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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

About this granth

The Shatapatha Brahmana (शतपथ ब्राह्मण), the Brahmana of the White Yajurveda, is the largest and most important work of Vedic prose. Named for its hundred chapters and linked by tradition to the sage Yajnavalkya, it has fourteen books in the Madhyandina recension. It explains the procedure and meaning of the new- and full-moon offerings, the setting up of the fires, the agnihotra, the soma sacrifice, the building of the fire altar and the horse sacrifice, and its final part contains the Brihadaranyaka Upanishad. The first book includes the well-known story of Manu and the fish in the great flood.

This is the first of three volumes. The text follows Albrecht Weber's edition, with the Hindi translation (Ratnadipika) of Pandit Gangaprasad Upadhyaya, edited by Swami Satyaprakash Saraswati. Introductions on the Brahmanas and on the accent marks, a note on the translation, an English preface and contents precede the text, which runs by kanda, adhyaya and brahmana. This scan is of the 2014 Govindram Hasanand edition, 699 pages.

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का० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० ३०-३६ शतपथब्राह्मण / २३७
और जब सूर्य निकलता है तो सूर्य ज्योति होता है। जो सत्यता के साथ आहुति देता है वह देवों
को प्राप्त होता है ॥३०॥
ब्रह्मवर्चस् की कामना के लिए तक्षा ने अरुण के प्रति यही कहा था—'अग्निर्वर्चो
ज्योतिर्वर्चः सूर्योवर्चो ज्योतिर्वर्चः' (यजु० ३।६) । जो पुरुष समझकर अग्निहोत्र करता है वह
ब्रह्मवर्चसी हो जाता है ॥३१॥
यह मन्त्र सन्तानोत्पत्ति का रूप है। "अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा" कहकर वह
ज्योतिरूपी वीर्य को देवता के द्वारा दोनों ओर से घेर देता है। दोनों ओर से घिरकर ही तो
वीर्य से उत्पत्ति होता है। इस प्रकार दोनों ओर से घेरकर ही वह इससे सन्तानोत्पत्ति कराता
है ॥३२॥
प्रातःकाल की आहुति का मन्त्र—"सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" (यजु० ३।६) ।
कहकर वह ज्योतिरूपी वीर्य को देवता के द्वारा दोनों ओर से घेर देता है, क्योंकि दोनों ओर से
घिरकर ही वीर्य से उत्पत्ति होती है। इस प्रकार दोनों ओर से इसे घेरकर ही वह इससे
सन्तानोत्पत्ति कराता है ॥३३॥
जीवल चैलकि का कथन है कि आरुणि गर्भ ही धारण करता है, सन्तानोत्पत्ति नहीं
कराता। इसलिए उसी आहुति से सायंकाल को होत्र करे ॥३४॥
प्रातःकाल "ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा" (यजु० ३।६), कहकर वह देवता के
द्वारा ज्योति रूपी वीर्य को बाहर कर देता है। बाहर आकर ही वीर्य उत्पत्ति करता है, इसलिए
इसके द्वारा उत्पत्ति करता है ॥३५॥
इसके विषय में कुछ लोग कहते हैं कि वह सायंकाल को अग्नि में सूर्य के लिए आहुति
देता है और प्रातःकाल सूर्य में अग्नि के लिए। यह उनके लिए सच है जो 'उदितहोमि' अर्थात्
सूर्योदय के पश्चात् होम करनेवाले हैं। क्योंकि जब सूर्य अस्त होता है तब अग्नि ज्योति होती है
और जब सूर्य उदय होता है तो सूर्य ज्योति होता है। इसमें कोई दोष नहीं है। दोष इसमें है कि
जो अग्निहोत्र के देवता हैं उनको निश्चय करके न कहा जाय (अर्थात् सूर्य और अग्नि को अलग-
अलग) । वह कहता है 'अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा' न कि 'अग्नये स्वाहा।' इसी प्रकार
प्रातःकाल के समय 'सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा' न कि 'सूर्याय स्वाहा' ॥३६॥
(सायंकाल को) इससे भी आहुति दे—'सजूर्देवेन सवित्रा' (यजु० ३।१०)। इस प्रकार
सवितृ-युक्त हो जाता है, प्रेरणा के लिए। फिर कहता है 'सजूरात्र्येन्द्रवत्या', इससे वह इसका
रात्रि से जोड़ मिलाता है और इन्द्र से युक्त करता है। इन्द्र ही यज्ञ का देवता है। 'जुषाणो
अग्निर्वेतु स्वाहा' (यजु० ३।१०) कहकर वह प्रत्यक्ष रूप से अग्नि के लिए आहुति देता है ॥३७॥
अब प्रातःकाल को 'सजूर्देवेन सवित्रा' कहकर प्रेरणा के लिए सवितृ-युक्त करता है। अब
कहता है—'सजूरुषसेन्द्रवत्या', इस प्रकार वह इसका दिन या उषा से जोड़ मिलाता है और इसे
इन्द्र-युक्त करता है। इन्द्र यज्ञ का देवता है। 'जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा' (यजु० ३।१०) कह-
कर वह प्रत्यक्ष रूप से सूर्य के लिए आहुति देता है। इसलिए इसी प्रकार आहुति दे ॥३८॥
उन्होंने कहा—'हमारे लिए कौन आहुति देगा?' 'ब्राह्मण ही।' 'हे ब्राह्मण, हमारे
लिए आहुति दे।' 'तब मेरा भाग क्या होगा?' 'अग्निहोत्र का उच्छिष्ट (बचा हुआ)।' यह जो

अध्याय-३, ब्राह्मण-२

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२३८ शतपथ ब्राह्मण
य॒त्स्रुचि॒ परिशि॒नष्टि॒ तद॒ग्निहो॒त्रोच्छि॑ष्ट॒मथ॒ यत्स्थाल्यां॒ यथा॒ परीण॒हो नि॒र्व॑पेदे॒वं
तत्त्स्मा॒त्तद्य॒ एव॒ कश्च॒ पिबे॒त्तद्वै नाब्रा॑ह्मणः पिवेद्ग्रौ व्य॑धिय्य॒न्ति तस्मा॒न्नाब्रा-
ह्मणः॑ पिबेत् ॥ ३१॥ ब्राह्मणम् ॥ ३ [३. १.] ॥ ॥
ए॒ता ह॒ वै दे॒वता॒ योऽग्निः । तस्मिन्न्वसतीन्द्रो॑ य॒मो राजा॒ नडो॑ नैषि॒धोऽन-
श्चत्स॒ांगमनो॒ऽस॒न्या॑ऽसवः ॥ १॥ तद्वाऽए॒ष ए॒वेन्द्रः॑ । यदा॑हव॒नीयोऽथै॒ष ए॒व गा-
र्हपत्यो य॒मो राजा॑थै॒ष ए॒व नडो॑ नैषि॒धो य॒दन्वा॑हार्यपच॒नस्तद्य॒देत॒मह॒रह॒र्द्दक्षि-
णात् आ॒हर॑न्ति॒ तस्मा॑दाहुरह॒रह॒र्वै नडो॑ नैषि॒धो यमं॑ रा॒जानं॑ दक्षि॒णात उप॑नय-
तीति॑ ॥ २॥ अथ॒ य ए॒ष स॒भायाम॒ग्निः । ए॒ष ए॒वानश्चत्सांगम॒नस्तद्य॒देत॒मन॑शिश्वे-
वोप॒संगृह्ण॑ते॒ तस्मा॑देषो॒ऽननश्नन्नथ॒ यदेतद्भस्मोद्धृ॒त्य परावपन्त्ये॒ष ए॒वास॒न्या॑ऽस॒वः स
यो॒ है॒वमे॒तद्दे॒वं म॒न्येता॒ देवता॑ वसन्तीति॒ सर्वा॒न्द्धैवैतांल्लो॒कान्जयति॒ सर्वांल्लो-
का॒ननु॒संच॑रति ॥ ३॥ तेषामुपस्थान॑म् । यदि॑व॒ सायं॒ प्रातरा॑हव॒नीय॒मुप॑ च तिष्ठ॑त
ऽउप॑ चास्ते॒ तदे॑व त॒स्योप॑स्थान॒मथ॒ यदे॑व॒ प्रति॒परे॑त्य॒ गार्ह॑पत्यमा॒स्ते वा॒ शेते॑ वा॒
तदे॑व त॒स्योप॑स्थान॒मथ॒ यत्रै॑व॒ संप्र॒ज्ञन्नन्वा॑हार्यपच॒नमुप॒स्मरे॒त्तदे॑व॒ तं मन॑सोप॑ति-
ष्ठेत॒ तदे॑व त॒स्योप॑स्थानम् ॥४॥ अथ प्रा॒तः । अन॑शित्वा मु॒हूर्त्तं॑ स॒भाया॒मासि॑त्वा-
पि कामं॑ प॒ल्प्ये॒त तदे॑व त॒स्योप॑स्थान॒मथ॒ यत्रै॑व॒ भस्मो॒द्धृत॒मुप॑नि॒गृह्णी॑या॒त्तदे॑व त॒स्यो-
पस्थान॑मेवमु॒ ह्वास्यै॒ता दे॒वता॑ उप॑स्थिता भ॑वन्ति ॥ ५॥ य॒जमान॑दे॒वत्यो॒ वै गार्ह॑-
पत्यः । अथै॒ष भ्रातृ॑व्यदे॒वत्यो॒ यद॒न्वाहा॑र्यपच॒नस्तस्मा॑दे॒तं नाह॒रह॒राहरे॒युर्न ह॒ वा
ऽअ॒स्य स॒पना॑ भवन्ति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒तं नाह॒रह॒राहर॑न्त्यन्वाहार्यपच॒नो वाऽए-
षः ॥ ६॥ उपवसथऽए॒वैन॒माह॑रेयुः । यत्रै॒वास्मिन्द्यद्य॒त्तो भव॑न्ति॒ तन्नो॒ ह्वास्यै॒षो
ऽमो॒धायाहृ॑तो भव॑ति ॥ ७॥ नवा॑वसिते वैन॒माह॑रेयुः । तस्मिन्पचेयुस्तद्ब्राह्म॒णा
अ॒श्नीयु॑र्यद्यु॒ तन्न वि॒न्देद्य॒द्युचेदपि॒ गोरि॑व दु॒ग्धम॒धिश्रय॑ति॒वै ब्रूया॒त्तस्मि॑न्ब्राह्म॒णा-
न्याय॑यित॒वै ब्रूया॒त्पापी॑यांसो ह वाऽअ॒स्य स॒पन्ना भवन्ति॒ यस्यै॒वं वि॒दुष ए॒वं

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का० २, अ० ३, ब्रा० २, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २३६
स्रुवे में रह जाता है वह अग्निहोत्र का उच्छिष्ट है। जो थाली में रह जाता है वह वैसा ही है
जैसा कि (गाड़ी के) घेरे में से (चावल निकालना)। यदि कोई इसे पिये तो ब्राह्मण के सिवाय
अन्य न पीवे। यह अग्नि में रखा हुआ (पवित्र) है, इसलिए अब्राह्मण न पीवे ॥३६॥
अध्याय ३—ब्राह्मण २
जो कोई (यजमान) होता है उसमें ये देवते होते हैं—इन्द्र, राजा, यम, नड-नैषिध (या
नैषध), अनश्नत् सांगमन, असन्पांसव ॥१॥
यह जो आहवनीय है वह इन्द्र है, जो गार्हपत्य है वह राजा यम है। यह जो अन्वाहार्य-
पचन (दक्षिणाग्नि) है वह नड-नैषिध है। चूँकि प्रतिदिन दक्षिण से (अग्नि) लाते हैं, इसलिए
कहते हैं कि नड-नैषिध प्रतिदिन राजा यम को दक्षिण से लाता है ॥२॥
और यह जो सभा में अग्नि है वह अनश्नत् सांगमन है। इसको अनश्नत् इसलिए कहते
हैं कि लोग बिना खाये उसके पास जाते हैं। और उसमें से राख निकालकर जहाँ फेंकते हैं वह
असन्पांसव है। जो इस बात को जानता है वह सब लोकों को जीतता है, सब लोकों में विचरता
है और समझता है कि ये देवतागण मुझमें विद्यमान हैं ॥३॥
अब उन (अग्नियों) के उपस्थान (उपासना) के विषय में। जो सायं और प्रातः को
आहवनीय के पास खड़ा होना और बैठना है यही उसकी उपासना है, और जब लौटकर गार्हपत्य
के पास बैठना या लेटना है वह उसकी उपासना है, और जब (आहवनीय से) निकलकर
अन्वाहार्य-पचन का स्मरण करना तथा मन में उसके पास ठहरना है वह उसकी उपासना है ॥४।
और प्रातःकाल बिना खाये मुहूर्त्त-भर सभा में बैठना और यथेच्छा परिक्रमा देना है वही
उसकी उपासना है। और जहाँ उसमें से लेकर भस्म डाली जाती है वहाँ ठहरना है, वही उसकी
उपासना है। इस प्रकार उन देवताओं की उपासना हो गई ॥५॥
गार्हपत्य का देवता यजमान है, और अन्वाहार्य-पचन का देवता उसका शत्रु है, इसलिए
(दक्षिणाग्नि को) रोज-रोज (गार्हपत्य से) नहीं ले जाना चाहिए। उसके कोई शत्रु नहीं होते ।
जो इस बात को जानता है उसके यहाँ इस अग्नि को रोज-रोज नहीं निकालते। यह अन्वाहार्य-
पचन है ॥६॥
उपवास के दिन ही उसको लाना चाहिए जब इसमें यज्ञ करनेवाले हों, और यह
(यजमान के) अमोघ (निश्चित सफलता) के लिए लाई जाती है ॥७॥
या इसको नये घर में ले जायें। उसमें पकावें और ब्राह्मणों को खिलाएँ। यदि पकाने के
लिए और कुछ न मिले तो गाय के दूध को ही अग्नि पर रख दें और ब्राह्मणों को पिला दें। जिस
किसी यह जाननेवाले के लिए वे ऐसा करते हैं उसके शत्रु पापी (अवनति-शील) हो जाते हैं।

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२४० शतपथ ब्राह्मण

कुर्व्व॒न्ति॒ तस्मा॑दि॒वमे॒व चिकी॒र्षेत् ॥ ८ ॥ तद्य॑त्रैतत्प्रथ॒मꣳ स॒मिद्धो भव॑ति । धू॒म्यत
ऽइ॑व॒ तर्हि॒ ह्येष भव॑ति रु॒द्रः स यः का॒मये॑त य॒थेमा रु॒द्रः प्र॒जा अ॒श्रद॒द्येवं॑ वत्स॒रु-
से॑व स॒न्निघा॑तमिव वत्स॒चत॒ऽएवम॑न्नम॒द्यामि॑ति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ है-
वैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ ९॥ अथ॒ यत्रै॑तत्प्र॒दीप्त॑तरो भ॒वति॑ । त॒-
र्हि॒ ह्येष भव॑ति वरु॑णः स यः का॒मये॑त य॒थेमा वरु॑णः प्र॒जा गृ॒ह्णन्नि॑व वत्स॒रुसे॑व
स॒न्निघा॑तमिव वत्स॒चत॒ऽएवम॑न्नम॒द्यामि॑ति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ हैवैतद॒-
न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ १०॥ अथ॒ यत्रै॑तत्प्र॒दीप्तो भव॑ति । उ॒र्ध्वर्चिः
पर॒मया॒ भ्रूत्या॒ ब्बल्ब॑लीति॒ तर्हि॒ ह्येष भ॑वती॒न्द्रः स यः का॒मये॒तेन्द्र॑ इव श्रि॒या य॒-
शसा॑ स्या॒मिति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ हैवैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु-
॒होति॑ ॥ ११॥ अथ॒ यत्रै॑तत्प्रति॒तरा॒मिव । ति॒रश्ची॑वार्चिः संशा॒म्यतो॒ भव॑ति॒ तर्हि॒
ह्येष भव॑ति मि॒त्रः स यः का॒मये॑त मैत्रे॒णेद॒मन्न॑म॒द्यामि॑ति य॒माहुः सर्व॑स्य वा॒ऽअयं
ब्रा॒ह्म॒णो मि॒त्रं न वा॒ऽअयं कं च॒न हि॒नस्तीति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हुया॒त्प्राप्नो॑ति॒ है-
वैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ १२॥ अथ॒ यत्रै॒तद॒ङ्गारा॒श्चाक॑श्यन्त॒ऽइव॑ ।
तर्हि॒ ह्येष भव॑ति ब्र॒ह्म स यः का॒मये॑त ब्रह्मवर्च॒सी स्या॒मिति॒ तर्हि॑ ह॒ स जु॑हु-
या॒त्प्राप्नो॑ति॒ हैवैतद॒न्नाद्यं॒ य ए॒वं वि॒द्वांस्त॒र्हि जु॒होति॑ ॥ १३॥ ए॒तेषामेकꣳ संवत्स-
रमु॒पेत्से॑त् । स्व॒यं जु॑हुया॒दि वा॒स्यान्यो॑ जुहुया॒द्य यो॑ऽन्य॒थान्‍यथा जु॒होति॑ यथापो॑
वाभि॒खन॑न्नन्यदा॒न्नाद्यꣳ॒ स सा॒मि नि॒वर्त्ते॑तै॒वं तद्यः सा॒र्द्धं जु॒होति॑ यथापो॑ वा-
भि॒खन॑न्नन्यदा॒न्नाद्यं॑ तत्त्छि॒न्द्रेऽभि॒तृन्द्यादे॒वं तत् ॥ १४॥ अ॒भ्रयो ह॒ वा॒ऽएता अ॒न्ना-
द्यस्य यदा॒हुत॑यः । अ॒भि हैवैतद॒न्नाद्यं॑ तृणत्ति॒ य ए॒वं वि॒द्वानग्निहोत्रं जु॒होति॑
॥ १५॥ सा या पू॒र्वाहु॑तिः । ते दे॒वा अथ॒ योत्त॑रा॒ ते म॑नु॒ष्या अथ॒ यत्स्रुचि॒ परि॑-
शिन॒ष्टि ते प॒शवः॑ ॥ १६॥ स वै कनी॑य इव पू॒र्वामाहु॑तिं जु॒होति॑ । भूय॑ इवो-
त्त॒रां भूय॑ इव॒ स्रुचि परि॑शिनष्टि॒ ॥ १७॥ स यत्कनी॑य इव पू॒र्वामाहु॑तिं जु॒होति॑ ।

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कां० २, अ० ३, ब्रा० २, कं० ८-१८ शतपथब्राह्मण / २४१
इसलिए ऐसा ही करना चाहिए ॥८॥
जब अग्नि पहले ही जलाई जाती है और उसमें धुआँ ही निकलता है, तब यह अग्नि रुद्र
होती है। जैसे रुद्र इन प्रजाओं को कभी अश्रद्धा से, कभी कड़ेपन में, कभी मारकर बरतता है,
उसी प्रकार यदि कोई चाहे कि अन्न खाऊँ तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता
है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती है।
जब अग्नि अधिक प्रदीप्त हो जाती है तो वरुण हो जाती है। जैसे वरुण प्रजा को कभी
पकड़कर, कभी कड़ेपन से और कभी मारकर बरसता है, इसी प्रकार यदि कोई चाहे कि मैं अन्न
खाऊँ तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती
है ॥१०॥
जब अग्नि बहुत प्रज्वलित होती है और पुष्कल धुआँ चक्कर काटता हुआ ऊपर को
उठता है तो यह इन्द्र हो जाती है। जो कोई चाहे कि इन्द्र के समान श्री और यश वाला हो जाऊँ
तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती
है ॥११॥
जब यह अग्नि घटती हुई शान्त-सी तिरछी जलती है तो मित्र हो जाती है। यदि कोई
चाहे कि मित्रता से अन्न खाऊँ, जैसे कहा करते हैं कि अमुक ब्राह्मण मित्र है, वह किसी की
हानि नहीं करता, तो वह आहुति दे। जो समझकर आहुति देता है वह अन्न को प्राप्त कर लेता
है ॥१२॥
जब इस (अग्नि) के अङ्गारे जलते हैं तब यह ब्रह्म हो जाती है। जो चाहे कि मैं ब्रह्म-
वर्चसी हो जाऊँ वह यह आहुति दे। जो समझकर आहुति देता है उसे अन्न की प्राप्ति हो जाती
है ॥१३॥
उसको साल-भर तक इनमें से एक का सेवन करना चाहिए, चाहे स्वयं आहुति दे या
किसी से दिलावे। और जो कभी किसी के और कभी किसी के लिए आहुति देता है तो वैसा ही
व्यर्थ है जैसे पानी के लिए कभी यहाँ खोदे, कभी वहाँ, या अन्न के लिए और बीच में छोड़ दे।
और यदि लगातार आहुति देता जाय तो ऐसा है जैसे जल या अन्न के लिए खोदता-खोदता शीघ्र
प्राप्त कर ले ॥१४॥
ये जो आहुतियां हैं वे अन्न के (खोदने के) लिए अभ्रि या खुरपा हैं। जो समझकर
अग्निहोत्र करता है वह अन्न की प्राप्ति करता है।
जो पूर्वाहुति है वह देव है, जो पिछली है वह मनुष्य और जो स्रुक् में बच रहे वह
पशु ॥१६॥
पूर्वाहुति में थोड़ा ही डालता है, पिछली में अधिक और उससे भी अधिक स्रुक् में बचा
रखता है ॥१७॥
पूर्वाहुति में थोड़ा-सा इसलिए डालता है कि देव आदमियों से कम हैं। दूसरी आहुति में

अध्याय-३, ब्राह्मण-३

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क॒नीयाग्॑सो॒ हि दे॒वा मनु॒ष्येभ्यो॑ऽथ॒ यद्भूय॑ऽइ॒वोत्त॑रां॒ भूयाग्॑सो॒ हि मनु॒ष्या॑ दे॒वे-
भ्योऽथ॒ यद्भूय॑ इव सुचि॒ परि॑शि॒नष्टि॒ भूयाग्॑सो॒ हि पश॑वो मनु॒ष्येभ्यः॑ क॒नीयाग्॑सो
ह॒ वाऽअ॒स्य भार्या॑ भवन्ति॒ भूयाग्॑सः प॒शवो॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॒ तद्ध॑
समृद्धं॒ यस्य॑ क॒नीयाग्॑सो भा॒र्या अ॑स॒न्भूयाग्॑सः प॒शवः॑ ॥ १८ ॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ ४ [३.२.] ॥
॥ द्वितीयः प्रपाठकः ॥ ॥ कण्डिकासंख्या १०३ ॥ ॥
यत्र॒ वै प्र॒जाप॑तिः प्र॒जाः स॑सृ॒जे । स य॒त्राग्निग्॑ ससृ॒जे स इदं॒ जातः॒ सर्व॑मेव दु॒-
ग्धुं द॑धृ॒ऽइत्ये॒वाबि॑लमेव ता यास्तर्हि॑ प्र॒जा आ॑सु॒स्ता ह्ये॑नग्ं स॒म्पेष्टुं॑ दधिरे सो॒-
ऽतिति॑क्षमाणः पु॒रुष॑मे॒वाभ्ये॑याय ॥ १ ॥ स होवाच । न वाऽअ॒र्हमि॒दं तितिक्षे
ह॒न्त वा प्रवि॑शानि॒ तं मा॑ जनयि॒त्वा बि॑भृहि॒ स य॑थैव॒ मां त्वम॒स्मिल्लो॒के ज॑नयि॒-
त्वा भ॑रि॒ष्यस्ये॒वमे॒वाहं त्वा॑म॒मुष्मिंल्लो॒के ज॑नयि॒त्वा भ॑रिष्या॒मीति॒ तथेति॒ तं ज॑नयि॒-
त्वा॑बिभ्रः ॥ २ ॥ स यद॒ग्नीऽआ॒धत्ते॑ । तदे॑नं॒ जन॑यति॒ तं ज॑नयि॒त्वा बिभ॑र्ति॒ स यथा॒
है॒वैष ए॒तम॒स्मिल्लो॒के ज॑नयि॒त्वा बिभ॒र्त्येव॒मु है॒वैष ए॒तम॒मुष्मिंल्लो॒के ज॑नयि॒त्वा बि-
भ॑र्ति ॥ ३ ॥ तन्न स॒म्युद्वा॑सयेत । सा॒मि ह्य॑स्मे॒ स ग्ला॑यति॒ स यथा॒ है॒वैष ए॒तस्मा॒-
ऽअ॒स्मिल्लो॒के सा॒मि ग्लाय॑त्ये॒वमु॒ है॒वैष ए॒तस्मा॒ऽअ॒मुष्मिंल्लो॒के सा॒मि ग्ला॑यति॒
तस्मा॒न्न स॒म्युद्वा॑सयेत ॥ ४ ॥ स यत्र॒ म्रिय॑ते । यत्रैनम॒ग्नावभ्याद॑धति॒ तद्दे॒षोऽग्ने॑रधि॒-
जाय॑ते॒ स ए॒ष पु॒त्रः स॒न्पिता॑ भवति ॥ ५ ॥ तस्मा॑दे॒तदृषि॑णा॒भ्यनू॑क्तम् । श॒तमिन्नु
श॒रदो॒ऽअन्ति॑ दे॒वा यत्रा॑ नश्च॒क्रा ज॒रसं॑ तनू॒नाम् । पु॒त्रासो॒ यत्र॑ पि॒तरो॒ भव॑न्ति॒ मा
नो॒ मध्या री॑रिष॒तायु॒र्गन्तो॒रिति॑ पु॒त्रो ह्ये॑ष स॒न्त्स पुन॑: पि॒ता भव॑त्ये॒तन्नु॒ तद्य॑स्मा-
द॒ग्नीऽआ॒दधी॑त ॥ ६॥ तद्वाऽए॒ष ए॒व मृत्युः॑ । य ए॒ष तप॑ति॒ तद्य॑दे॒ष ए॒व मृत्यु॒-
स्तस्मा॒द्या ए॒तस्माद॑र्वाच्यः प्र॒जास्ता म्रिय॑न्ते॒ऽथ याः परा॑च्य॒स्ते दे॒वास्तस्मा॒डु ते॒ऽमृ-
तास्त॒स्यिमाः सर्वा॑: प्र॒जा र॒श्मिभि॑: प्रा॒णेष्व॒भिहि॑ता॒स्तस्मा॒डु र॒श्मय॑: प्रा॒णानन्व॑वताय॒-
न्ते ॥ ७ ॥ स यस्य॑ काम॒यते॑ । तस्य॑ प्रा॒णमा॒दायोदे॑ति॒ स म्रिय॑ते॒ स यो॒ हैतं मृत्यु॒म्-

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ३, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २४३
अधिक इसलिए डालता है कि मनुष्य देवों से अधिक हैं। स्रुक् में सबसे अधिक इसलिए छोड़ता
है कि पशु मनुष्यों से भी अधिक हैं। जो कोई समझकर अग्निहोत्र करता है उसके आश्रित मनुष्यों
(भार्य) की अपेक्षा पशु अधिक होते हैं। जिसके भार्य (आश्रित मनुष्य) कम और पशु अधिक
हों, उसी को समृद्ध पुरुष कहते हैं ॥१८॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ३
जब प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न की और अग्नि उत्पन्न की तो यह उत्पन्न होते ही सबको
जलाने लगी, और सबने उससे बचना चाहा, और जो प्रजा थी उसने उसको बुझाना चाहा। यह
सहन न करके वह पुरुष के पास आई ॥१॥
उसने कहा—"मैं यह सहन नहीं कर सकती। तुझमें घुस जाऊँ। तू मुझे उत्पन्न करके
पालन कर। जैसा तू इस लोक में मुझे जन्म देकर पालन करेगा वैसा ही परलोक में तुझे जन्म
देकर पालन करूँगी।" उसने कहा-"अच्छा।" उसने उसे उत्पन्न किया और पालन किया ॥२॥
जब वह दो अग्नियों का आधान करता है तो उनको उत्पन्न करता है और उत्पन्न करके
उनका पालन करता है। और जैसा वह इसका इस लोक में उत्पन्न करके पालन करता है, वैसा
ही वह (अग्नि) उस लोक में उसको उत्पन्न करके उसका पालन करता है।
इस अग्नि को अधूरा न हटावे। यदि इसको अधूरा हटा देगा तो जिस प्रकार अग्नि को
इस लोक में ह्रास करेगा, उसी प्रकार अग्नि उस लोक में उसका भी ह्रास कर देगा। इसलिए
उसको अग्नि को अधूरा न हटाना चाहिए ॥४॥
और जब वह मरता है और उसे अग्नि पर रखते हैं तो वह अग्नि से ही उत्पन्न होता
है। जो (अग्नि) अब तक उसका पुत्र था, वह अब उसका पिता हो जाता है ॥५॥
इसीलिए ऋषि ने कहा था-"शतमिन्नु शरदोऽअन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः" (यजु० २५।२२; ऋ० १।८६।६)
—"हे देवताओ, सौ वर्ष हमारे सामने हैं जब तुम हमारे शरीरों के बुढ़ापे को करते हो। जब पुत्र
पिता हो जाते हैं आप हमारी पूरी होनेवाली आयु को बीच में मत काटो।" क्योंकि जो (अग्नि)
अब तक पुत्र था अब पिता हो गया। यही कारण है कि अग्न्याधान करना चाहिए ॥६॥
यह जो सूर्य है वह मृत्यु है, इसलिए उससे इस ओर की प्रजा मर जाती है। और जो
उससे परली ओर हैं अर्थात् देव, वे अमर रहते हैं। ये सब प्रजाएँ किरणों द्वारा प्राणों में स्थित
हैं। इसीलिए किरणें प्राणों तक जाती हैं ॥७॥
यह सूर्य जिसको चाहता है उसके प्राण लेकर उदय होता है और वह मर जाता है। जो

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२४४ शतपथ ब्राह्मण
न॑तिमुच्या॒थामुं लो॒कमे॑ति॒ यथा॑ है॒वास्मिं॑ल्लो॒के न संय॑तमाद्रियते॒ यदा॒ यदै॑व का-
म॒येते॒ऽथ मार॑यन्त्येव॒मु है॒वामुष्मिं॑ल्लो॒के पु॑नःपुनरे॒व प्र॑मारयति ॥ ८॥ स य॒त्साय-
म॒स्तमि॑ते द्वेऽआहु॑ती जु॒होति॑ । त॒देताभ्यां पूर्वाभ्यां पद्भ्या॑मे॒तस्मिन्मृ॒त्यौ प्रति॑ति-
ष्ठ॒त्यथ य॒त्प्रात॑रनुदिते द्वेऽआहु॑ती जु॒होति॒ तदेताभ्याम॒पराभ्यां पद्भ्या॑मे॒तस्मिन्मृ॒त्यौ
प्रति॑तिष्ठति स॒ एन॒मेष उ॒द्यन्ने॒वादा॒योदे॑ति॒ तदे॒तं मृ॒त्युमति॑मुच्यते॒ तेषा॑ग्निहो॒त्रे
मृ॒त्योरति॑मुक्ति॒रिति॑ ह॒ वै पु॑नर्मृ॒त्युं मु॑च्यते॒ य ए॒वमे॒ताम॑ग्निहो॒त्रे मृ॒त्योरति॑मुक्तिं
वे॒द ॥ ९॥ यथा वाऽइ॒षोरनी॑कम् । ए॒वं य॒ज्ञानाम॑ग्निहो॒त्रं येन॒ वाऽइ॒षोरनी॑कमे-
ति॒ सर्व्वा॒ वै तेने॒षुरेत्ये॒तेनो॑ हास्य॒ सर्वे॑ य॒ज्ञक्रत॑व ए॒तं मृ॒त्युमति॑मुक्ताः ॥ १०॥ अ-
होरा॒त्रे ह॒ वाऽअ॒मुष्मिं॑ल्लो॒के परि॑प्लवमाने । पु॒रुष॑स्य सुकृ॒तं क्षि॑णुतो॒ऽर्वाची॑नं वा
ऽअ॒तोऽहो॑रा॒त्रे तथो॑ हास्या॒होरा॒त्रे सुकृ॒तं न क्षि॑णुतः ॥ ११॥ स यथा॒ रथो॑प॒स्थे
तिष्ठ॑न् । उ॒परिष्टा॑द्रथच॒क्रे प॒ल्यङ्ग॑माने॒ऽउपा॑वे॒क्षेतै॒वं प॒रस्ता॑द॒र्वाची॑नो॒ऽहोरा॒त्रेऽउ-
पावे॑क्षते॒ न ह॒ वाऽअ॒स्याहो॑रा॒त्रे सुकृ॒तं क्षि॑णुतो॒ य ए॒वमे॒ताम॑होरा॒त्रयोरति॑मुक्तिं
वे॒द ॥ १२॥ पूर्वे॑णा॒हव॑नीयं परी॒त्य । अ॒न्तरे॑ण गा॒र्हप॑त्यं चैति॒ न वै दे॒वा म॑नु॒ष्यं॑
वि॒दुस्त॒ऽएन॑मेतद॒न्तरे॑णाति॒यन्तं॑ वि॒दुरयं वै न इदं जु॑होतीत्य॒ग्निर्वै पा॒प्मनो॑ऽप॒ह-
न्ता ताव॒स्याहव॑नीयश्च गा॒र्हप॑त्यश्चा॒न्तरे॑णाति॒यतः पा॒प्मान॒मप॑हतः॒ सोऽप॑हतपा-
प्मा ज्योति॑रेव॒ श्रिया य॒शसा॑ भवति ॥ १३॥ उत्त॑रतो वाऽअ॒ग्निहो॒त्रस्य॒ द्वार॑म् ।
स॒ यथा॒ द्वारा॒ प्रप॑द्येतै॒वं तद्यो दक्षि॑णात ए॒त्यास्ते॒ यथा॑ बहि॒र्धा च॑रेदे॒वं तत्
॥ १४॥ नौर्ह वाऽए॒षा स्व॒र्ग्या । यद॑ग्निहो॒त्रं त॒स्याऽए॒तस्यै ना॒वः स्व॒र्ग्याया आहु॑-
वनी॒यश्चै॑व गा॒र्हप॑त्यश्च नौम॒ण्डेऽअ॒थैष ए॒व ना॑वा॒जो यत्क्षी॑र॒होता ॥ १५॥ स य-
त्प्राङ्पोद॑िति । तदे॑नां प्राची॑म॒भ्यज॑ति स्व॒र्गं लो॒कम॒भि तया॑ स्व॒र्गं लो॒कं सम॑-
श्नुते॒ तस्या॒ उत्त॑र॒त् आरो॑हण॒ꣳ सेन॑ꣳ स्व॒र्गं लो॒कं स॒माप॑यत्यथ॒ यो दक्षि॑णात
ए॒त्यास्ते॒ यथा॑ प्रती॒र्णाया॒माग॒हेत्स वि॒हीये॑त स त॒त ए॒व बहि॒र्धा स्यादे॒वं तत् ॥ १६॥

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ३, क० ८-१६ शतपथब्राह्मण / २४५
इस मृत्यु से न बचकर उस लोक में जाता है, उसको बार-बार मारा जाता है, उसी प्रकार जैसे
इस लोक में कैदी पर सख्ती करते हैं और जब चाहते हैं तब मार डालते हैं ॥८॥
यह जो शाम को सूर्यास्त होने पर दो आहुतियां देता है वह इन दो अगले पैरों से इस
मृत्यु पर प्रतिष्ठा पाता है। और यह जो सूर्योदय से पूर्व ही आहुतियां देता है वह पिछले दो
पैरों से इस मृत्यु पर प्रतिष्ठा पाता है, और जब सूर्य निकलता है तो उसको लेकर मृत्यु से छूट
जाता है। यह अग्निहोत्र के द्वारा मृत्यु से छूटने का विधान है। जो इस प्रकार अग्निहोत्र द्वारा
मृत्यु से छुटकारे का ज्ञान रखता है, वह बार-बार की मौत से छूट जाता है ॥६॥
जैसे तीर की नोक होती है वैसे ही यज्ञ और अग्निहोत्र का सम्बन्ध है। जिधर तीर की
नोक जाती है उसी ओर तीर जाता है। इस (अग्निहोत्र) द्वारा सब यज्ञ मृत्यु से छूटने के साधन
हैं ॥१०॥
रात और दिन घूमते हुए मनुष्य के सुकृत को उस लोक में क्षीण कर देते हैं। परन्तु दिन
और रात उसके इस ओर हैं, इसलिए दिन-रात उसके सुकृत को क्षीण नहीं करते ॥११॥
और जैसे रथ में बैठे हुए ऊपर से रथ के घूमते हुए पहियों को देखता है, उसी प्रकार वह
ऊपर से दिन और रात को देखता है। और जो इस प्रकार दिन और रात से छुटकारा पाने का
भेद जानता है, उसके सुकृत को दिन और रात क्षीण नहीं कर सकते ॥१२॥
(यजमान) पूर्व की ओर से आहवनीय का चक्कर लगाकर उसके और गार्हपत्य के बीच
में होकर (अपने स्थान को) जाता है, क्योंकि (अभी) देव (इस) मनुष्य को पहचानते नहीं।
परन्तु जब वह बीच में से जाता है तो पहचानते हैं कि यही हमको आहुति देगा। अग्नि पाप का
नाशक है और आहवनीय और गार्हपत्य उसके पाप को नष्ट कर देते हैं जो उन दोनों के बीच में
होकर निकलता है। और उसका पाप नष्ट हो जाने पर भी वह श्री और यश से युक्त होकर
ज्योति हो जाता है ॥१३॥
अग्निहोत्र का द्वार उत्तर की ओर है। इसलिये वह ऐसे घुसता है मानो द्वार में होकर
घुसा। और जो दक्षिण से जाकर बैठ जाय तो मानो वह बाहर चला गया ॥१४॥
अग्निहोत्र स्वर्ग की नाव है। आहवनीय और गार्हपत्य उस स्वर्ग की नाव की दो तरफें
हैं, और दूध की आहुति देनेवाला मल्लाह है ॥१५॥
जब वह पूर्व की ओर चलता है तो मानो वह इस नाव को पूर्व की ओर स्वर्ग की ओर ले
जाता है और उसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेता है। उस पर उत्तर से चढ़ना उसको
स्वर्गलोक में ले जाना है। जो दक्षिण से घुसकर उसमें बैठता है तो ऐसा समझना चाहिए मानो
वह उस समय नाव में घुसने लगा जब वह चल पड़ी और वह पीछे ओर बाहर रह गया ॥१६॥

अध्याय-३, ब्राह्मण-४

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२४६ शतपथ ब्राह्मण
अथ॒ यामेता॒ꣳ समि॑धम॒भ्याद॑धाति॒ सैष्ट॑का येन॒ मन्त्रे॑ण जु॒होति॒ तद्यु॒र्येनैतामिष्ट॑-
कामुप॒दधा॑ति यदा वाऽइ॒ष्टकोपधीय॑तेऽथाऽहुति॒र्हूय॑ते॒ तद॒स्योप॑हितास्वे॒वेष्ट॑कास्वे॒-
ता आहु॑तयो हूयन्ते या ए॒ता अ॑ग्निहोत्राहुतयः ॥ १७ ॥ प्र॒जाप॑तिर्वाऽअ॒ग्निः । सं-
व॒त्स॒रो वै प्र॒जाप॑तिः संवत्स॒रे-संवत्सरे ह वाऽअ॒स्या॒ग्नि॒होत्रं॑ चि॒त्येना॒ग्निना॒ सं-
तिष्ठते सवत्स॒रे-संवत्सरे चित्‍यम॒ग्निमाप्नो॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होत्येत॒द्ध
हा॒स्या॒ग्निहोत्रं॑ चि॒त्येना॒ग्निना॒ संति॑ष्ठते चि॒त्यम॒ग्निमाप्नो॑ति ॥ १८ ॥ सप्त॒ च वै श॒-
तान्य॒शीतीनामृचः॑ । वि॒ꣳश॒तिश्च॒ स य॒त्सायं॑ प्रा॒तर॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होति॒ ते द्वेऽआहु॑ती
ता अ॒स्य सं॑वत्स॒रऽआहु॑तयः संपद्यन्ते ॥ १९ ॥ सप्त॒ चैव श॒तानि॑ वि॒ꣳश॒तिश्च॑ ।
संवत्स॒रे-संवत्सरे ह वा॒ऽअ॒स्या॒ग्निहोत्रं॑ म॒रुतो॒क्थ्येन॒ संप॑द्यते संवत्स॒रे-संवत्सरे
म॒रुदु॒क्थ्यमाप्नो॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वान॒ग्निहोत्रं॑ जु॒होत्येत॒द्ध हा॒स्या॒ग्निहोत्रं॑ म॒रुतो॒क्थ्येन॒
संप॑द्यते म॒रुदु॒क्थ्यमाप्नो॑ति ॥ २० ॥ ब्राह्मणम् ॥ १ [३. ३.] ॥ ॥
अ॒ग्नौ ह॒ वै देवाः॑ । सर्वा॒न्पशू॒न्निद॑धिरे॒ ये च॒ ग्राम्या ये चार॑ण्या वि॒जये॑ वोप॒-
प्रेष्यन्तः॑ कामचा॒रस्य॑ वा कामा॒याय॑ नो गोपि॒ष्ठो गोपाय॒दिति॑ वा ॥ १ ॥ तानु॒ हा-
ग्निर्निच॑कमे । तैः सं॒गृह्य॒ रात्रिं॑ प्र॒विवेश॒ पुन॒रेम॒ इति॑ दे॒वा इद॑ग्निं तिरोभू॒तं ते
ह विदां॑ चक्रुरि॒ह वै प्रावि॑क्षद्रा॒त्रिं वै प्रावि॑क्ष॒दिति॒ तमे॑तत्प्र॒त्याय॒त्याꣳ रा॒त्रौ सा॒-
यमुपा॑तिष्ठन्त दे॒हि नः॑ पशून्पुन॒र्नः पशून्दे॒हीति॒ तेभ्यो॒ऽग्निः॑ पशून्पुनर॑ददात् ॥ २ ॥
तस्मै॒ कम॒ग्नीऽउ॑पतिष्ठेत । अ॒ग्नी वै दा॒तारौ॑ तावे॒वैतद्या॑चते सा॒यमुपा॑तिष्ठेत सा॒यꣳ
हि दे॒वा उपा॑तिष्ठन्त दत्तो हैवास्मा॒ऽए॒तौ पशू॒न्य ए॒वं वि॒द्वानु॒पति॑ष्ठते ॥ ३ ॥ अ-
थ यस्मान्नोप॑तिष्ठेत । उ॒भये॑ ह॒ वाऽइ॒दमग्रे॑ स॒हाऽऽसु॑र्देवा॒श्च मनु॒ष्याश्च॒ तद्य॒द्ध स्म म-
नु॒ष्याणां॒ न भव॑ति॒ तद्ध स्म॑ दे॒वान्याच॑न्त॒ऽइदं वै नो॒ नास्ती॒दं नो॒ऽस्त्विति॑ ते त॒-
स्याऽए॒व या॒ञ्चायै॑ द्वे॒षेण॑ दे॒वास्ति॑रोभू॒ता नेद्दिन॑सानि॒ नेद्वेष्यो॒ऽसा॒नीति॒ तस्मा-
न्नोप॑तिष्ठेत ॥ ४ ॥ अथ यस्मादु॑पे॒व ति॑ष्ठेत् । य॒ज्ञो वै दे॒वानामाशी॑र्यजमानस्य त-

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ३-४, कं० १७-२० व १-५ शतपथब्राह्मण / २४७
इस पर जो समिधा रखता है वह मानो ईंट है। जिस मन्त्र से आहुति देता है वह यजुः
है जिससे वह ईंट रक्खी जाती है। और जब ईंट रख ली जाती है तब आहुति दी जाती है। इस-
लिए उन रक्खी हुई ईंटों पर वे ही आहुतियाँ दी जाती हैं, जो अग्निहोत्र की आहुतियाँ हैं। (दूसरे
बड़े यज्ञ से उपमा दी है) ॥१७॥
प्रजापति अग्नि है और प्रजापति संवत्सर है। इसलिए वर्ष-प्रतिवर्ष अग्नि-चय पर
अग्निहोत्र होता है और वर्ष-प्रतिवर्ष अग्नि-चय किया जाता है, उस मनुष्य का जो यह समझकर
अग्निहोत्र करता है ॥१८॥
अस्सी ऋचाओं की सात सौ बीस आहुतियां देवें। सायं और प्रातः के अग्निहोत्र की दो
आहुतियाँ होती हैं। इस प्रकार वर्ष-भर में— ॥१९॥
सात सौ बीस आहुतियाँ हुईं। इस प्रकार वर्ष-प्रतिवर्ष यह अग्निहोत्र बड़ी स्तुति द्वारा
किया जाता है। और जो अग्निहोत्र (उसके) रहस्य को समझकर करता है उसको बड़ी स्तुति
की प्राप्ति हो जाती है ॥२०॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ४
देवों ने अपने सब पशुओं को, चाहे गाँव के, चाहे जंगली, अग्नि को सौंप दिया। या तो
वे विजय के लिए जा रहे थे या स्वतन्त्र विचरना चाहते थे, या यह समझकर कि अग्नि रक्षक है,
इनकी रक्षा करेगा ॥१॥
अग्नि को उन पर लोभ आ गया। वह उनको लेकर रात्रि में प्रविष्ट हो गया। देवों ने
कहा, चलो लौट चलें और जहाँ अग्नि छिपा था वहाँ पहुँच गये। उन्होंने जान लिया कि अग्नि
यहाँ छिपा है, रात में छिपा है। जब सायंकाल को रात्रि वापस आई तो उन्होंने कहा, 'हमारे
पशु लौटा, हमारे पशु लौटा।' अग्नि ने उनके पशु लौटा दिये ॥२॥
इसलिए दोनों अग्नियों का नम्रता से सेवन करे। दोनों अग्नियां दाता हैं। उन्हीं से
माँगता है। शाम को सेवन करे। शाम ही को देवताओं ने सेवन किया था। जो ज्ञानपूर्वक दोनों
अग्नियों का सेवन करता है उसको वे पशु देते हैं ॥३॥
अग्नियों का सेवन करने के विरुद्ध यह युक्ति दी जाती है। पहले देव और मनुष्य दोनों
साथ रहते थे। जो चीज मनुष्यों के पास नहीं होती थी उसको वे देवों से माँगते थे, 'हमारे पास
यह वस्तु नहीं है। इसे हमको दीजिए।' इस माँगने के द्वेष के कारण देव छिप गये। इसलिए देवों
के पास नहीं जाना चाहिए कि कहीं वे हिंसा या द्वेष न करें ॥४॥
सेवन करने के पक्ष में यह युक्ति दी जाती है—यज्ञ देवों का है और आशीर्वाद यजमान

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->अ॒यं(underbar on a)ते॒(underbar on te)योनि॑र्ऋ॒त्वियः॑ ।(svarita on ni, underbar on ri, svarita on yah)यतो॑(svarita on to)जा॒तोऽअ-` (underbar on jaa)

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० ५-१३ शतपथब्राह्मण / २४६
का। यह आहुति (अग्निहोत्र) भी यज्ञ ही है और जो कुछ वह (यजमान) वहाँ रहकर करता है
वह यजमान के लिए आशीर्वाद है। इसलिए अवश्य सेवन करना चाहिए ॥५॥
सेवन के विरुद्ध यह युक्ति है— जो कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय के पास जाकर उसकी प्रशंसा
करता है और कहता है 'यह मुझे दान देगा या मेरा घर बनवा देगा', वह उसको वाणी और कर्म
से खुश करता है; परन्तु जो कहता है 'तू मेरा कौन है ? मुझे क्या देगा ?' तो वह मालिक उससे
अप्रसन्न रहेगा, उससे द्वेष करेगा । इसलिए अग्नियों के पास नहीं जाना चाहिए क्योंकि प्रज्वलित
करने और आहुति देने से वह माँग चुकता है, फिर (माँगने के लिए) अग्नियों के पास नहीं जाना
चाहिए ॥६॥
अब सेवन के पक्षों में यह युक्ति है। जो मांगता है उसको दाता भी मिल जाता है। कोई
मालिक अपने नौकर की आवश्यकताओं को नहीं जानता जब तक नौकर नहीं कहता कि 'मैं
आपके ही ऊपर हूँ। आप मेरा पालन कीजिए।' जब जान जाता है कि यह मेरे ही आश्रित है तो
उसका पालन करता है। इसलिए अग्नियों का सेवन ही करना चाहिए। अग्नियों के सेवन के पक्ष
में ये युक्तियाँ हैं ॥७॥
अग्नि प्रजापति है। इसलिए जब अग्निहोत्र किया जाता है तो वह (अग्नि) जिस पर
शासन करता है या जो उसके अनुकूल होता है उसके वीर्य का वह सिंचन करता है। (अग्नियों
के) सेवन करनेवाला उस अग्नि का इन सब बातों में अनुकरण करता है और सन्तानोत्पत्ति
करता है ॥८॥
वह 'उप'* वाले मन्त्र से प्रार्थना करता है। 'उप' का अर्थ है पृथिवी, और यह दो
प्रकार से— जो कुछ इस संसार में उत्पन्न होता है वह इस पृथिवी पर उत्पन्न होता है ('उप' +
जायते); और जो नष्ट होता है वह यहीं दबाया जाता है ('उप' + उप्यते)। इसलिए यहाँ रात-
दिन आधिक्य होता रहता है (अर्थात् पृथिवी पर जो उत्पन्न हुआ वह भी आधिक्य है और जो
उसमें गाड़ दिया गया वह भी आधिक्य हुआ)। इसलिए वह ('उप' वाले मन्त्र से आरम्भ करके)
आधिक्य से आरम्भ करता है ॥६॥
अब वह कहता है, “उप प्रयन्तोऽअध्वरम्” अर्थात् "मैं अध्वर में (पर) जाऊँ ।” 'अध्वर'
नाम है यज्ञ का। इसलिए "मैं यज्ञ में (पर) जाऊँ" ऐसा अर्थ हुआ। अब कहता है, “मन्त्रं
वोचेमाग्नये ।”— “अग्नि के लिए मन्त्र बोले ।" क्योंकि वह मन्त्र बोलने ही को है। अब कहता है,
"आरेऽअस्मे च शृण्वते ।”—“उसके लिए जो हमको दूर से सुनता है" अर्थात् 'यद्यपि तू हमसे
दूर है तो भी तू इस प्रार्थना को सुन, और हमारा भला चीत' ॥१०॥
अब कहता है, “अग्निर्मूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्याऽअयम्। अपाँ२रेताँ२सि जिन्वति”
(यजुर्वेद ३।१२)— “अग्नि द्यौ लोक का सिर, महान्, पृथिवी का पति है। यह जलों में वीर्य को
सींचता है।" इस प्रकार इस मन्त्र के द्वारा वह प्रार्थना करता हुआ उसके पीछे दौड़ता है जैसे
माँगनेवाले दौड़ते हैं और कहता है, 'तू ऐसों की सन्तान है, तू ऐसा कर सकता है, तू ऐसा
है' ॥११॥
अब इन्द्र और अग्निवाला मन्त्र— "उभा वामिन्द्राग्नीऽआहुवध्याऽउभा राधसः सह
मादयध्यै । उभा दाताराविषाँ२ रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम्” (यजु० ३।१३)— “इन्द्र
और अग्नि, मैं तुम दोनों को बुलाता हूँ। मैं तुम दोनों को प्रीति की हवि से प्रसन्न करूँगा। तुम
दोनों बल और धन के दाता हो। तुम दोनों को अन्न की प्राप्ति के लिए बुलाता हूँ।" इन्द्र सूर्य का
नाम है। जब वह अस्त हो जाता है तो आहवनीय अग्नि में प्रविष्ट हो जाता है। इसलिए प्रार्थी
उन दोनों मिले हुओं से प्रार्थना करता है कि ये दोनों मिलकर मुझको देंगे। इसीलिए इन्द्र और
अग्निवाला मन्त्र पढ़ता है ॥१२॥
अब पढ़ता है, "अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातोऽअरोचथाः । तं जानन्नग्नऽआरोहाथा

  • उप प्रयन्तोऽअध्वरं मन्त्रं वोचेमाग्नये । आरेऽअस्मे च शृण्वते । (यजु० ३।११)
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रोचथाः । तं जानन्नग्न॒ऽआरोहाथा नो वर्धया रयिमिति पुष्टं वै रयिर्भूयो-भूय ए-
व न इदं पुष्टं कुर्वित्येवैतदाह ॥ १३ ॥ अयमि॒ह प्रथ॒मः । धायि धातृभिर्होता य-
जिष्ठोऽअध्वरेष्वीड्यः । यमप्रवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभुं विशे-विश॒ऽइ-
त्यन्वेव धावति तद्यथा याञ्चन्कल्याणं वदेदानुष्यायणो वै त्वमस्यलं वै त्वमेतस्मा
ऽअसीत्येवमेषा यथोऽएवैष तयोऽह्वैनमेतदाह यदाह विभुं विशे-विश॒ऽइति वि-
भूर्ह्येष विशे-विशे ॥ १४ अस्य प्रत्नाम् । अनु द्युत॒ग्ं शुक्रं दुदुह्रेऽअ॒स्रयः । पयः
सहस्रसामृषिमिति परमा वाऽएषा सनीनां यत्सहस्रसनिस्तदेतस्यैवावरुद्धै तस्मा-
दाह पयः सहस्रसामृषिमिति ॥ १५ ॥ तदेतत्समाहार्यं षडृचं । तस्योपवती प्रथ-
मा प्रत्नवत्युत्तमाऽथोचाम तद्यस्मादुपवत्याह ह्व प्रत्नं यावन्तो ह्येव सनाये दे-
वास्तावन्त एव देवास्तस्माददः प्रत्नं तदिमेऽएवांतरेण सर्वे कामास्तेऽअस्माऽइमे
संतानाने सर्वान्कामान्त्संनमतः ॥ १६ ॥ स वै त्रिः प्रथमां जप॑ति । त्रिरुत्तमां त्रि-
ष्कृत्यायणा हि देवास्त्रिवृद्धयनास्तस्मात्त्रिः प्रथमां जप॑ति त्रिरुत्तमाम् ॥ १७ ॥ यद्ध
वाऽअ॒त्राग्निहो॒त्रं जुह्वत् । वाचेन वा कर्मणा वा मिथ्या करोत्यात्मनस्तदवद्य-
त्यायुषो वा वर्चसो वा प्रजा॑यै वा ॥ १८ ॥ तडु खलु तनूपा अग्नेऽसि । तन्वं मे
पाह्यायुर्दा अग्नेऽस्यायुर्मे देहि वर्चोदा अग्नेऽसि वर्चो मे देहि । अग्ने यन्मे तन्वा
ऊनं तन्मऽआपृणेति ॥ १९ ॥ यद्ध वाऽअ॒त्राग्निहो॒त्रं जुह्वत् । वाचेन वा कर्मणा
वा मिथ्या करोत्यात्मनस्तदवद्यत्यायुषो वा वर्चसो वा प्रजा॑यै वा तन्मे पुनरा-
प्यायेत्येवैतदाह भूयो हास्यैतत्पुनराप्यायते ॥ २० ॥ इन्धानास्त्वा । शत॒ग्ं हिमा
द्युमन्त॑ समिधीमहीति शतं वर्षाणि जीवास्मेत्येवैतदाह तावन्ता महाग्ं स-
मिधीमहीति यदाह द्युमन्त॒ समिधीमहीति वयस्वन्तो वयस्कृत॒ग्ं सहस्वन्तः स-
हस्कृतमिति वयस्वन्तो वयं भूयास्म वयस्कृतं भूया इत्येवैतदाह सहस्वन्तो वयं
भूयास्म सहस्कृतं भूया इत्येवैतदाहाग्ने सपत्नदम्भनमदब्धासोऽअदाभ्यमिति त्वया

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० १३-२१ शतपथब्राह्मण / २५१
नो वर्धया रयिम्” (यजु० ३।१४) - "यह तेरी ऋतु के अनुकूल योनि है जहां से उत्पन्न होकर
तू चमकता है। हे अग्नि ! इस बात को जानकर उठ और हमारा धन बढ़ा।" 'रयि' का अर्थ है
पुष्टि। इस मन्त्र का अर्थ यह है कि 'तू हमारी बढ़ोतरी कर' ॥१३॥
अब कहता है, “अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठोऽअध्वरेष्वीड्यः । यमप्नवानो
भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशे" (यजु० ३।१५) - "विधाताओं द्वारा प्रथम यह यहाँ
बनाया गया, सर्वश्रेष्ठ होता और यज्ञ में पूजा के योग्य, जिसको अप्नवान और भृगु ने प्रज्वलित
किया, वनों में विचित्रता से चमकते हुए और घर-घर में फैलते हुए' ॥१४॥
अब कहता है, "अस्य प्रत्नामन्नु द्युतं शुक्रं दुदुह्रे अह्रयः । पयः सहस्रसामृषिम्" (यजुर्वेद
३।१६) - " ( अह्रयः ) न शरमानेवाले लोगों ने (अस्य) इस अग्नि के ( प्रत्नाम् ) सन्तान ( द्युतं )
प्रकाशयुक्त (शुक्रं) शुद्ध (पयः) दूध को (सहस्रसाम् + ऋषिम्) हजारों देनेवाले ऋषि से
(दुदुह्रे ) दुहा।" 'सहस्रसा' का अर्थ है परम दान देनेवाला। इसी की प्राप्ति के लिए वह कहता
है 'सहस्रसाम् ऋषिम्' ॥१५॥
ये छः ऋचाओं के मन्त्र हैं। पहले में 'उप' शब्द है और पिछले में 'प्रत्न' (अर्थात्
यजुर्वेद के तीसरे अध्याय, ११ से १६ मन्त्र तक)। हमने इनका उच्चारण इसलिए किया 'उप'
वाली यह अर्थात् पृथिवी है और प्रत्न (सन्तान) वह अर्थात् द्यौ है। क्योंकि जितने देव पहले थे
उतने अब भी हैं, इसलिए 'प्रत्न' का अर्थ द्यौलोक है। अब इन्हीं दोनों के बीच में सब कामनाएँ
हैं और ये दोनों यजमान के हित के लिए और उसकी कामनाओं की पूर्ति के लिए संयुक्त
हैं ॥१६॥
पहला मन्त्र तीन बार जपता है और अन्तिम तीन बार। क्योंकि यज्ञ तीन आरम्भ और
तीन अन्तवाले होते हैं, इसलिए तीन बार प्रथम मन्त्र जपता है और तीन बार अन्तिम ॥१७॥
अग्निहोत्र करने में जो कुछ भूल वाणी या कर्म से करता है उससे वह आत्मा आयु, वर्चस्
और प्रजा को हानि पहुँचाता है ॥१८॥
इसलिए कहता है, “तनूपाऽअग्नेऽसि तन्वं मे पाह्यायुर्दाऽअग्नेऽस्यायुर्मे देहि वर्चोदाऽअग्नेऽसि
वर्चो मे देहि । अग्ने यन्मे तन्वाऽऊनं तन्मऽआपृण” (यजु० ३।१७) - “हे अग्नि ! तू शरीरों का
रक्षक है, मेरे शरीर की रक्षा कर। हे अग्नि ! तू आयु को देनेवाला है, मुझे आयु दे। हे अग्नि !
तू वर्चस् को देनेवाला है, मुझे वर्चस् दे । हे अग्नि ! जो मेरे शरीर में कमी है उसको मेरे लिए
पूरा कर” ॥१९॥
और अग्निहोत्र करने में वह वाणी या कर्म से जो भूल करता है उससे वह आत्मा आयु,
वर्चस् और प्रजा को हानि पहुँचाता है। जब वह इस मन्त्र को पढ़ता है 'मेरी कमी को पूरा कर'
तो वह कमी पूरी हो जाती है ॥२०॥
अब कहता है, “इन्धानास्त्वा शतꣳ हिमा द्युमन्तं समिधीमहि” (यजु० ३।१८)—
"प्रज्वलित हम सौ वर्षों तक तुझ जलते हुए के ऊपर समिधा रखते हैं।" इससे तात्पर्य है कि हम
सौ वर्ष जीते रहें, और 'जलते हुए तुझ पर समिधा रक्खें' का अर्थ है कि 'हे महान् ! हम तुझको
प्रज्वलित करते हैं।' अब कहता है- “वयस्वन्तो वयस्कृतꣳ सहस्वन्तः सहस्कृतम्” (यजु० ३।१८)
-“अन्नवाले हम तुझ अन्न देनेवाले को, बलवान् हम बल देनेवाले तुझको।" इसका अर्थ है कि
'हम अन्नवाले हों, तू अन्न देनेवाला हो। हम बलवाले हों, तू बल देनेवाला हो।' अब कहा- “अग्ने
सपत्नदम्भनमदब्धासोऽअदाम्यम् ।” (यजु० ३।१८) – “हे अग्नि ! क्षतिरहित हम तुझ क्षतिरहित

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२५२ शतपथ ब्राह्मण
वय॒ꣳ सपत्नान्पापीयसः क्रियास्मेत्ये॒वैतदाह ॥ २१॥ चित्रावसो स्वस्ति ते पार॒म-
शीयेति । त्रि॒रेतज्जपति रात्रिर्वै चित्रावसुः सा हीय॒ꣳ संगृह्येव चित्राणि वसति
तस्मान्नारकाश्चिन्न॑ ददृशे ॥ २२॥ ए॒तेन ह स्म वाऽऋषयः । रात्रेः स्व॒स्ति पार॒ꣳ स-
मश्नुवत॒ऽएतेनो॑ ह स्मैनान्॒रात्रीर्नाष्ट्रा रक्षाꣳसि न विन्दन्त्येतेनोऽए॒वैष एतद्रात्रेः
स्व॒स्ति पार॒ꣳ समश्नुत॒ऽएतेनोऽएनꣳ रात्रीर्नाष्ट्रा रक्षाꣳसि न विन्दन्त्येतावन्नु ति-
ष्ठञ्जपति ॥ २३॥ अथासीनः । सं त्वमग्ने॒ सूर्य्यस्य॒ वर्च॑सा गथा॒ इति तद्यदस्तं यन्ना-
दित्य आहवनीयं प्रविशति तेनैतदाह समृषीणाꣳ स्तुतेनेति तद्यदुपतिष्ठते तेनै-
तदाह॒ सं प्रियेण॒ धाम्नेत्याहुतयो वाऽअस्य प्रियं धामाहुतिभिरेव तदाह सम॒ह-
मायु॑षा सं वर्च॑सा सं प्र॒जया॒ सꣳ रायस्पोषे॑ण गमिषीयेति यथा त्वमेतैः समगथा
ए॒वमहम॒युषा वर्च॑सा प्र॒जया रायस्पोषे॑णेति यद्ब्रूतेति तदे॒वमहमेतैः संगहाऽइत्ये-
वैतदाह ॥ २४॥ अथ गामभ्यैति । अन्य॒ स्थान्यो वो भक्षीय मह॒ स्थ महो वो
भक्षीयेति यानि वो वीर्य्याणि यानि वो महाꣳसि तानि वो भक्षीयेत्येवैतदा-
ह॒ोर्ज॒ स्थोर्जं॑ वो भक्षीयेति रस॒ स्थ रसं वो भक्षीयेत्येवैतदाह रायस्पोष॒ स्थ रा-
यस्पोषं वो भक्षीयेति भूमा॒ स्थ भूमानं वो भक्षीयेत्येवैतदाह ॥ २५॥ ॥ शतम्
११०० ॥ ॥ रेवती रमध्वमिति रेवन्तो हि पश॒वस्तस्मादाह रेवती रमध्वमित्य-
स्मि॒न्योनाव॒स्मिन्गोष्ठेऽस्मिँल्लोकेऽस्मिन्क्षये । इ॒हैव स्त॒ मापगातेत्यात्मन ए॒वैत-
दाह म॑देव मापगातेति ॥ २६॥ अथ गामभिमृशति । सꣳहितासि विश्व॑रू॒पीति
विश्व॑रूपा इव हि पश॒वस्तस्मादाह विश्व॑रूपीत्यूर्जा माविश गौपत्येनेत्यूर्जेति य-
दाह॒ रसे॒नेति तदाह गौपत्येनेति यदाह भूम्नेति तदाह ॥ २७॥ अथ गार्हपत्यम-
भ्यैति । स गार्हपत्यमुपतिष्ठतऽउप॑ त्वाग्ने दि॒वे-दिवे दोषावस्तर्धिया व॒यम् । नमो
भर॑न्त एमसीति नम ए॒वास्माऽएतत्करोति यथेनं न हिꣳस्यात् ॥ २८॥ राज॑न्तम-
ध्वराणां॑ । गो॒पामृतस्य॒ दीदि॑विम् । वर्ध॑मानꣳ स्वे दम॒ऽइति स्वं वै तद्गृहं यन्मम

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २१-२६ शतपथब्राह्मण / २५३
और शत्रुओं का दमन करनेवाले को।” इसका तात्पर्य यह है कि 'तेरी सहायता से शत्रुओं को
सर्वथा दुःखी करें' ॥२१॥
तीन बार इस मन्त्रांश को जपे- “चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय” (यजु० ३।१८)—
“हे चित्रावसो, हम भलीभांति तेरे पार को पा जायें।” 'चित्रावसु' रात है, क्योंकि यह चित्रों को
इकट्ठा करके रहती है। इसीलिए (रात में) दूर से चित्र स्पष्ट नहीं दीखता ॥२२॥
इसी मन्त्र से ऋषि लोग रात के पार को भलीभांति पा गये और इसी के कारण
दुरात्मा राक्षसों ने उनको न पाया। इसी प्रकार इसी मन्त्र के द्वारा वह रात के पार को भली-
भाँति पा जाता है और इसी के कारण दुरात्मा राक्षस उसको नहीं पा सकते। इस मन्त्र को वह
खड़े होकर जपता है ॥२३॥
अब बैठे-बैठे यह जपता है - “सं त्वमग्ने सूर्यस्य वर्चसागथाः” (यजु० ३।१६) - “हे
अग्नि, तू सूर्य के वर्चस् (प्रकाश) को प्राप्त हो गया।” यह वह कहता है क्योंकि डूबता हुआ सूर्य
आहवनीय में घुस जाता है, इसीलिये कहा। अब कहा- “समृषीणाꣳ स्तुतेन।” (यजु० ३।१६)
“ऋषियों की स्तुति से।” चूँकि वह खड़े होकर स्वयं प्रार्थना करता है इसलिए ऐसा कहता है-
“सं प्रियेण धाम्ना” (यजु० ३।१६) - “प्रिय घर के द्वारा।” आहुतियाँ इसका प्रियधाम हैं।
इसलिए 'धाम के द्वारा' का अर्थ है आहुतियों के द्वारा। अब कहा- “समहमायुषा सं वर्चसा सं
प्रजया सं॒ रायस्पोषेण गमिषीय” (यजु० ३।१६) - “मैं आयु, वर्चस्, सन्तान और धन की प्राप्ति
करूँ।” इसका तात्पर्य यह है कि 'जैसे तूने ये चीजें प्राप्त कीं, वैसे मैं भी आयु, वर्चस्, सन्तान
और धन अर्थात् समृद्धि को प्राप्त हो जाऊँ' ॥२४॥
अब इस मन्त्र को पढ़कर गाय के पास जाता है- “अन्ध स्थान्धो वो भक्षीय मह स्थ महो
वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम अन्ध (अन्न) हो, मैं तुम्हारा अन्न खाऊँ; तुम धन हो, मैं
तुम्हारा धन खाऊँ।” इसका तात्पर्य है कि तुम्हारे जो पराक्रम हों और जो धन हों उनका मैं
उपभोग करूँ। अब कहा- “ऊर्ज स्थोर्जं वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम ऊर्ज हो, मैं तुम्हारे
ऊर्जं को भोगूं।” अर्थात् 'तुम रस हो। मैं तुम्हारे रस को भोगूं।' अब कहा- “रायस्पोष स्थ
रायस्पोषं वो भक्षीय” (यजु० ३।२०) - “तुम धन हो, तुम्हारे धन को मैं भोगूँ।” अर्थात् तुम
समृद्धि हो, मैं तुम्हारी समृद्धि का भोग करूँ ॥२५॥
अब कहा “रेवती रमध्वम्” (यजु० ३।२१) - “हे धनवालो! रमण करो।” रेवन्त
अर्थात् धनवाले पशु हैं। इसलिए कहा, 'रेवती रमध्वम्।' अब कहा- “अस्मिन् योनावस्मिन्
गोष्ठेऽस्मिंल्लोकेऽस्मिन्क्षये। इहैव स्त मापेगात।” - “इस स्थान में, इस बाड़े में, इस लोक में, इस
घर में, यहाँ ही रहो, यहाँ से न जाओ।” यहाँ अपने लिए कहा है अर्थात् 'मुझको छोड़कर न
जाओ' ॥२६॥
अब इस मन्त्र से गाय को छूता है- “सं॒हितासि विश्वरूपी” (यजु० ३।२२) - “तू
इकट्ठा करनेवाली और नाना रूपवाली है।” पशु भिन्न-भिन्न रूपवाले होते हैं इसलिए (गाय को)
'विश्वरूपी' कहा। अब कहा- “ऊर्जा माविश गोपत्येन” (यजु० ३।२२) - “(गोपत्येन ऊर्जा)
गौओं से युक्त ऊर्ज के द्वारा (मा) मुझमें (विश) प्रविष्ट हो।” यहाँ 'ऊर्ज' कहने से 'रस' का
तात्पर्य है और 'गोपत्य' कहने से तात्पर्य है 'संवृद्धि' का ॥२७॥
अब गार्हपत्य में जाता है और उसकी अर्चना करता है इस मन्त्र से— “उप त्वाग्ने दिवे-
दिवे दोषावस्तर्धिया वयम्। नमो भरन्त॒एमसि” (यजु० ३।२२) - “हे अग्नि ! दिन-प्रतिदिन
नमस्कार करते हुए हम रात को प्रकाशित करनेवाले तुझको बुद्धि से प्राप्त होते हैं। वह इसलिए
इसकी अर्चना करता है कि कहीं वह उसको हानि न पहुँचा दे ॥२८॥
अब कहता है, “राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिवम्। वर्धमानं॒ स्वे दमे” (यजु०

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२५४ शतपथ ब्राह्मण
तन्नो॑ भूयो॒-भूय॑ ए॒व कु॒र्वित्ये॒वैतदा॑ह ॥ २९॥ स॒ नः॑ पि॒तेव॑ सू॒नवे॑ । अग्ने॑ सू॒पाय॒-
नो भ॑व । स॒च॑स्वा नः स्व॒स्तय॒ऽइति॒ यथा॑ पि॒ता पु॒त्राय॑ सूपच॒रो नैवे॑नं॒ केन॑ च॒न
हि॒नस्त्ये॒वं नः॑ सूपच॒रो रधि॒ मैव॑ वा॒ केन॑ च॒न हि॑सिषिष्टे॒त्येवैतदा॑ह ॥ ३०॥ अथ॑
द्विपदा॑: । अग्ने॒ त्वं नो॒ऽअन्त॑म उ॒त त्रा॒ता शि॒वो भ॑वा वरू॒थ्यः॑ । वसु॑र॒ग्निर्वसु॑श्रवा॒
अच्छा॒ नक्षि॑ सु॒मत्त॑मं र॒यिं दाः॑ ॥ तं त्वा॑ शोचिष्ठ दीदिवः सु॒म्नाय॑ नू॒नमी॑महे॒ स-
खिभ्यः॑ । स नो॑ बोधि श्रु॒धी हव॑मुरु॒ष्या णो॑ऽअघाय॒तः सम॑स्मा॒दिति॑ ॥ ३१॥ यद्वा
ऽआ॑हव॒नीय॒मुप॑तिष्ठते । प॒शूंस्तद्या॑चते॒ तस्मा॑त्तुमुच्चावचैश्छन्दो॑भिरु॒पति॑ष्ठत॒ऽउच्चा॑-
वचा इव॒ हि पशवो॒ऽथ यद्गार्ह॑पत्यं पु॒रुषां॑स्त॒द्या॑चते॒ तद्गाय॑त्रं प्रथ॒मं तृचं॑ गाय॒त्रं
वा॒ऽअग्ने॒श्छन्दः॑ स्वेनै॒वैन॑मेत॒च्छन्द॑सोप॒परै॑ति ॥ ३२॥ अथ द्विपदा॑: । पु॒रुष॒छन्द॑सं॒ वै
द्विपदा॑ द्विपाद्वा॒ऽअयं पु॑रुषः पु॒रुष॑मे॒वैतद्या॑चते पु॒रुषान्हि॑ या॑चते॒ तस्मा॑द्द्विपदाः॑
प॒शुमा॒न्त्सु वै पु॑रुष॒वान्भव॑ति॒ य ए॒वं वि॒द्वानुप॑ति॒ष्ठते॑ ॥ ३३॥ अथ गा॒मभ्यै॑ति । इ॒-
डऽए॒ह्यदि॑त॒ऽएही॑तो॒डा हि गौरदि॑ति॒र्हि गौस्ताम॑भि॒मृश॑ति का॒म्या ए॒तेति॑ मनु॒-
ष्याणां॒ ह्येतासु॒ कामाः॒ प्रवि॑ष्टा॒स्तस्मा॑दाह का॒म्या ए॒तेति॒ मयि॑ वः कामध॒रणं॑
भूया॒दित्य॒हं वः॑ प्रि॒या भू॑यासमित्ये॒वैतदा॑ह ॥ ३४॥ अथा॒न्तरे॑णाहव॒नीयं॑ च गार्ह॑-
पत्यं च । प्राङ् तिष्ठ॑न्न॒ग्निमीक्ष॑माणो जपति सोमा॒न ँ॒ स्वर॑णं कृणु॒हि ब्र॑ह्म॒णस्प॑-
ते । कक्षीव॑न्तं॒ य औ॑शि॒जः॑ ॥ यो रे॒वान्योऽअ॑मीव॒हा वसु॑वित्पुष्टि॒वर्धनः॑ । स नः॑
सिषक्तु॒ यस्तुरः॑ ॥ मा नः॒ श ँ॒सोऽअरु॑षो॒ धूर्तिः॒ प्रणङ् मर्त्य॑स्य । र॒क्षा णो॑ ब्रह्मण-
स्प॒तऽइति॑ ॥ ३५॥ यद्वा॒ऽआह॑वनी॒यमुप॑तिष्ठते । दिवं॒ तदुप॑तिष्ठ॒तेऽथ॒ यद्गार्ह॑पत्यं
पृथि॒वीं तदु॒थैतदु॑त्त॒र्द्धिन्ने॒षा हि दिग्बृहस्प॑ते॒रैता ँ॒ ह्ये॒तद्दिश॒मुप॑तिष्ठते॒ तस्मा॑द्गा-
र्ह॑पत्यं॑ जप॑ति ॥ ३६॥ म॒हि त्री॒णामवॊ॑ऽस्तु । द्यु॒क्षं मि॒त्रस्या॑र्य॒म्णः । दु॒राधर्षं॒ व-
रुणस्य॑ ॥ न हि ते॒षाममा॑ च॒न नाध॑सु॒ वार॑णेषु । ईशे॑ रि॒पुरघ॒श ँ॒सः॑ ॥ ते हि
पु॒त्रासो॒ऽअदि॑तेः॒ प्र जी॒वसे॒ मर्त्या॑य । ज्योति॒र्यच्छ॒न्त्यज॑स्र॒मिति॑ तत्रा॑स्ति नाध॑सु॒ वा-

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ४, कं० २६-३७ शतपथब्राह्मण / २५५
३।२३) — "यज्ञों के प्रकाशित करनेवाले, ऋत के चमकानेवाले रक्षक, अपने घर में बढ़नेवाले
तुझको।" इसका तात्पर्य है कि यह मेरा घर तेरा ही घर है। इसको हमारे लिए समृद्धि-शील
कर ॥२६॥
अब कहा, "स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । सचस्वा नः स्वस्तये" (यजु० ३।२४)
"हे अग्नि, तू हमारे लिए उसी प्रकार सुलभ हो जैसे पिता पुत्र को । और हमारी स्वस्ति कर।"
इसका तात्पर्य है कि जैसे पिता पुत्र के लिए सुलभ होता है और किसी प्रकार उसको हानि नहीं
पहुँचाता, इसी प्रकार तू भी हमारे लिए सुलभ हो, किसी प्रकार हानि न पहुँचा ॥३०॥
अब वह दो पदवाले मन्त्र को पढ़ता है, 'अग्ने त्वं नोऽअन्तमऽउत त्राता शिवो भवा
वरूथ्यः । वसुर्गनिर्वसुश्रवाऽअच्छा नक्षि द्युमत्तमँ रयिं दाः' (यजु० ३।२५) — "तं त्वा शोचिष्ठ
दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः । स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्या णोऽअघायतः समस्मात्"
(यजु० ३।२६) — "हे अग्नि ! तू मेरे निकट रह । रक्षक, कल्याणकारी और घर का हितकर हो ।
हे अग्नि, तुम वसु (धन) हो, वसुश्रवा अर्थात् धन देने के लिए प्रसिद्ध हो । हमको अच्छा-अच्छा
चमकदार धन दो" (यजु० ३।२५) — "अपने मित्रों को सुख के लिए हम तुझ प्रकाशस्वरूप और
चमकानेवाले के पास आते हैं। हमारे साथ रह, हमारी बात सुन और हमको पापी शत्रु से बचा"
(यजु० ३।२६) ॥३१॥
जब आहवनीय की अर्चना करता है तो पशुओं की याचना करता है, इसलिए ऊँचे-नीचे
मन्त्रों को जपता है, क्योंकि पशु भिन्न आकार के होते हैं। जब गार्हपत्य की अर्चना करता है तो
पुरुषों की याचना करता है। इसलिए पहली तीन ऋचाएँ गायत्री छन्द में हैं। गायत्री अग्नि.का
छन्द है। इसलिए उसी के छन्द से स्तुति करता है ॥३२॥
अब वह (ऊपर के) दो पदवाले मन्त्र जपता है। दो पदवाले मन्त्र पुरुष छन्द हैं, क्योंकि
पुरुष भी दो पैरवाला है, इसलिए पुरुषों की याचना करता है। पुरुषों की याचना करता है
इसलिए दो पदोंवाले मन्त्र को जपता है। जो इस रहस्य को समझकर (दोनों अग्नियों की) सेवा
करता है उसको पशु और पुरुष दोनों प्राप्त होते हैं ॥३३॥
अब वह इस मन्त्र को जपकर गाय के पास जाता है, "इड एह्यदित ऽएहि" (यजुर्वेद
३।२७) — "हे इडा, आ । हे अदिति, आ ।" इडा गौ है। अदिति गौ है। "काम्याऽ एत" अर्थात्
"कामना के योग्य तुम आओ" यह कहकर छूता है। इनमें मनुष्यों की कामनाएँ हैं, इसलिए इनको
'काम्या एत' कहा (यजु० ३।२७) । अब कहा—"मयि वः कामधरणं भूयात्" (यजु० ३।२७)
—"आपकी मेरे में इच्छा-पूर्ति हो" अर्थात् मैं आपका प्रिय होऊँ, यह तात्पर्य है ॥३४॥
अब आहवनीय और गार्हपत्य के बीच में खड़ा होकर पूर्व को देखकर (इन तीन मन्त्र)
को जपता है—'सोमानँ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते । कक्षीवन्तं यऽ औशिजः ॥ यो रेवान् योऽ
अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः । स नः सिषक्तु यस्तुरः ॥ मा नः शँ सोऽअरुषो धूर्तिः प्रणङ्
मर्त्यस्य । रक्षा णो ब्रह्मणस्पते" (यजु० ३।२८, २६, ३०) — "हे वाणी के पति, सोम को अर्पण
करनेवाले कक्षीवान औशिज को सुरीला कर", "धनवाला, दुःखनाशक, समृद्धिशील और पुष्टि
देनेवाला तथा तीव्र, हमारे पास आवे", "हे वाणी के पति ! हमारी रक्षा कर । बुरों का शाप
हम तक न आवे और न किसी मनुष्य की धूर्तता" ॥३५॥
जब वह आहवनीय में जाता है तो मानो द्यौलोक में जाता है और जब गार्हपत्य में
जाता है तो मानो पृथिवीलोक में, इससे वह अन्तरिक्ष में जाता है। यह बृहस्पति की दिशा है।
इस दिशा को प्राप्त होना चाहता है, इसलिए बृहस्पतिवाला मन्त्र जपता है ॥३६॥
अब जपता है, "महि त्रीणामवोऽस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः । दुराधर्षं वरुणस्य" (यजु०
३।३१) । "नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु । ईशे रिपुरघशँ सः' (यजु० ३।३२) । "ते हि
पुत्रासोऽ अदितेः प्र जीवसे मत्र्याय । ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्" (यजु० ३।३३) — "बड़ी द्यौलोक
सम्बन्धी, न पराजित होनेवाली मित्र, अर्यमा और वरुण तीनों की रक्षा (हमारे लिए) हो,"
"(इन देवों से रक्षित) लोगों पर भयानक मागों अथवा घरों में पापी शत्रु स्वत्व नहीं प्राप्त कर
सकते", "(ये देव) निरन्तर मनुष्य के लिए अदिति के पुत्रों के जीवन के लिए ज्योति देते हैं।"

अध्याय-४, ब्राह्मण-१

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२५६ शतपथ ब्राह्मण
र॒णेष्ठित्ये॒ते ह वाऽअ॒ध्वानो वार॑णा य॒ऽइमेऽन्त॒रेण द्यावा॑पृथि॒वीऽए॒तान्त्ये॒तदुप॑-
तिष्ठते तस्मादाह॒ नाध॑सु वार॒णेष्ठि॑ति ॥ ३७॥ अथैन्द्री॑ । इन्द्रो॒ वै य॒ज्ञस्य दे॒वता॑
सेन्द्र॑मे॒वैतद॒ग्न्युप॒स्थानं॑ कुरुते क॒दा च॒न स्त॒रीर॑सि॒ नेन्द्र॑ सश्चसि दा॒शुष॒ऽइति य-
ज॑मानो॒ वै दा॒श्वाञ् य॒जमा॑नाय दुह्युसीत्ये॒वैतदा॒होपो॑पेन्नु म॑घवन्भूय॒ इन्तु ते दानं॑
दे॒वस्य॑ पृच्यत॒ऽइति॒ भूयो॑-भूय ए॒व न इ॒दं पु॒ष्टं कु॑र्वित्ये॒वैतदाह ॥ ३८॥ अथ सा-
वि॒त्री । सवि॒ता वै दे॒वानां॑ प्रसवि॒ता तथो हास्माऽए॒ते स॑वितृप्रसूता ए॒व सर्वे॑
कामाः॒ समृ॑ध्यन्ते तत्स॑वितुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि । धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया-
दिति॑ ॥ ३९॥ अ॒थाग्ने॒यी । तद॒ग्नय॑ऽए॒वैतदा॒त्मानम॒न्ततः॑ परि॒ददा॑ति गु॒प्त्यै परि॑ ते
दू॒डभो॒ रथो॒ऽस्मां॥३७अ॒ग्ने॑तु वि॒श्वत॑ः । येन॑ र॒क्षसि॑ दा॒शुष॒ इति॑ य॒जमाना॒ वै दा॒-
श्वां॑सो॒ यो ह वाऽअ॑स्यानाधृष्यतमो॒ रथ॒स्तेने॒ष य॒जमाना॑न॒भिर॑क्षति॒ स यस्ते॑ऽना-
धृष्य॑तमो॒ रथो॒ येन॑ य॒जमाना॑न॒भिरक्ष॑सि॒ तेन॑ नः सर्व॑तोऽभिगोपायेत्ये॒वैतदाह त्रि-
रेत॑ञ्जपति ॥ ४०॥ अथ पुत्रस्य नाम गृ॑ह्णाति । इ॒दं मे॒ऽयं वी॒र्यं॑ पु॒त्रोऽनु॒संत॑नव-
दिति॒ यदि॑ पु॒त्रो न स्याद॒प्यात्मन ए॒व नाम॑ गृ॒ह्णीयात् ॥ ४१॥ ब्राह्म॑णम् ॥ २ [३.
४] ॥ अध्यायः ॥ ३ [१२] ॥ ॥
अथ हुतेऽग्निहोत्र॒ऽउप॑तिष्ठते । भूर्भुवः॒ स्वरिति तत्स॒त्येने॑वैतद्वाच॒ समर्थ॑य-
ति यदाह॒ भूर्भुवः॒ स्वरिति तया समृ॑द्ध्याशिषमाशास्ते सुप्र॒जाः प्र॒जाभि॑ स्यामिति॒
तत्प्र॒जामाशा॑स्ते सु॒वीरो वी॒रैरिति॒ तद्वी॒रानाशा॑स्ते सु॒पोषः॒ पोषैरिति तत्पुष्टि॒मा-
शास्ते ॥ १॥ यद्वाऽअ॒दो दी॒र्घम॒ग्न्युप॒स्थानम् । अशीरिव ताशीरियं तदे॒ताव॑तैवै-
तत्सर्व॑माप्नोति॒ तस्मा॑दे॒तेनै॒वोप॑तिष्ठेतैतेन॒ त्वेव॑ वयमुपचराम॒ इति॑ ह स्माहातु-
रिः ॥ २॥ अथ प्रवत्स्यन् । गा॒र्हप॒त्यमे॒वाग्र॒ऽउप॑तिष्ठते॒ऽथाहावनीय॑म् ॥ ३॥ स गा-
र्हपत्यमुप॑तिष्ठते । नर्य॑ प्र॒जां मे॑ पा॒हीति॑ प्र॒जाया है॒ष ई॑ष्टे॒ तत्प्र॒जामे॒वास्माऽए॒त-
त्परि॑ददाति गु॒प्त्यै ॥ ४॥ अथाहावनीय॒मुप॑तिष्ठते । शं॒स्य पशून्मे पा॒हीति॑ पशूना॒-