शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextद्वितीयोऽध्यायः ६५
जिस के ऊपर राजा प्रसन्न हो उसके अनिष्ट की चिन्ता कदापि नहीं करनी चाहिये।
न दर्शयेत्स्वाधिकारगौरवं तु कदाचन ।
और राजा के सामने कभी अपने अधिकार का गौरव नहीं प्रकाशित करना चाहिये।
परस्परं नाभ्यसूयुर्न भेदं प्राप्नुयुः कदा ॥ २५३ ॥
राज्ञा चाधिकृताः संतः स्वस्वाधिकारगुप्तये ।
आपस में भृत्यों के कर्त्तव्य—राजा के द्वारा किसी अधिकार पर नियुक्त किये गये उत्तम भृत्य को चाहिये कि—वह कभी भी अपने २ अधिकार की रक्षा के लिये आपस में एक दूसरे के दोष को नहीं दिखाये और न परस्पर भेद रक्खे।
अधिकारिगणो राजा सद्वृत्तौ यत्र तिष्ठतः ॥ २५४ ॥
उभौ तत्र स्थिरा लक्ष्मीर्विपुला सम्मुखी भवेत् ।
राजा तथा भृत्य के परस्पर अच्छा व्यवहार करने का निर्देश—जहां पर राजा तथा अधिकारी गण (भृत्यगण) ये दोनों परस्पर अच्छा व्यवहार रखते हैं वहां पर विपुल तथा स्थिर लक्ष्मी संमुख उपस्थित रहती है।
अन्याधिकारवृतं तु न ब्रूयाच्छ्रुतमप्यृत ॥ २५५ ॥
राजा न शृणुयादन्यमुखतस्तु कदाचन ।
दूसरे भृत्य के अधिकार-विषयक दोष को सुनकर भी भृत्य राजा से न कहे। और राजा भी दूसरे भृत्य के मुख से किसी दूसरे की बात को कभी न सुने।
न बोधयन्ति च हितमऽहितं वाधिकारिणः ॥ २५६ ॥
प्रच्छन्नवैरिणस्ते तु दास्यरूपमुपाश्रिताः ।
जो अधिकारी लोग हित या अहित बात राजा को नहीं समझाते हैं वे नौकर के रूप में छिपे हुये राजा के शत्रु के समान होते हैं।
हिताहितं न शृणोति राजा मन्त्रिमुखाच्च यः ॥ २५७ ॥
स दस्यू राजरूपेण प्रजानां धनहारकः।
डाकू के समान राजा के लक्षण—जो राजा मन्त्री के मुख से कही हुई हित या अहित की बातों पर ध्यान नहीं देता है वह राजा के रूप में डाकू के समान केवल प्रजा का धन हरण करनेवाला है।
सुपुष्टव्यवहारा ये राजपुत्रैश्च मन्त्रिणः ॥ २५८ ॥
विरुध्यन्ति च तैः साकं ते तु प्रच्छन्नतस्कराः ।
प्रच्छन्न चोर के लक्षण—जो मन्त्री लोग राजपुत्रों के द्वारा व्यवहार-