शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
Page 184 of 526
Read in context६८ | शुक्रनीतिः
राजाज्ञया विना नेच्छेत्कार्यमध्यस्थिकीं भृतिम् ॥ २७० ॥
न निहन्याद् द्रव्यलोभात्सत्कार्यं यस्य कस्यचित् ।
राजाज्ञा के बिना कार्य के मध्य में अर्थात् बिना कार्य समाप्त किये वेतन लेने की इच्छा न करे। और द्रव्य के लोभ से किसी के अच्छे कार्य को नष्ट न करे।
स्वस्त्रीपुत्रधनप्राणैः काले संरक्षयेन्नृपम् ॥ २७१ ॥
उत्कोचं नैव गृह्णीयान्नान्यथा बोधयेन्नृपम् ।
संकट-काल पड़ने पर अपनी स्त्री, पुत्र, धन तथा प्राण देकर भी राजा की रक्षा करे। घूस न ले और राजा को वस्तुस्थिति से विपरीत न समझावे।
अन्यथा दण्डकं भूपं नित्यं प्रबलदण्डकम् ॥ २७२ ॥
निगृह्य बोधयेत्सम्यगेकांते राज्यगुप्तये ।
यथार्थ दण्ड न देनेवाले या नित्य प्रबल दण्ड देनेवाले राजा को राज्य की रक्षा के लिये रोककर एकान्त में भली-भाँति समझाना भृत्य के लिये उचित है।
हितं राज्ञश्चाहितं यल्लोकानां तन्न कारयेत् ॥ २७३ ॥
नवीनकरशुल्काद्यैर्लोक उद्विजते ततः ।
जिससे केवल राजा का हित है किन्तु प्रजा का अहित है ऐसे कार्य को राजा से न करावे। क्योंकि नवीन कर तथा चुंगी आदि लगाने से प्रजा उद्विग्न हो उठती है।
गुणनीतिबलद्वेषी कुलभूतोऽप्यधार्मिकः ॥ २७४ ॥
नृपो यदि भवेत्तं तु त्यजेद्राष्ट्रविनाशकम् ।
अच्छे वंश में उत्पन्न हुआ भी राजा यदि गुण, नीति तथा बल (सेना) के साथ द्वेष करनेवाला एवं अधार्मिक हो तो उसे राज्य को नष्ट करनेवाला समझकर त्याग कर देना चाहिये अर्थात् उसे गद्दी से उतार देना चाहिये।
तत्पदे तस्य कुलजं गुणयुक्त पुरोहितः ॥ २७५ ॥
प्रकृत्यनुमतिं कृत्वा स्थापयेद्राज्यगुप्तये ।
और पुरोहित उस राजा के स्थान पर उस राजा के वंश में उत्पन्न राजगुणों से युक्त किसी को प्रकृतियों (अमात्यादिकों) की संमति लेकर राज्य की रक्षा के लिये स्थापित करे।
सास्त्रो दूरं नृपात्तिष्ठेदस्त्रपाताद्बहिः सदा ॥ २७६ ॥
सशस्त्रो दशहस्तं तु यथादिष्टं नृपप्रियाः ।
पञ्चहस्तं वरेयुर्वै मन्त्रिणो लेखकाः सदा ॥ २७७ ॥
सेनपैस्तु बिना नैव सशस्त्रास्त्रो विशेत्सभाम् ।
अस्त्र (बन्दूक या धनुष-बाण आदि) लिये हुये व्यक्ति को अस्त्र की मार