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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

शतपथ ब्राह्मण र स्वरचिह्न

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शतपथ ब्राह्मण और स्वरचिह्न
वेद-संहिताओं में स्वरचिह्न लगाने की परिपाटी अतीत काल से चली आ रही है। वैदिक
स्वर साधारणतया उदात्त, अनुदात्त और स्वरित कहलाते हैं, जिनका विवरण महर्षि दयानन्द ने
सौवर प्रकरण में दिया है।
हमारी समस्त वर्णमाला दो वर्गों में विभक्त हैं—स्वर और व्यञ्जन। इस प्रकरण से
स्वयं राजन्त इति स्वरा:—अर्थात् जिनके प्रकाशमान होने में किसी की सहायता की अपेक्षा न
हो वह स्वर है। ये स्वर स्वयं प्रकाशमान हैं, अर्थात् बोले जा सकते हैं, सुने जा सकते हैं। अ, इ,
उ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ और औ (और इनमें से प्रथम पांच के दीर्घ आ, ई, ऊ, ॠ, ॡ)—ये स्वर हैं।
अष्टाध्यायी के प्रारम्भ के माहेश्वर सूत्रों में वैदिक वाङ्मय की समस्त वर्णमाला (स्वर और
व्यंजन) परिगणित की गई है।
वर्णमाला के स्वरों से अलग दो वर्गों के १४ स्वरों का और उल्लेख किया जाता है—
प्रथम वर्ग—उदात्त, अनुदात्त और स्वरित-भेद से सात स्वर—(१) उदात्त, (२)
उदात्ततर, (३) अनुदात्त, (४) अनुदात्ततर, (५) स्वरित, (६) स्वरिते यः उदात्तः (स्वरित में
जो उदात्त हो) और (७) एकश्रुति ।
द्वितीय वर्ग—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद (सरेगमपधनि)
यः सामगानां प्रथमः स वेणोर्मध्यमः स्वरः ।
यो द्वितीय सः गान्धारस्तृतीयस्त्वृषभः स्मृतः ॥
चतुर्थ षड्ज इत्याहुः पञ्चमो धैवतो भवेत् ।
षष्ठ निषादो विज्ञेयः सप्तमः पञ्चमः स्मृतः ॥
अर्थात् वीणा के स्वरों में, और सामगान में निम्न सम्बन्ध है—
सामगान वीणा
प्रथम मध्यम (म)
द्वितीय गान्धार (ग)
तृतीय ऋषभ (रे)
चतुर्थ षड्ज (स)
पञ्चम धैवत (ध)
षष्ठ निषाद (नि)
सप्तम पञ्चम (प)
एक और भेद से स्वर तीन भागों में विभाजित हैं—मन्द (bass), मध्य (medium),
और तार (high) । इसी प्रकार त्रिधा गानविद्या में द्रुत (fast), मध्यम (medium) और
विलम्बित (slow) पाठ या उच्चारण होता है। ऋषि दयानन्द का कहना है कि ऋग्वेद के
स्वरों का उच्चारण द्रुत अर्थात् शीघ्रवृत्ति में होता है, यजुर्वेद के स्वरों का उच्चारण मध्यमवृत्ति
में और सामवेद के स्वरों का उच्चारण विलम्बित में। तीनों का उच्चारण-काल १:२:३ अनुपात
में है (ऋग् की द्रुतगति से दुगुना समय यजुर्वेद के पाठ में, और तिगुना समय सामवेद के पाठ
में)।
शतपथ ब्राह्मण के वाक्य गद्य श्रेणी के हैं। इनमें स्वरों का लगाना कोई आवश्यक बात
नहीं है। डॉ० वेबेर को बॉडलिअन लाइब्रेरी से जो पाण्डुलिपि मिली, उसका मूल लिपिकार

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दामोदर था (१७०५ वि०)। इसी लिपि पर ४० वर्ष बाद विद्याधर नामक दूसरे व्यक्ति ने स्वर-
चिह्न लगाये थे (१७४८ वि० के लगभग)।
शतपथ ब्राह्मण के स्वरचिह्नों के सम्बन्ध में डॉ० वेबेर का कथन है—शतपथ ब्राह्मण
की पुरानी पाण्डुलिपियों में एक ही स्वरचिह्न मिलता है—पंक्ति के नीचे 'पड़ी' (horizontal)
रेखा (—)। शतपथ में इस रेखा द्वारा उदात्त और स्वरित दोनों स्वरों को व्यक्त किया जाता
है (ऋग्वेद और यजुर्वेद में पंक्ति के नीचे की यह 'पड़ी' रेखा अनुदात्त का सूचक होती है)। उदात्त
का सूचक जब यह रेखा (—) होती है, तो इसे तत्सम्बन्धी वर्णस्वर के नीचे ही लगाया जाता है,
पर जब यह स्वरित होती है, तो इसे पहले के (बगलवाले) वर्णस्वर के नीचे लगाते हैं।
उदात्त का उदाहरण—नृ॒षदम् (ष उदात्त है)
स्वरित का उदाहरण—वी॒र्यम् (य स्वरित है)
उदात्त और स्वरित चिह्नों में अन्तर व्यक्त करने के लिए डॉ० वेबर ने स्वरितसूचक 'पड़ी', रेखा को
एक जगह दो पड़ी रेखाओं (=) से व्यक्त किया है। यह युग्म स्वरित स्वर के वाम पार्श्व के वर्ण-
स्वर में लगाया जाता है—वी॒॒र्यम्।
उदात्त के सम्बन्ध में निम्न नियम स्मरण रखने चाहिएँ—
१. अकारादि स्वरों से युक्त वर्ण ही उदात्त, अनुदात्त या स्वरित होते हैं—हलन्त व्यंजन
न उदात्त होंगे, न अनुदात्त, न स्वरित।
२. किसी भी एक पद में एक से अधिक उदात्त नहीं हो सकता। यह तो हो सकता है कि
किसी पद में कोई भी उदात्त न हो।
३ एक पद में अनुदात्त कई हो सकते हैं—हो सकता है कि सभी स्वरान्त-वर्ण अनुदात्त
हों। इसी प्रकार एक पद में एक से अधिक स्वरित भी हो सकते हैं। शतपथ ब्राह्मण में अनुदात्त
व्यक्त करने के लिए कोई चिह्न नहीं है। हमने अपने शतपथब्राह्मण में समस्त पाठ वेबेर का लिया
है, और इसलिए इस ग्रन्थ के स्वरचिह्न उदात्त (—), और स्वरित (=) वे ही हैं जिनका उपयोग
डॉ० वेबेर ने किया है।
स्वर-संकेत का एक उदाहरण यहाँ दिया जाता है—
१. अग्ने॑ने॒वृ जुहुयात्। सजू॒र्देवे॒न सवि॒त्रेति।
तत्सवितृ॒मुत्प्रस॒वाय सजू रा॒त्रेन्द्रे व॒ण्येति तद्रा॒त्र्या मिथुनं करोति।
—(शत० २।३।१।३७)
इसमें जिन-जिन स्वर-वर्णों के नीचे 'पड़ी' लकीरें '(-)' खिंची हैं वे सब उदात्त-स्वर-
सूचक हैं।
२. य॒ त्नै॒॒ याग्निहोत्रस्य देवताग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहेति तन्न॒॒ नाग्नये स्वाहा।
—(शत० २।३।१।३६)
इस उदाहरण में त्नै और न्न के नीचे रेखा-युग्म (=) है। इसका अर्थ यह है कि इनके अगले
अक्षर "या" से लेकर 'ता' तक स्वरित या एकश्रुति (या प्रचय) हैं, अर्थात् बराबर एक ही स्वर
चल रहा है।
डॉ० वेबेर ने अपनी भूमिका में स्पष्ट इंगित कर दिया है कि यदि अगले वर्ण पर स्वर-
चिह्न लगा हो तो उससे पूर्व के उदात्त पर स्वर-चिह्न लगाना अनावश्यक हो जाता है। [Be-
fore a following accented syllable, the preceding udatta loses its denota-
tion.]