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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 265 of 699

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Page 265

कां० २, अ० ३, ब्रा० ३-४, कं० १७-२० व १-५ शतपथब्राह्मण / २४७
इस पर जो समिधा रखता है वह मानो ईंट है। जिस मन्त्र से आहुति देता है वह यजुः
है जिससे वह ईंट रक्खी जाती है। और जब ईंट रख ली जाती है तब आहुति दी जाती है। इस-
लिए उन रक्खी हुई ईंटों पर वे ही आहुतियाँ दी जाती हैं, जो अग्निहोत्र की आहुतियाँ हैं। (दूसरे
बड़े यज्ञ से उपमा दी है) ॥१७॥
प्रजापति अग्नि है और प्रजापति संवत्सर है। इसलिए वर्ष-प्रतिवर्ष अग्नि-चय पर
अग्निहोत्र होता है और वर्ष-प्रतिवर्ष अग्नि-चय किया जाता है, उस मनुष्य का जो यह समझकर
अग्निहोत्र करता है ॥१८॥
अस्सी ऋचाओं की सात सौ बीस आहुतियां देवें। सायं और प्रातः के अग्निहोत्र की दो
आहुतियाँ होती हैं। इस प्रकार वर्ष-भर में— ॥१९॥
सात सौ बीस आहुतियाँ हुईं। इस प्रकार वर्ष-प्रतिवर्ष यह अग्निहोत्र बड़ी स्तुति द्वारा
किया जाता है। और जो अग्निहोत्र (उसके) रहस्य को समझकर करता है उसको बड़ी स्तुति
की प्राप्ति हो जाती है ॥२०॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ४
देवों ने अपने सब पशुओं को, चाहे गाँव के, चाहे जंगली, अग्नि को सौंप दिया। या तो
वे विजय के लिए जा रहे थे या स्वतन्त्र विचरना चाहते थे, या यह समझकर कि अग्नि रक्षक है,
इनकी रक्षा करेगा ॥१॥
अग्नि को उन पर लोभ आ गया। वह उनको लेकर रात्रि में प्रविष्ट हो गया। देवों ने
कहा, चलो लौट चलें और जहाँ अग्नि छिपा था वहाँ पहुँच गये। उन्होंने जान लिया कि अग्नि
यहाँ छिपा है, रात में छिपा है। जब सायंकाल को रात्रि वापस आई तो उन्होंने कहा, 'हमारे
पशु लौटा, हमारे पशु लौटा।' अग्नि ने उनके पशु लौटा दिये ॥२॥
इसलिए दोनों अग्नियों का नम्रता से सेवन करे। दोनों अग्नियां दाता हैं। उन्हीं से
माँगता है। शाम को सेवन करे। शाम ही को देवताओं ने सेवन किया था। जो ज्ञानपूर्वक दोनों
अग्नियों का सेवन करता है उसको वे पशु देते हैं ॥३॥
अग्नियों का सेवन करने के विरुद्ध यह युक्ति दी जाती है। पहले देव और मनुष्य दोनों
साथ रहते थे। जो चीज मनुष्यों के पास नहीं होती थी उसको वे देवों से माँगते थे, 'हमारे पास
यह वस्तु नहीं है। इसे हमको दीजिए।' इस माँगने के द्वेष के कारण देव छिप गये। इसलिए देवों
के पास नहीं जाना चाहिए कि कहीं वे हिंसा या द्वेष न करें ॥४॥
सेवन करने के पक्ष में यह युक्ति दी जाती है—यज्ञ देवों का है और आशीर्वाद यजमान