दों के साथ संबोधन करने के योग्य ही हैं ।

असदाचरितं तेषां क्वचिद्राज्ञे न दर्शयेत् ॥ २६० ॥
स्त्रीपुत्रमोहो बलवान्न निन्दा श्रेयसे यतः ।

और मन्त्री लोगों को कभी भी उन राजपुत्रों के बुरे आचरणों को राजा से नहीं सूचित करना चाहिये, क्योंकि स्त्री तथा पुत्र का मोह बलवान् होता है अतः उन दोनों की निन्दा करना कल्याणकारक नहीं होता है ।

राज्ञोऽवश्यतरं कार्यं प्राणसंशयितं च यत् ॥ २६१ ॥
आज्ञापयप्रतञ्चाहं करिष्ये तत्तु निश्चितम् ।
इति विज्ञाप्य द्राक्कर्तुं प्रयतेत स्वशक्तितः ॥ २६२ ॥

भृत्य को उचित है कि—उस राजा का अत्यन्त आवश्यक अथवा उनके प्राणों को संशय ( संकट ) डाल देनेवाला जो कार्य हो रहा हो उसे करने के लिये सबसे आगे बढ़कर “प्रभो ! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं उस कार्य को निश्चित रूप से करूंगा' ऐसा राजा से निवेदन कर अपनी शक्ति के अनुसार उसे शीघ्रता के साथ करने के लिये प्रयत्न करे ।

प्राणानपि च सन्दध्यान्महत्कार्ये नृपाय च ।
भृत्यः कुटुम्बतुष्ट्यर्थं नान्यथा तु कदाचन ॥ २६३ ॥

भृत्य अपने कुटुम्ब के पालनार्थ ही विवश होकर राजा के प्राण-संकट आदि महान् कार्य की उपस्थिति होने पर राजा के लिये अपना प्राण भी दे डाले, अन्यथा ( यदि कुटुम्ब के पालन की चिन्ता न हो तो ) कभी भी प्राणों का त्याग न करे ।

भृत्या धनहराः सर्वे युक्त्या प्राणहरो नृपः ।

सभी भृत्य कारणवश राजा के धन लेनेवाले होते हैं एवं राजा भी कारण-वश ही भृत्य का प्राण लेनेवाला होता है ।

युद्धादौ सुमहत्कार्ये भृत्या प्राणान्हरेन्नृपः ॥ २६४ ॥
नान्यथा भृतिरूपेण भृत्यो राजधनं हरेत् ।

युद्धादि महान् कार्य उपस्थित होने पर वेतन का मूल्य चुकता कराने

Page 183Permalink

द्वितीयोऽध्यायः
६७

के लिये राजा भृत्य के प्राणों को नष्ट करे अन्यथा (युद्धादि के अतिरिक्त साधारण कार्यों में) प्राण न ले अर्थात् वेतन के लालच से स्वामी के युद्धादि में जय आदि की कामना रखनेवाले भृत्य प्राणों का त्याग करते हैं अन्यथा नहीं। और भृत्य वेतन रूप से ही राजा का धन ग्रहण करे अन्यथा (वेतन के अलावा किसी प्रकार से) न ग्रहण करे।

अन्यथा हरतस्तौ तु भवतश्च स्वनाशकौ ॥ २६५ ॥

यदि उक्त प्रकार से अन्यथा (भिन्न) रीति से राजा और भृत्य क्रम से प्राण और धन एक दूसरे का हरण करते हैं तो वे दोनों अपना २ नाश करते हैं।

राजाऽनु युवराजस्तु मान्योऽमात्यादिकैः सदा ।
तन्न्यूनामात्यनवकं तन्न्यूनाधिकृतो गणः ॥ २६६ ॥
मन्त्रितुल्यश्चायुक्तिको न्यूनः साहस्त्रिको मतः ।

सबसे अधिक राजा अमात्यादि के द्वारा सदा पूजनीय होता है, उसके बाद राजा से कम युवराज माननीय होता है, युवराज से कम अमात्यादि ९ प्रकृति (प्रधान राजपुरुष) वर्ग माननीय होता है। अमात्यादि से कम अधिकारी वर्ग (अफसर लोग) माननीय होता है। और मन्त्री के तुल्य आयुक्तिक (१००० सैनिकों का स्वामी) माननीय होता है। उससे न्यून साहस्त्रिक (१००० सैनिकों का स्वामी) माननीय होता है।

न क्रीडयेद्राजसमं क्रीडिते तं विशेषयेत् ॥ २६७ ॥
नाभमान्या राजपत्नी कन्या वापि च मन्त्रिभिः ।
राजसम्बन्धिनः पूज्याः सुहृदश्च यथार्हतः ॥ २६८ ॥

राजा के साथ प्रथम किसी प्रकार का खेल ही न खेले, यदि खेले तो खेल में राजा को जितावे अर्थात् उसे कभी न हराये। और मन्त्रियों को कभी राजा की पत्नी या कन्या का तिरस्कार नहीं करना चाहिये। और राजा के सम्बन्धी तथा मित्रों का यथायोग्य आदर-सत्कार करना चाहिये।

नृपाहूतस्तुरं गच्छेद्व्यक्त्वा कार्यशतं महत् ।

भृत्यों को सैकड़ों महान से महान् कार्यों को छोड़कर भी राजा के बुलाने पर तुरन्त उनके पास जाना चाहिये।

मित्रायापि न वक्तव्यं राजकार्यं सुमन्त्रितम् ॥ २६९ ॥
वृत्तिं बिना राजद्रव्यमदत्तं नाभिलाषयेत् ।

गुप्त रूप से विचार किये हुये किसी राजकार्य को अपने मित्र से भी नहीं कहना चाहिये। वेतन को छोड़कर राजा के किसी धन को बिना उनके दिये लेने की इच्छा भी नहीं करनी चाहिये।

* शु०

Page 184Permalink

६८ | शुक्रनीतिः

राजाज्ञया विना नेच्छेत्कार्यमध्यस्थिकीं भृतिम् ॥ २७० ॥
न निहन्याद् द्रव्यलोभात्सत्कार्यं यस्य कस्यचित् ।

राजाज्ञा के बिना कार्य के मध्य में अर्थात् बिना कार्य समाप्त किये वेतन लेने की इच्छा न करे। और द्रव्य के लोभ से किसी के अच्छे कार्य को नष्ट न करे।

स्वस्त्रीपुत्रधनप्राणैः काले संरक्षयेन्नृपम् ॥ २७१ ॥
उत्कोचं नैव गृह्णीयान्नान्यथा बोधयेन्नृपम् ।

संकट-काल पड़ने पर अपनी स्त्री, पुत्र, धन तथा प्राण देकर भी राजा की रक्षा करे। घूस न ले और राजा को वस्तुस्थिति से विपरीत न समझावे।

अन्यथा दण्डकं भूपं नित्यं प्रबलदण्डकम् ॥ २७२ ॥
निगृह्य बोधयेत्सम्यगेकांते राज्यगुप्तये ।

यथार्थ दण्ड न देनेवाले या नित्य प्रबल दण्ड देनेवाले राजा को राज्य की रक्षा के लिये रोककर एकान्त में भली-भाँति समझाना भृत्य के लिये उचित है।

हितं राज्ञश्चाहितं यल्लोकानां तन्न कारयेत् ॥ २७३ ॥
नवीनकरशुल्काद्यैर्लोक उद्विजते ततः ।

जिससे केवल राजा का हित है किन्तु प्रजा का अहित है ऐसे कार्य को राजा से न करावे। क्योंकि नवीन कर तथा चुंगी आदि लगाने से प्रजा उद्विग्न हो उठती है।

गुणनीतिबलद्वेषी कुलभूतोऽप्यधार्मिकः ॥ २७४ ॥
नृपो यदि भवेत्तं तु त्यजेद्राष्ट्रविनाशकम् ।

अच्छे वंश में उत्पन्न हुआ भी राजा यदि गुण, नीति तथा बल (सेना) के साथ द्वेष करनेवाला एवं अधार्मिक हो तो उसे राज्य को नष्ट करनेवाला समझकर त्याग कर देना चाहिये अर्थात् उसे गद्दी से उतार देना चाहिये।

तत्पदे तस्य कुलजं गुणयुक्त पुरोहितः ॥ २७५ ॥
प्रकृत्यनुमतिं कृत्वा स्थापयेद्राज्यगुप्तये ।

और पुरोहित उस राजा के स्थान पर उस राजा के वंश में उत्पन्न राजगुणों से युक्त किसी को प्रकृतियों (अमात्यादिकों) की संमति लेकर राज्य की रक्षा के लिये स्थापित करे।

सास्त्रो दूरं नृपात्तिष्ठेदस्त्रपाताद्बहिः सदा ॥ २७६ ॥
सशस्त्रो दशहस्तं तु यथादिष्टं नृपप्रियाः ।
पञ्चहस्तं वरेयुर्वै मन्त्रिणो लेखकाः सदा ॥ २७७ ॥
सेनपैस्तु बिना नैव सशस्त्रास्त्रो विशेत्सभाम् ।

अस्त्र (बन्दूक या धनुष-बाण आदि) लिये हुये व्यक्ति को अस्त्र की मार

Page 185Permalink

द्वितीयोऽध्यायः [६६]

से बाहर दूरी पर राजा से दूर रहना चाहिये । शस्त्र (तलवार आदि) लिये हुये को १० हाथ दूर रहना चाहिये । एवं राजा के प्रिय को राजा के आदेशानुसार दूरी पर रहना चाहिये । तथा मन्त्री और लेखक को सदा राजा से ५ हाथ की दूरी पर बैठना चाहिये या जैसा जब राजा की आज्ञा हो तदनुसार दूरी पर बैठना चाहिये । और शस्त्र तथा अस्त्र को लिये हुये भी राजा को बिना सेनापतियों के अकेले राजसभा में नहीं बैठना चाहिये ।

पुरोहितः श्रेष्ठतरः श्रेष्ठः सेनापतिः स्मृतः ॥ २७८ ॥
समः सुहृच्च सम्बन्धी ह्युत्तमा मन्त्रिणः स्मृताः ।
अधिकारिगणो मध्योऽधमौ दर्शकलेखकौ ॥ २७६ ॥
ज्ञेयोऽधमतमो भृत्यः परिचारगणः सदा ।
परिचारगणान्न्यूनो विज्ञेयो नीचसाधकः ॥ २८० ॥

पुरोहित का पद सबसे श्रेष्ठ, सेनापति का श्रेष्ठ, राजा के मित्र तथा संबन्धी का पद सम कोटि का कहा हुआ है । एवं मन्त्रियों का उत्तम, अधिकारी गण का मध्यम, दर्शक तथा लेखक का अधम, भृत्य तथा परिचारक (गुलाम) गण का अधमतम और नीच (मल-मूत्रादि फेंकना आदि) कर्म करनेवालों का पद परिचारकगण से न्यून सदा जानना चाहिये ।

पुरोगमनमुत्थानं स्वासने सन्निवेशनम् ।
कुर्यात्सकुशलप्रश्नं क्रमात्सुस्मितदर्शनम् ॥ २८१ ॥
राजा पुरोहितादीनां त्वन्येषां स्नेहदर्शनम् ।
अधिकारिगणादीनां सभास्यश्च निरालसः ॥ २८२ ॥

और वह राजा पुरोहितादि पूज्यों के लिये क्रम से आगे जाकर ले आना, अपने आसन से शरीर उठाना और अपने आसन पर बैठाना, कुशल-प्रश्न पूछना तथा मुस्कुराते हुये देखना ये सब सम्मानार्थ करे । और उनसे अन्य अधिकारी गणों के लिये सभा में ही यथास्थान स्थित रह कर आलस्य छोड़कर केवल स्नेहपूर्वक देखना भर करे ।

विद्यावत्सु शरच्चन्द्रो निदाघार्को द्विषत्सु च ।
प्रजासु च वसन्तार्क इव स्यात्त्रिबिधो नृपः ॥ २८३ ॥

१. विद्वानों के लिये शरत्कालीन चन्द्रमा की भांति आह्लादजनक, २. शत्रुओं के लिये ग्रीष्मकालीन सूर्य की भांति असह्य और ३. प्रजाओं के लिये वसन्तकालीन सूर्य की भांति न मृदु, न तीक्ष्ण होने से राजा तीन प्रकार का कहा जाता है ।

यदि ब्राह्मणभिन्नेषु मृदुत्वं धारयेन्नृपः ।
परिभवन्ति तं नीचा यथा हस्तिपका गजम् ॥ २८४ ॥

Page 186Permalink

१०० | शुक्रनीतिः

यदि ब्राह्मणों से भिन्न लोगों के लिये राजा मृदुता धारण करता है तो नीच लोग महावत की भांति होकर हाथी के समान उस राजा का तिरस्कार करने लगते हैं ।

भृत्याद्यैर्न कर्तव्याः परिहासाश्च क्रीडनम् ।
अपमानास्पदे ते तु राज्ञो नित्यं भयावहे ॥ २८५ ॥

भृत्यादियों के साथ राजा को परिहास (हंसी-मजाक) करना तथा खेल नहीं खेलना चाहिये, क्योंकि राजा के लिये ये दोनों सदा अपमानजनक तथा भय देनेवाले हैं ।

पृथक् पृथक् ख्यापयन्ति स्वार्थसिद्धयै नृपाय ते ।
स्वकार्यं गुणवत् कृत्वा सर्वे स्वार्थपरा यतः ॥ २८६ ॥

क्योंकि साथ में खेल खेलनेवाले या परिहास करनेवाले सभी भृत्य लोग (वेतनभोगी जन) पृथक् २ अपनी स्वार्थ-सिद्धि करने में लीन होने से अपने ही कार्य को अन्य की अपेक्षा अधिक गुणयुक्त (सुन्दर) सिद्ध करते हुये राजा को विदित करने का प्रयत्न किया करते हैं ।

विकल्पन्तेऽवमन्यन्ते लंघयन्ति च तद्वचः ।
राजभोज्यानि भुञ्जन्ति न तिष्ठन्ति स्वके पदे ॥ २८७ ॥
विशंसयन्ति तन्मन्त्रं विध्रुवन्ति च दुष्कृतम् ।
भवन्ति नृपवेषा हि वञ्चयन्ति नृपं सदा ॥ २८८ ॥
तत्स्त्रियं सञ्जयन्ति स्म राज्ञि क्रुद्धे हसन्ति च ।
व्याहरन्ति च निर्लज्जा हेलयन्ति नृपं क्षणात् ॥ २८९ ॥
आज्ञामुल्लङ्घयन्ति स्म न भयं यान्त्यकर्मणि ।
एते दोषाः परीहासक्षमाक्रीडोद्भवा नृपे ॥ २९० ॥

राजा के लिये भृत्यों के साथ खेल खेलने या परिहास या क्षमा (अपराध सहन) करने से निम्नलिखित ये दोष उत्पन्न होते हैं—जिससे वे सब (भृत्य लोग) उस राजा के वचनों को कभी तर्क उपस्थित करके अपने मनसे छोड़ देते हैं (नहीं करते हैं), कभी उसका तिरस्कार और कभी उल्लंघन कर देते हैं। और बिना राजाज्ञा के राजा के लिये रखे हुये भोज्य पदार्थों को खा लेते हैं। एवं अपने अधिकारोचित पद के अनुरूप व्यवहार नहीं करते हैं अर्थात् लापरवाही दिखाते हैं। और कभी राजा के गुप्त विचार एवं दुष्कर्मों को अन्यत्र प्रकट कर देते हैं और राजा के समान वेष-भूषादि धारण करते हैं तथा राजा को सदा ही ठगा करते हैं। और राजा की पटरानी को भी अपनी स्वार्थ-सिद्धि के विषय में राजा से कहने के लिये अथवा स्वयं करने के लिये बाध्य करते हैं। राजा के क्रुद्ध होने पर हँसते हैं। निर्लज्ज होकर बात-चीत

Page 187Permalink

द्वितीयोऽध्यायः
१०१

करते हैं। क्षण भर में ही राजा को झुका लेते हैं। और अन्त में राजाज्ञा (कानून) का भी उल्लंघन करते हैं। नीच कर्म करने पर भी राजा से नहीं डरते हैं।

न कार्यं भृतकः कुर्यान्नृपलेखाद्विना क्वचित् ।
नाज्ञापयेल्लेखनेन ऽविनाऽल्पं वा महन्नृपः ॥ २६१ ॥
भ्रान्तेः पुरुषधर्मत्वाल्लेख्यं निर्णायकं परम् ।

भृत्य को बिना लिखित राजाज्ञा के कभी कोई कार्य नहीं करना चाहिये । और राजा को भी बिना लिखे छोटी या बड़ी कोई भी आज्ञा नहीं देनी चाहिये । अर्थात् सदा लिखित आज्ञा देनी चाहिये। 'भ्रम हो जाना' यह मनुष्य का स्वभाव है, इससे भ्रम-निवारणार्थ निर्णय करने में लेख बहुत बड़ा प्रमाण सिद्ध होता है ।

अलेख्यमाज्ञापयति ह्यलेख्यं यत्करोति यः ॥ २६२ ॥
राजकृत्यमुभौ चोरौ तौ भृत्यनृपती सदा ।

जो राजा बिना लिखे आज्ञा देता है और जो भृत्य बिना लिखित राजाज्ञा के अनुसार राजकार्य करता है, वे दोनों (राजा तथा भृत्य) चोर हैं अर्थात् अनुचित करनेवाले निन्दनीय हैं ।

नृपसंविहितं लेख्यं नृपस्तन्न नृपो नृपः ॥ २६३ ॥

जो राजमुद्रा से अङ्कित (मोहर किया हुआ) राजाज्ञा है वही वस्तुतः राजा है किन्तु राजा-राजा नहीं है ।

समुद्रं लिखितं राज्ञा लेख्यं तच्चोत्तमोत्तमम् ।
उत्तमं राजलिखितं मध्यं मन्त्र्यादिभिः कृतम् ॥ २६४ ॥
पौरलेख्यं कनिष्ठं स्यात्सर्वं संसाधनक्षमम् ।

लेख्यों के भेदों का निर्देश— जो राजा से लिखित आज्ञा मोहरयुक्त होती है वह उत्तमोत्तम है, जो केवल राजा से स्वयं लिखित है अर्थात् हस्ताक्षर मात्र है वह साधारण उत्तम है, मन्त्रियों द्वारा लिखित (आज्ञा) मध्यम, तथा पुरवासियों के द्वारा लिखित कनिष्ठ माना गया है । उक्त सभी लेख कार्य को सिद्ध करने में समर्थ हैं ।

यस्मिन्यस्मिन्हि कृत्ये तु राज्ञा योऽधिकृतो नरः ॥ २६५ ॥
सामात्ययुवराजादिर्यथानुक्रमतश्च सः ।
दैनिकं मासिकं वृत्तं वार्षिकं बहुवार्षिकम् ॥ २६६ ॥
तत्कार्यजातलेख्यं तु राज्ञे सम्यङ् निवेदयेत् ।

जिन-जिन कार्यों के लिये अमात्य-युवराजादि अधिकारी बनाये गये हैं वे सब अनुक्रम से अपने २ कार्यों का विवरण दैनिक, मासिक, वार्षिक (पृक

Page 188Permalink

१०२ | शुक्रनीतिः

वर्ष भर का ), बहुवार्षिक ( बहुत वर्षों का ) रूप में अच्छी तरह से लिखें। और उसे राजा के समक्ष उपस्थित कर दिखावें।

राजाद्यंकितलेख्यस्य धारयेत्स्मृतिपत्रकम् ॥ २९७ ॥
कालेऽतीते विस्मृतिर्वा भ्रान्तिः संजायते नृणाम् ।

राजादि के द्वारा लिखित लेखपत्र का स्मरण दिखानेवाला एक 'स्मृतिपत्र'-फाइल और रसीद रखे। क्योंकि बहुत समय बीतने पर विस्मृति या भ्रम हो जाना मनुष्यों के लिये स्वाभाविक है।

अनुभूतस्य स्मृत्यर्थे लिखितं निर्मितं पुरा ॥ २९८ ॥
यत्नाच्च ब्रह्मणा वाचां वर्ण-स्वर-विचिह्नितम् ।

क्योंकि पुराकाल में ब्रह्माजी ने अनुभव के स्मरणार्थ तथा स्वरों का चिह्न ( अक्षर ) स्वरूप लेख की परिपाटी बनाई थी अर्थात् इसका प्रारम्भ ब्रह्मा जी से हुआ है।

वृत्तलेख्यं तथा चायव्ययलेख्यमिति द्विधा ॥ २९६ ॥
व्यवहारक्रियाभेदादुभयं बहुतां गतम् ।

लेख के दो भेदों का निर्देश—इस लेख के दो भेद हैं—प्रथम—वृत्त ( समाचार ) संबन्धी, द्वितीय—आय-व्यय संबन्धी इनमें प्रत्येक के व्यवहार-संबन्धी क्रियाओं में भेद होने से बहुत से भेद होते हैं।

यथोपन्यस्तसाध्यार्थसंयुक्तं सोत्तरक्रियम् ॥ ३०० ॥
सावधारणकं चैव जयपत्रकमुच्यते ।

जयपत्रक के लक्षण—जिसमें यथायोग्य कहे हुये अभियोग के विषयों का एवं उसके उत्तर में कही हुई बातों का तथा अन्तिम निर्णय का लेख लिखा हो उसे 'जयपत्रक' कहते हैं।

सामन्तेष्वथ भृत्येषु राष्ट्रपालादिकेषु यत् ॥ ३०१ ॥
कार्यमादिश्यते येन तदाज्ञापत्रमुच्यते ।

आज्ञापत्र के लक्षण—जिस लेख द्वारा, सामन्तों ( अधीनवर्त्ती राजाओं ) अथवा राष्ट्रपालादि ( गवर्नर आदि ) भृत्यों को राजा आदेश देता है उसे 'आज्ञापत्र' कहते हैं।

ऋत्विक्पुरोहिताचार्यमन्येष्वभ्यर्चितेषु च ॥ ३०२ ॥
कार्यं निवेद्यते येन पत्रं प्रज्ञापनाय तत् ।

प्रज्ञापनपत्र के लक्षण—ऋत्विक्, पुरोहित तथा आचार्य एवं अन्य भी पूज्य लोगों के लिये जिस लेख के द्वारा राजा कार्य सूचित करता है, उसे 'प्रज्ञापनपत्र' कहते हैं।

सर्वे शृणुत कर्तव्यमाज्ञया मम निश्चितम् ॥ ३०३ ॥

Page 189Permalink

द्वितीयोऽध्यायः [१०३]

स्वहस्तकालसम्पन्नं शासनं पत्रमेव तत्।
शासनपत्र के लक्षण— जिसमें यह लिखा रहता है कि—'हे भृत्यो या प्रजा लोगो ! तुम मेरी बात सुनो और मेरी आज्ञा से निश्चित किये हुये कर्त्तव्य कर्म को करो'—ऐसा अपने हस्ताक्षर से सही किया हुआ एवं समय के उल्लेख से युक्त पत्र 'शासनपत्र' कहलाता है।

देशादिकं यस्य राजा लिखितेन प्रयच्छति ॥ ३०४ ॥
सेवाशौर्यादिभिस्तुष्टः प्रसादलिखितं हि तत् ।
प्रसादलिखित के लक्षण— राजा सेवा और शूरता आदि से प्रसन्न होकर जिस लेख के द्वारा किसी के लिये देश आदि को पुरस्कार रूप में देता है उसे 'प्रसादलिखित' कहते हैं।

भोगपत्रं तु करदीकृतं चोपायनीकृतम् ॥ ३०५ ॥
पुरुषावधिकं तत्त कालावधिकमेव वा ।
भोग-कर-उपायन-पुरुषावधिक और कालावधिक पत्रों के लक्षण— और 'तुम इसका उपभोग करो' यह जिसमें लिख कर दिया जाता है, उसे 'भोगपत्र' कहते हैं। 'इसका यह राजस्व (कर = मालगुजारी) है' यह जिसमें लिखकर दिया जाता है उसे 'करपत्र' एवं उपहार रूप में जो द्रव्य दिया जाता है उसके विषय में जो लेख है उसे 'उपायनपत्र' कहते हैं। 'इस वस्तु का एक, दो या तीन पुरुषों को उपभोग करना चाहिये' यह लिखकर जो दिया जाता है, उसे 'पुरुषावधिक' एवं 'इस वस्तु का इतने समय तक उपभोग करना चाहिये' इस भांति से काल का उल्लेख करके जो दिया जाता है उसे 'कालावधिक' पत्र कहते हैं।

विभक्ता ये च भ्रात्राद्याः स्वरुच्या तु परस्परम् ॥ ३०६ ॥
विभागपत्रं कुर्वन्ति भागलेख्यं तदुच्यते ।
विभागपत्र या भागलेख्य के लक्षण— अपनी इच्छा से परस्पर अलग हुये भाई लोग जो विभाग-सम्बन्धी लेख जिसमें लिखते हैं उसे 'विभागपत्र' अथवा 'भागलेख्य' कहते हैं।

गृहभूम्यादिकं दत्त्वा पत्रं कुर्यात्प्रकाशकम् ॥ ३०७ ॥
अनुच्छेद्यमनाहार्यं दानलेख्यं तदुच्यते।
दानपत्र के लक्षण— किसी को दानरूप में गृहादिक देकर उसके सम्बन्ध में यह लिखे कि 'इसका कोई खण्डन या अपहरण न करे' इस विषय को जनता के समक्ष घोषित करने वालापत्र 'दान पत्र' कहलाता है।

गृहक्षेत्रादिकं क्रीत्वा तुल्यमूल्यप्रमाणयुक् ॥ ३०८ ॥
पत्रं कारयते यत्तु क्रयलेख्यं तदुच्यते।

Page 190Permalink
१०४शुक्रनीतिः

**क्रयपत्र के लक्षण—**गृह, क्षेत्र ( खेत ) आदि को योग्य मूल्य और परिमाण के साथ खरीद कर उसके विषय में जो लेख लिखा जाता है उसे 'क्रयपत्र' कहते हैं ।

जङ्गमस्थावरं बन्धं कृत्वा लेख्यं करोति यत् ॥ ३०६ ॥
गोप्यभोग्यक्रियायुक्तं साधिलेख्यं तदुच्यते ।

**साधिलेख्य के लक्षण—**जिसमें जङ्गम ( सोना-चांदी आदि ) और स्थावर ( गृह-भूमि आदि ) को बन्धक रूप में रखकर उसके संबन्ध में यह लिखता है कि—'यह रक्षणीय तथा उपभोग करने योग्य है' उसे 'साधिलेख्य' कहते हैं ।

ग्रामो देशश्च यत्कुर्यात्सत्यलेख्यं परस्परम् ॥ ३१० ॥
राजाविरोधिधर्मार्थं संवित्पत्रं तदुच्यते ।

**संवित्पत्र के लक्षण—**ग्राम तथा नगर के लोग जो परस्पर राजा का अवि-रोधी धर्मरक्षा के लिये प्रतिज्ञाबद्ध होकर लिखते हैं उसे 'संवित्पत्र' कहते हैं ।

वृद्ध्यर्थं धनं गृहीत्वा तु कृतं वा कारितं च यत् ॥ ३११ ॥
ससाक्षिमच्च तत्प्रोक्तमृणलेख्यं मनीषिभिः ।

**ऋणलेख्य के लक्षण—**सूद पर रुपया लेकर साक्षियों के साथ भली-भाँति स्वयं लिखे हुये या लिखाये हुये लेख को पण्डित लोग 'ऋणलेख्य' कहते हैं ।

अभिशापे समुत्तीर्णे प्रायश्चित्ते कृते बुधैः ॥ ३१२ ॥
दत्तं लेख्यं साक्षिमयच्छुद्धिपत्रं तदुच्यते ।

**शुद्धिपत्र के लक्षण—**लगाये हुये अपवाद के प्रमाणित न होने से दूर होने पर, एवं प्रायश्चित्त कर चुकने.पर साक्षी ( गवाही ) लोगों के हस्ताक्षरयुक्त विद्वानों के द्वारा जो लेख लिखकर प्रमाण रूप में दिया जाता है, उसे 'शुद्धिपत्र' कहते हैं ।

मेलयित्वा स्वधनांशान् व्यवहाराय साधकाः ॥ ३१३ ॥
कुर्वन्ति लेखपत्रं यत्तच्च सामयिकं स्मृतम् ।

**सामयिक लेख्यपत्र लक्षण—**मिलकर के ( कम्पनी के रूप में ) व्यवसाय करनेवाले जो लोग हैं वे लोग अपने-अपने हिस्सों के अनुसार धन को उस (व्यवसाय) में लगा कर जो लेखपत्र लिखते हैं, उसको 'सामयिक' लेखपत्र कहते हैं ।

सभ्याधिकारिप्रकृतिसभासद्भिर्न यः कृतः ॥ ३१४ ॥
तत्पत्रं वादिमान्यं चेज्ज्ञेयं संमतिसंज्ञकम् ।

**संमतिसंज्ञक पत्र के लक्षण—**श्रेष्ठ अधिकारी गण या अमात्यादि प्रधान पुरुष अथवा सभासद् ( जूरी ) लोगों ने जो अपने निर्णयों को नहीं प्रदर्शित

द्वितीयोऽध्यायः १०५

Page 191Permalink

द्वितीयोऽध्यायः १०५

किया है वे यदि वादी को मान्य हों तो उसके विषय में लिखे हुये पत्र को 'संमतिसंज्ञक पत्र' कहते हैं।

स्वकीयवृत्त-ज्ञानार्थं लिख्यते यत्परस्परम् ॥ ३१५ ॥
श्रीमंगलपदाढ्यं वा सपूर्वोत्तरपक्षकम् ।
असंदिग्धमगूढार्थं स्पष्टाक्षरपदं सदा ॥ ३१६ ॥
अन्यव्यावर्त्तकस्वात्म-परपित्रादिनामयुक् ।
एक-द्वि-बहुवचनै-र्यथार्ह-स्तुतिसंयुतम् ॥ ३१७ ॥
समामासतदर्द्धार्हनामजात्यादिचिह्नितम् ।
कार्यबोधि सुसम्बन्धं नत्याशीर्वादपूर्वकम् ॥ ३१८ ॥
स्वाम्यसेवकसेव्यार्थं क्षेमपत्रं तु तत्स्मृतम् ।

**क्षेमपत्र के लक्षण—**अपने समाचारों को सूचित करने के लिये सदा श्री तथा मङ्गलसूचकशब्दों से प्रारम्भ करके प्रश्न तथा उत्तरों से युक्त, सन्देहरहित, स्पष्ट अर्थ तथा वांचने योग्य अक्षरों से युक्त शब्दों से भरा हुआ, दूसरे का ग्रहण न हो इसलिये अपने तथा दूसरे के पिता आदि के नामों से युक्त, एक, दो या बहुवचनों से यथायोग्य प्रशंसा से भरे हुये, वर्ष, मास, पक्ष तथा दिन नाम तथा जातिबोधक शब्दों से युक्त, कार्य को सूचित करनेवाला, सुसंगत, नमस्कार ( बड़ों के लिये ) एवं आशीर्वाद ( छोटों के लिये ) पूर्वक, स्वामी तथा सेवक का परस्पर सेवा-संबन्ध को लेकर जो पत्र लिखा जाता है उसे 'क्षेमपत्र' कहते हैं।

एभिरेव गुणैर्युक्तं स्वार्थाधर्षकविबोधकम् ॥ ३१९ ॥
भाषापत्रं तु तज्ज्ञेयमथवा वेदनार्थकम् ।

**वेदनार्थक पत्र के लक्षण—**उपर्युक्त इन्हीं सभी गुणों से युक्त, अपनी पीड़ाओं को व्यक्त करनेवाला जो पत्र होता है उसे 'भाषापत्र' अथवा 'वेदनार्थक पत्र' कहते हैं।

प्रदर्शितं वृत्तलेख्यं-समासाल्लक्षणान्वितम् ॥ ३२० ॥
समासात्कथ्यते चान्यच्छ्रेष्ठायव्ययबोधकम् ।

**आय-व्यय लेख्य के लक्षण—**इस तरह से संक्षेप में अपने-अपने लक्षणों से युक्त प्रथम 'वृत्त लेख्य' के भेदों को प्रदर्शित किया अब द्वितीय 'आय-व्यय-लेख्य' का संक्षेप से वर्णन कर रहे हैं।

व्याप्यव्यापकभेदैश्च मूल्यमानादिभिः पृथक् ॥ ३२१ ॥
विशिष्टसंज्ञितैस्तद्धि यथार्थैर्बहुभेदयुक् ।

**राजाओं के आय-व्ययादिक के लक्षण—**आय-व्यय-लेख्य या पत्र व्याप्य (अल्पविषयक) और व्यापक (बहुविषयक) भेदों से, बहुत या थोड़ा होने से,

Page 192Permalink

१०६ शुक्रनीतिः

पृथक्-पृथक् यथार्थ मूल्य और मान (तौल) आदि से अनेक भेदों से युक्त अनेक प्रकार का) होता है।

वत्सरे वत्सरे वापि मासि मासि दिने दिने ॥ ३२२ ॥
हिरण्यपशुधान्यादि स्वाधीनं त्वायसंज्ञकम् ।
पराधीनं कृतं यत्त व्ययसंज्ञं धनं च तत् ॥ ३२३ ॥

प्रतिवर्ष, प्रतिमास और प्रतिदिन जो सोना, पशु तथा धान्य आदि जो अपने अधीन हो जाता है अर्थात् अपने पास आता है। वह 'आय' कहलाता है। और जो सोना आदि धन दूसरे के आधीन कर दिया (दे दिया) जाता है वह 'व्यय' कहलाता है।

सद्यस्कश्चैव प्राचीन आयः सञ्चितसंज्ञकः ।
व्ययो द्विधा चोपभुक्तस्तथा विनिमयात्मकः ॥ ३२४ ॥

आय के भेद— और आय दो प्रकार का होता है, एक तात्कालिक दूसरा प्राचीन, जिसे 'संचित' भी कहते हैं। एवं व्यय भी दो प्रकार का होता है, एक उपभुक्त (उपभोग किया हुआ), दूसरा विनिमयात्मक (किसी वस्तु के बदले के रूप में दिया हुआ)।

निश्चितअन्यस्वामिकञ्चानिश्चितस्वामिकन्तथा ।
स्वस्वत्वनिश्चितं चेति त्रिविधं सञ्चितं मतम् ॥ ३२५ ॥

संचित आय के भेद— सञ्चित आय तीन प्रकार का होता है। एक निश्चितअन्यस्वामिक (जिसका दूसरा कोई स्वामी निश्चित है), दूसरा-अनिश्चितस्वामिक (जिसके स्वामी का निश्चय नहीं है), तीसरा स्व-स्वत्वनिश्चित (अपना स्वत्व जिस पर निश्चित है अर्थात् निजी) संज्ञक सञ्चित आय है।

निश्चितअन्यस्वामिकं यद्धनं तु त्रिविधं हि तत् ।
औपनिध्यं याचितकमौत्तमर्णिकमेव च ॥ ३२६ ॥

निश्चितअन्यस्वामिक संचित धन के भेद— इसमें प्रथम जो निश्चितअन्यस्वामिक संचित धन है, वह तीन प्रकार का है उसमें पहला औपनिध्य, दूसरा याचितक तीसरा औत्तमर्णिक है।

विस्रम्भान्निहितं सद्भिर्र्यदौपनिधिकं हि तत् ।
अवृद्धिकं गृहीतान्यालङ्कारादि च याचितम् ॥ ३२७ ॥
सवृद्धिकं गृहीतं यदृण तच्चौत्तमर्णिकम् ।

औपनिध्य-याचित-औत्तमर्णिक के लक्षण— जो धन किसी सज्जन द्वारा विश्वास मानकर किसी के पास रखा जाता है वह 'औपनिधिक' (औपनिध्य) कहलाता है। जो बिना सूद का दूसरे से अलङ्कार आदि (रुपया आदि) लिया जाता है वह 'याचित' कहलाता है। और जो सूद पर ऋण लिया जाता है वह 'औत्तमर्णिक' कहलाता है।

द्वितीयोऽध्यायः १०७

Page 193Permalink

द्वितीयोऽध्यायः १०७

निध्यादिकं च मार्गादौ प्राप्तमज्ञातस्वामिकम् ॥ ३२८ ॥
अज्ञातस्वामिक के लक्षण— और जो मार्ग आदि में किसी का भूल से छूट गया, गिरा हुआ किंवा कहीं पर गड़ा हुआ निध्यादि धन मिल जाता है वह 'अज्ञातस्वामिक' अर्थात् 'अनिश्चितस्वामिक' कहलाता है ।

साहजिकं चाधिकं च द्विधा स्वत्वविनिश्चितम् ।
स्वत्वविनिश्चित के भेद— और स्वत्वविनिश्चितअर्थात् स्वस्वत्वनिश्चित किंवा निश्चितस्वस्वत्व धन दो प्रकार का होता है प्रथम साहजिक, द्वितीय अधिक कहलाता है ।

उत्पद्यते यो नियतो दिने मासि च वत्सरे ॥ ३२९ ॥
आयः साहजिकः सैव दायाद्यश्च स्ववृत्तितः ।
साहजिक के लक्षण— इनमें जो धन का आय दाय ( पैत्रिक संपत्ति में से अपने हिस्से ) या वृत्ति ( व्यवसाय आदि ) के द्वारा निश्चित रूप से दिन, मास अथवा वर्ष भर में होता है वह 'साहजिक' कहलाता है ।

दायः परिग्रहो यस्तु प्रकृष्टं तत्स्वभावजम् ॥ ३३० ॥
और दाय ( पैत्रिक धन ) एवं परिग्रह ( दान लेने ) से जो आय होता है वह बिना क्लेश के मिलने से उत्तम स्वभावज ( साहजिक ) कहलाता है ।

मौल्याधिक्यं कुसीदं च गृहीतं याजनादिभिः ।
पारितोष्यं भृतिप्राप्तं विजिताद्यं धनं च यत् ॥ ३३१ ॥
स्वस्वत्वेऽधिकसंज्ञं तदन्यत्साहजिकं स्मृतम् ।
अधिक के लक्षण— जो उचित मूल्य से अधिक रूप में या सूद रूप में किंवा यज्ञ आदि कराने से प्राप्त हुआ एवं पारितोषिक ( इनाम ) या वेतन किंवा युद्ध आदि के द्वारा जीत रूप में प्राप्त हुआ धन है वह अपने स्वत्व से अधिक होने से 'अधिक' संज्ञक कहलाता है । इससे अन्य रीति से जो धन प्राप्त होता है वह 'साहजिक' कहलाता है ।

पूर्ववत्सरशेषं च वर्तमानोब्दसम्भवम् ॥ ३३२ ॥
स्वाधीनं सञ्चितं द्वेधा धनं सर्वं प्रकीर्तितम् ।
संचित धन के लक्षण— स्वाधीन संचित सम्पूर्ण धन दो प्रकार का होता है प्रथम-पूर्व वर्ष का शेष, और वर्त्तमान वर्ष का संचित धन है ।

द्वेधाधिकं साहजिकं पार्थिवेतरभेदतः ॥ ३३३ ॥
भूमिभागसमुद्भूत आयः पार्थिव उच्यते ।
संचित धन के भेद— अधिक और साहजिक भेद से पूर्वोक्त दो प्रकार के जो आय हैं वे प्रत्येक पार्थिव ( स्थावर ) तथा इतर ( जङ्गम = चल ) भेद

Page 194Permalink
१०८शुक्रनीतिः

से दो प्रकार के हैं। इनमें से पार्थिव आय वह कहलाता है जो भूमि के भागों से उत्पन्न हो ।

स देवकृत्रिमजलैर्देशग्रामपुरैः पृथक् ॥ ३३४ ॥
बहुमध्याल्पफलतो भिद्यते भूविभागतः ।

**पार्थिव संज्ञक आय के भेद—**उस पार्थिवसंज्ञक आय के देवालयों, कृत्रिम ( कल्पित ) वस्तुओं, जल, देश, ग्राम तथा पुरों से पृथक्-पृथक् विभिन्न हुये भूमि-संबन्धी विभागों से एवं बहुत ( अधिक ), मध्यम तथा अल्प फलों से अनेक भेद होते हैं ।

शुल्कदण्डाकरकरभाटकोपायनादिभिः ॥ ३३५ ॥
इतरः कीर्त्तितस्तज्ज्ञैरायो लेखविशारदैः ।

**चल संज्ञक आय के लक्षण—**और व्यवसायी आदि लोगों से प्राप्त होने वाले शुल्क ( चुंगी-टैक्स ), दण्ड ( जुर्माना ), खान, कर ( मालगुजारी ), भाटक ( भाड़ा ), उपायन ( नजर-भेंट ), इत्यादि से होनेवाले आय को आय का ज्ञान रखनेवाले एवं लिखने में ( हिसाब लिखने में ) चतुर लोगों ने इतर अर्थात् चल-संज्ञक कहा है ।

यन्निमित्तो भवेदायो व्ययस्तन्नामपूर्वकः ॥ ३३६ ॥
व्ययश्चैव समुद्दिष्टो व्याप्यव्यापकसंयुतः ।

**विभागानुसार आय-व्यय के व्याप्य-व्यापक का निर्देश—**जिस निमित्त ( विभाग ) से जो आय होता है व्यय भी उसी निमित्त ( विभाग ) के नाम में होता है । अर्थात् जिस विभाग में आय होता है उस विभाग में व्यय भी होता है। और आय की भांति व्यय भी व्याप्य-व्यापक से युक्त है अर्थात् स्वल्प तथा बहुविषयक कहा हुआ है ।

पुनरावर्तकः स्वत्वनिवर्त्तक इति द्विधा ॥ ३३७ ॥
व्ययो यन्निध्युपनिधीकृतो विनिमयीकृतः ।
सकुसीदाकुसीदाधमर्णिकश्चावृत्तः स्मृतः ॥ ३३८ ॥

**व्यय के भेदों एवं पुनरावर्त्तक के लक्षण—**वह व्यय दो प्रकार का होता है, एक-पुनरावर्त्तक ( फिर लौटकर आनेवाला ), दूसरा स्वत्वनिवर्त्तक ( देने वाले के स्वत्व को निवृत्त करनेवाला ) कहलाता है । जो व्यय निधि, उपनिधि या विनिमय रूप में हुआ है एवं सूद-सहित या बिना सूद का इस भांति से दो प्रकार का आधमर्णिक ये सब आवृत्त ( पुनरावर्त्तक ) संज्ञक कहलाते हैं ।

निधिर्भूमौ विनिहितोऽन्यस्मिन्तुपनिधिः स्थितः ।
दत्तमूल्यादिसंप्राप्तः स वै विनिमयीकृतः ॥ ३३६ ॥
वृद्ध्याऽवृद्ध्या च यो दत्तः स वै स्यादाधमर्णिकः ।

Page 195Permalink

द्वितीयोऽध्यायः [१०६]

सवृद्धिकमृणं दत्तमकुसीदं तु याचितम् ॥ ३४० ॥

निधि, उपनिधि आदि व्यय के लक्षण— निधि (निधीकृत) व्यय उसे कहते हैं जो पृथ्वी में गाड़ दिया जाता है, इसको अत्यन्त कष्ट पड़ने पर भी ग्रहण नहीं किया जाता है—अतः यह भी एक प्रकार का व्यय ही है। उप-निधि (उपनिधीकृत) व्यय वह है जो दूसरे के पास रखा हुआ है। विनिमयीकृत व्यय उसे कहते हैं जो दिये हुये मूल्यादि से बदले में मिला हुआ है। सूद पर या बिना सूद के जो दिया गया है उसे आधमर्णिक व्यय कहते हैं। इसमें सूद पर जो दिया जाता है उसे ऋण और बिना सूद के जो दिया जाता है उसे याचित (हथ-उधार) कहते हैं।

स्वत्वनिवर्त्तको द्वेधा त्वैहिकः पारलौकिकः ।

स्वत्वनिवर्त्तक के भेद— स्वत्वनिवर्त्तक व्यय दो प्रकार का होता है प्रथम—ऐहिक, द्वितीय—पारलौकिक।

प्रतिदानं परितोष्यं वेतनं भोग्यमैहिकः ॥ ३४१ ॥
चतुर्विधस्तथा पारलौकिकोऽनन्तभेदभाक् ।
शेषं संयोजयेन्नित्यं पुनरावर्तको व्ययः ॥ ३४२ ॥

ऐहिक तथा पारलौकिक व्यय के भेद— उसमें प्रतिदान, परितोष्य वेतन और भोग्य रूप से ऐहिक के ४ भेद होते हैं। और पारलौकिक के अनन्त भेद होते हैं। जो नित्य शेष को रोकड़ में मिलाया जाता है वह भी पुनरावर्त्तक व्यय कहलाता है।

मूल्यत्वेन च यद्दत्तं प्रतिदानं स्मृतं हि तत् ।
सेवाशौर्यादिसंतुष्टैर्दत्तं तत्पारितोषिकम् ॥ ३४३ ॥
भृतिरूपेण संदत्तं वेतनं तत् प्रकीर्तितम् ।

प्रतिदान, पारितोषिक और वेतन व्यय के लक्षण— मूल्य रूप में जो दिया जाता है उसे 'प्रतिदान' कहते हैं। सेवा तथा शूरता आदि से प्रसन्न होकर जो दिया जाता है, उसे 'पारितोषिक' (परितोष्य) कहते हैं। भरण-पोषणार्थ जो भृत्यों को दिया जाता है उसे 'वेतन' कहते हैं।

धान्यवस्त्रगृहाराम-गोगजादिरथार्थकम् ॥ ३४४ ॥
विद्याराज्याद्यर्जनार्थं धनाप्त्यर्थं तथैव च ।
व्ययीकृतं रक्षणार्थमुपभोग्यं तदुच्यते ॥ ३४५ ॥

उपभोग्य के लक्षण— धान्य, वस्त्र, गृह, बगीचा, गो, गज आदि तथा रथ के लिये एवं विद्या तथा राज्य आदि के उपार्जन के लिये और धन आदि की प्राप्ति के लिये एवं इन सबों की रक्षा के लिये जो व्यय किया जाता है उसे 'उपभोग्य' कहते हैं।

Page 196Permalink
११०शुक्रनीतिः

सुवर्णरत्नरजतनिष्क्शालास्तथैव च ।
रथाश्वगोगजोष्ट्राजावीनशालाः पृथक् पृथक् ॥ ३४६ ॥
वाद्यशास्त्रास्त्रवस्त्राणां धान्यसम्भारयोस्तथा ।
मन्त्रिशिल्पनाट्यवैद्यमृगाणां पाकपक्षिणाम् ॥ ३४७ ॥
शाला भोग्ये निविष्टास्तु तद्व्ययो भोग्य उच्यते ।

**भोग्य व्यय के लक्षण—**सोना, रत्न, चांदी, निष्क (मोहर-स्वर्ण मुद्रा) रखने के जो स्थान हैं एवं रथ, घोड़े, गौ, गज, ऊंट, बकरे, मेडे आदि के तथा इनके अध्यक्षों के लिये पृथक्-पृथक् बने हुये जो स्थान (गृह) हैं। और वाद्य (बाजे), शस्त्र, अस्त्र, धान्य, संभार (नाना प्रकार की सामग्री) रखने के लिये जो स्थान हैं तथा मन्त्री, शिल्प, नाट्य (नाटक-संबन्धी), वैद्य, मृग, पाक, पक्षी इनके लिये जो स्थान हैं, उन सबों की गणना भोग्य के अन्दर है अतः इन सबों के संबन्ध में होनेवाले व्यय को भी 'भोग्य' कहते हैं।

जपहोमार्चनैर्दानैश्चतुर्धा पारलौकिकः ॥ ३४८ ॥
पुनर्यातो निवृत्तश्च विशेषायायव्ययौ च तौ।
आवर्तको निवर्ती च व्ययायौ तु पृथग्विधा ॥ ३४९ ॥

**पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण—**जप, होम, पूजन तथा दान भेद से पारलौकिक व्यय के मुख्य चार भेद होते हैं। और जो आय आकर पुनः जानेवाला हो उसे विशेष आय एवं जो व्यय जाकर पुनः आनेवाला हो उसे विशेष व्यय कहते हैं। अतः व्यय तथा आय ये दोनों पृथक् २ आवर्त्तक (वापस आनेवाले) निवर्ती (नहीं वापस आनेवाले) भेदों से दो २ प्रकार के होते हैं ।।

आवर्तकविहीनौ तु व्ययायौ लेखको लिखेत् ।

**आय-व्यय-लेखक के कर्तव्य—**लेखक वापस आनेवाले और वापस न आनेवाले व्यय तथा आयको लिखे।

क्रयाधमर्णघटनान्यस्थलाप्तो विवर्तकः ॥ ३५० ॥
द्रव्यं लिखित्वा दद्यात्तु गृहीत्वा विलिखेत्स्वयम् ।

क्रय (खरीदना), अधमर्ण की घटनाओं (ऋणादि व्यवहारों) एवं अन्य विषयों में विश्वासपात्र लेखक स्वयं द्रव्य लिखकर तब देवे या लेवे।

हीयते वर्धते नैवमायव्ययविलेखकः ॥ ३५१ ॥

इस प्रकार से आय-व्यय के लिखनेवाले का लिखा आय तथा व्यय न कम होता है और न बढ़ता है।

हेतुप्रमाणसम्बन्धकार्याङ्गव्याप्यव्यापकैः ।
आयाश्च बहुधा भिन्ना व्ययाः शेषं पृथक् पृथक् ॥ ३५२ ॥

Page 197Permalink

द्वितीयोऽध्यायः । १११

मानेन संख्यया चैवोन्मानेन परिमाणकैः ।
अवशिष्ट आय के विविध भेद— अवशिष्ट आय और पृथक् २ कारण, प्रमाण, संबन्ध (संयोग), कार्याङ्ग (कार्यों के अवान्तर व्यापार), व्याप्य (थोड़े विषय), व्यापक (बहुत विषय), मान, संख्या, उन्मान और परिमाण इन सबों के द्वारा बहुत प्रकार से भिन्न २ होते हैं।

क्वचित्संख्या क्वचिन्मानमुन्मानं परिमाणकम् ॥ ३५३ ॥
समाहारः क्वचिच्चेष्टो व्यवहारार्य तद्विदाम् ।
किसी प्रदेश में मानादि का ज्ञान रखनेवाले लोगों को व्यवहार के लिये संख्या, कहीं पर मान, कहीं पर उन्मान, कहीं पर परिमाण और कहीं पर समाहार (संख्यादियों का समुदाय) अभीष्ट होता है।

अङ्गुलाद्यं स्मृतं मानमुन्मानं तु तुला स्मृता ॥ ३५४ ॥
परिमाणं पात्रमानं संख्यैकद्व्यादिसंज्ञिका ।
मान-उन्मान-परिमाण संख्या के लक्षण— अंगुलि या हाथ आदि से जो नापा जाता है उसे 'उन्मान' और काठ आदि के बने पात्रों से जो नापा जाता है उसे 'परिमाण' एवं एक, दो, तीन आदि गिनती को 'संख्या' कहते हैं।

यत्र यादृग् व्यवहारस्तत्र तादृक्प्रकल्पयेत् ॥ ३५५ ॥
जहाँ पर जैसा व्यवहार हो वहाँ पर वैसा व्यवहार राजा को कराना चाहिये।

रजतस्वर्णताम्रादि व्यवहारार्थमुद्रितम् ।
व्यवहार्य वराटाद्यं रत्नान्तं द्रव्यमीरितम् ॥ ३५६ ॥
सपशुधान्यवस्त्रादि-तृणान्तं धनसंज्ञकम् ।
लोकव्यवहारार्थं द्रव्य तथा धन के लक्षण— लोकव्यवहार के लिये ढाले गये चांदी, सोना एवं तांबे के सिक्कों का व्यवहार प्रजाओं को करना चाहिये। कौड़ी से लेकर रत्न-पर्यन्त की संज्ञा 'द्रव्य' है। पशु, धान्य, वस्त्र से लेकर तृण पर्यन्त की संज्ञा 'धन' है।

व्यवहारे चाधिकृतं स्वर्णाद्यं मूल्य तामियात् ॥ ३५७ ॥
व्यवहार के लिये राजा द्वारा निश्चित स्वर्णादि मुद्रायें प्रत्येक वस्तु की मूल्य समझी जाती हैं।

कारणादिसमायोगात्पदार्थस्तु भवेद् भुवि ।
येन व्ययेन संसिद्धस्तद्व्ययस्तस्य मूल्यकम् ॥ ३५८ ॥
मूल्य की परिभाषा— संसार में कारण आदि के संयोग होने से जो पदार्थ जितने व्यय में सिद्ध होता है उतना व्यय उसका मूल्य होता है।

सुलभासुलभत्वाच्चागुणत्वगुणसंश्रयैः ।

Page 198Permalink

११२ | शुक्रनीतिः

यथाकामात्पदार्थानामर्घं हीनाधिकं भवेत् ॥ ३५९ ॥

मूल्य के न्यूनाधिक्य का कारण-निर्देश— पदार्थों की सुलभता या दुर्लभता से किंवा अच्छा या बुरा होने से (तारतम्यानुसार) उनका मूल्य विक्रेता के इच्छानुसार अधिक या कम होता है।

न हीनं मणिधातूनां क्वचिन्मूल्यं प्रकल्पयेत् ।
मूल्यहानिस्तु चैतेषां राजदौष्ट्येन जायते ॥ ३६० ॥

किसी प्रदेश में भी राजा मणियों तथा सोना, चांदी आदि धातुओं का मूल्य थोड़ा न रखे । इन सबों के मूल्य में कमी जब होती है तब राजा की दुष्टता से न कि प्रजा की ।

दीर्घे चतुर्भागभूतपत्रे तिर्यग्गतावलिः ।
त्र्यंशगाभ्यन्तरगता चार्धगा पादगापि वा ॥ ३६१ ॥
कार्या व्यापकव्याप्यानां लेखने पदसंज्ञिका ।

पत्रलेखन प्रकार— थोड़ा या ज्यादा विषयों के अनुसार लेख लिखने के लिये प्रशस्त पत्र (कागज) के ऊपर चार भाग करने पर उसमें से ३ भाग के अन्दर या आधे भाग किंवा चौथाई भाग के अन्दर आड़ी लकीरों की पंक्ति बनाकर पदों (अक्षरों) को लिखना चाहिये ।

श्रेष्ठाभ्यन्तरगा तासु वामतस्त्र्यंशगाऽप्यनु ॥ ३६२ ॥
दक्षत्र्यंशगता चानु ह्यर्धगा पादगा ततः ।

उक्त ३ प्रकार की पदावलियों में जो पत्र के अन्दर वामभाग से शुरू होकर तीन भाग में लिखी होती है वह श्रेष्ठ है। और दक्षिण से वामभाग की ओर तीन भाग तक लिखी होती है वह उसकी अपेक्षा हीन है। अर्द्धांश में लिखी हुई उससे भी हीन, इसके बाद चतुर्थांश में लिखी हुई सबसे हीन है ।

स्वभ्यन्तरे स्वभेदाः स्युः सदृशाः सदृशे पदे ॥ ३६३ ॥
स्वारम्भपूर्तिसदृशे पत्रे स्तः सदैव हि ।

लाइनों की दूरी परस्पर समान भाव से होने से सब एक सी हों और उनमें अक्षर भी समान हों । अर्थात् जो समान पद हों उनमें सर्वत्र अक्षर समान लिखे जांय । और आरम्भ किये गये विषयों की पूर्ति के अनुरूप पत्र हों एवं उनमें अक्षर और लाइनें उसी के अनुसार अंकित हों ।

राजा स्वलेख्यचिह्नं तु यथाभिलषितं तथा ॥ ३६४ ॥
लेखानुपूर्वं कुर्याद्धि दृष्ट्वा लेख्यं विचार्य च ।

राजा लेख को देखकर उसके बाद विचार कर लेखानुसार जो उचित प्रतीत हो उसे इच्छानुकूल अपने लेख से अङ्कित कर देवे अर्थात् लिख देवे ।

Page 199Permalink

द्वितीयोऽध्यायः [११९]

मंत्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसंज्ञकः ॥ ३६५ ॥
स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ।
मन्त्री, विचारपति, पण्डित और दूत आदि ये सब प्रथम राजा को दिखाने के लिये 'यह लेख मुझे अभिमत है' ऐसा लिखें ।

अमात्यः साधु लिखनमस्त्येतत्प्राग् लिखेदयम् ॥ ३६६ ॥
सम्यग्विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ।
इनमें से जो अमात्य है वह 'यह लेख अच्छा है' ऐसा पत्र में प्रथम लिखे । उसके बाद सुमन्त्र 'मैंने इस पर भली-भांति विचार किया है' ऐसा लिखे ।

सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत्स्वयम् ॥ ३६७ ॥
अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् ।
और 'प्रधान' 'यह वस्तुतः यथार्थ है' यह स्वयं लिखे उसके बाद प्रतिनिधि 'यह अङ्गीकार करने योग्य है' ऐसा लिखे ।

अङ्गीकर्तव्यमिति च युवराजो लिखेत्स्वयम् ॥ ३६८ ॥
लेख्यं स्वाभिमतं चैतद्विलिखेच्च पुरोहितः ।
उसके बाद युवराज 'इसे अङ्गीकार करना चाहिये' ऐसा स्वयं लिखे । और 'पुरोहित' 'यह लेख मुझे अभिमत है' ऐसा लिखे ।

स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युुरेव हि ॥ ३६९ ॥
अङ्गीकृतमिति लिखेन्मुद्रयेच्च ततो नृपः ।
**सब लेखों पर स्व-स्वमुद्राङ्कित करने का निर्देश—**और मन्त्री आदियों को लेख के अन्त में अपनी २ मुहर लगा देनी चाहिये । और अन्त में राजा भी 'यह अङ्गीकृत है' ऐसा लिखे और उस पर अपनी मुहर कर दे ।

कार्यान्तरस्याकुलत्वात्सम्यग्द्रष्टुं न शक्यते ॥ ३७० ॥
युवराजादिभिर्लेख्यं तदनेन च दर्शितम् ।
युवराज आदि को कार्यान्तर में (दूसरे २ कार्यों में) व्यस्तचित्त होने से अच्छी तरह से लेख के संपूर्ण विषयों को न देख सकने से 'इस आदमी ने जो दिखाया उस पर मैंने अच्छी तरह से विचार किया' यह भी मन्त्री आदि को लिखना चाहिये ।

समुद्द्रं विलिखेयुर्वै सर्वे मन्त्रिगणास्ततः ॥ ३७१ ॥
राजा दृष्टमिति लिखेद् द्राक् सम्यग्दर्शनाक्षमः ।
सभी मन्त्री लोगों को सभी लेखों पर मुहर से अङ्कित करके अपना २ हस्ताक्षर करना चाहिये और भली-भांति से देखने में असमर्थ राजा शीघ्र उन सब लेखों पर 'मैंने देखा' यह लिख दे क्योंकि उसका मन्त्री आदि के लेखों पर पूर्ण विश्वास रहता है ।

८ शु०

Page 200Permalink

११४ | शुक्रनीतिः

आयमादौ लिखेत्सम्यग् व्ययं पश्चात्तथागतम् ॥ ३७२ ॥
वामे चायं व्ययं दक्षे पत्रभागे च लेखयेत् ।

पत्र में आय-व्यय लेखन का स्थान-विचार— बही खाते पर पहले सम्पूर्ण आय ( आमदनी ) लिखे पीछे जो व्यय हुआ हो उसे लिखे । और बही के बाईं ही ओर आय और दाहिनी ओर व्यय लिखे ।

यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ वामोर्ध्वभागगौ क्रमात् ॥ ३७३ ॥
आधाराधेयरूपौ वा कालार्थं गणितं हि तत् ।

जहां पर आय तथा व्यय ये दोनों अधिक या अल्प अथवा आश्रय तथा आश्रयी रूप से हों वहां पर उन दोनों को बही के वाम भाग में यथाक्रम ऊपर की ओर रखना चाहिये । ऐसी व्यवस्था नियम के लिये है ।

अधोधश्च क्रमात्तत्र व्यापकं वामतो लिखेत् ॥ ३७४ ॥
व्याप्यानां मूल्यमानादि तत्पंक्त्यां विनिवेशयेत् ।

उसमें व्यापक को वामभाग में क्रम से नीचे-नीचे लिखे । और व्याप्यों का मूल्य और मानादि उन्हीं की पंक्ति में लिखे ।

ऊर्ध्वगानां तु गणितमधः पंक्त्यां प्रजायते ॥ ३७५ ॥
यत्रोभौ व्यापकव्याप्यौ व्यापकत्वेन संस्थितौ ।

जहां पर वे दोनों व्यापक और व्याप्य बहुसंख्यक हों वहाँ पर ऊपरवालों की गणना नीचे की पंक्ति में होती है ।

व्यापकं बहुवृत्तित्वं व्याप्यं स्यान्न्यूनवृत्तिकम् ॥ ३७६ ॥
व्याप्याश्चावयवाः प्रोक्ता व्यापकोऽवयवी स्मृतः ।

व्यापक-व्याप्य के लक्षण— बहुत स्थलों पर रहनेवालों को 'व्यापक' कम स्थलों पर रहनेवालों को 'व्याप्य' कहते हैं । और व्याप्य अवयव ( अङ्ग ) एवं व्यापक ( अवयवी ) कहलाते हैं ।

सजातीनां च लिखनं कुर्याच्च समुदायतः ॥ ३७७ ॥
यथाप्राप्तं तु लिखनमाद्यन्तसमुदायतः ।

समान जातिवाले विषयों का समुदाय रूप से एक स्थान पर ही लिखना उचित होता है । और नाना प्रकार के विषयों का जहां जैसा मौका हो वहीं उसके अनुसार आदि, अन्त और सर्वत्र लिखना उचित है ।

व्यापकाश्च पदार्था वा यत्र संति स्थलानि हि ॥ ३७८ ॥
व्याप्यमायव्ययं तत्र कुर्यात्कालेन सर्वदा ।

जहां पर पदार्थ व्यापक ( बहुत) हों एवं स्थल भी बहुत हों वहां सर्वदा आय-व्यय को काल से व्याप्य कर लेना चाहिये ।

स्थानटिप्पनिका चैषा ततोऽन्यत् संघटिप्पनम् ॥ ३७९ ॥