Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished699 pages

अध्याय-१, ब्राह्मण-३

Page 30Permalink

१२ शतपथ ब्राह्मण
मित्यथ॑ प्रै॒त्यूर्ध्व॒न्तरि॑क्षमन्वेमी॑ति सो॒ऽसावे॒व बन्धु॑: ॥ २२ ॥ स यस्य॑ गार्हप॒त्ये ह॒-
वीꣳ॑षि॒ श्रप॑यन्ति । गा॒र्ह॒प॒त्ये तस्य॒ पात्रा॑णि सꣳसा॒दय॑न्ति जघ॒नेनो॒ तर्हि॑ गा॒र्ह॒प॒त्यꣳ॑
सा॒दये॒द्यस्या॑हव॒नीये॑ ह॒वीꣳ॑षि॒ श्रप॑यन्त्याहव॒नीये॑ तस्य॒ पात्रा॑णि सꣳसा॒दय॑न्ति जघ॒-
नेनो॒ तर्ह्या॑हव॒नीयꣳ॑ सादयेत्पृथि॒व्यास्त्वा॑ ना॒भौ सा॒दया॒मीति॒ मध्यं॑ वै ना॒भिर्मध्य॑-
म॒भयं॒ तस्मा॑दाह पृथि॒व्यास्त्वा॑ ना॒भौ सा॒दया॒मीत्य॑दि॒त्या ऽ उ॑प॒स्थ ऽ इ॒त्युप॒स्थ ऽ इ॑वे-
न॒द॒माभु॑रि॒ति वा॒ऽआहु॑र्य॒त्सुगु॑प्तं गो॒पाय॑न्ति॒ तस्मा॑दाहादि॒त्या ऽ उ॑प॒स्थ ऽ इ॒त्यग्ने॑ ह॒व्यꣳ
र॒क्ष्वेति॒ तद॒ग्नये॑ चै॒वैत॒द्धवि॑: परि॒ददा॑ति गु॒प्त्या ऽ अ॒ग्नये॑ च पृथि॒व्यै तस्मा॑दाहा॒ग्ने ह॒व्यꣳ
र॒क्ष्वेति॑ ॥ २३ ॥ ब्रा॒ह्म॒णम् ॥ २ ॥
प॒वित्रे॑ करोति । प॒वित्रे॑ स्थो वै॒ष्ण॒व्यावि॑ति य॒ज्ञो वै वि॑ष्णुर्य॒ज्ञिये॑ स्थ इ॒त्येवै॒-
तदा॑ह ॥ १ ॥ ते वै द्वे भ॑वतः । अ॒यं वै प॒वित्रं॒ योऽयं॒ पव॑ते॒ सोऽयमेक॑ ऽ इ॒वैव॒
पव॑ते॒ सोऽयं॒ पुरु॑षे॒ऽन्तः प्रवि॑ष्टः प्राङ् प्रत्यङ् तावि॒मौ प्रा॑णोदा॒नौ तदे॑त॒स्यैवा॒नु
मा॒त्रां तस्मा॒द्द्वे भ॑वतः ॥ २ ॥ अथो॒ऽअपि॒ त्रीणि॑ स्युः । व्या॒नो हि तृती॑यो द्वे त्वे॒व
भ॑वतस्ता॒भ्यामे॒ताः प्रोक्ष॑णीरु॒त्पूय॒ ताभि॑: प्रोक्ष॑ति॒ तद्य॑दे॒ताभ्या॒मुत्पु॒नाति॑ ॥ ३ ॥ वृ॒-
त्रो ह॒ वाऽइ॒दꣳ सर्वं॑ वृ॒त्वा शिश्ये॑ । यदि॒दम॒न्तरे॑ण द्यावापृथि॒वी स यदि॒दꣳ सर्वं॑
वृ॒त्वा शिश्ये॒ तस्मा॑द्वृ॒त्रो नाम॑ ॥ ४ ॥ तमिन्द्रो॑ जघान । स ह॒तः पूति॑: सर्व॑त ए॒वा-
पो ऽभिप्र॑ सुस्राव॒ सर्व॑तऽइव॒ ह्ययꣳ॑ समु॒द्रस्तस्मा॒द्धैका॒ आपो॑ बीभत्साञ्चक्रिरे॒ ता
उ॒पर्य्य॑प॒र्यु॑त्पुपु॒वि॑रे ऽत इ॒मे दर्भा॑स्ता॒ ह्येता॒ अना॑पूयिता॒ आपो॒ऽस्ति वा॒ऽइत॑-
रासु॑ सꣳसृ॒ष्टमि॑व॒ यदे॑ना वृ॒त्रः पूति॑र॒भिप्रास्र॑व॒त्तद्देवा॑समे॒ताभ्यां॑ प॒वित्रा॑भ्यामप॒हृत्या॑थ
मे॒ध्याभि॑र॒द्भिः प्रोक्ष॑न्ति॒ तस्मा॑दाह॒ऽएताभ्या॑मुत्पु॒नाति॑ ॥ ५ ॥ स उत्पु॑नाति । स॒-
वि॒तुर्व॑: प्रस॒व ऽउ॑त्पुनाम्य॒च्छिद्रे॑ण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒रिति॑ सवि॒ता वै दे॒वा-
नां प्र॑सवि॒ता तत्स॑वितृप्रसूत॒ एवै॑तदु॑त्पुनात्य॒च्छिद्रे॑ण प॒वित्रे॒णेति॑ यो वा॒ऽअयं॑ प॒-
वत॒ ऽएषो॒ऽच्छि॑द्रं प॒वित्र॑मे॒तेनै॒तदा॑ह॒ सूर्य॑स्य र॒श्मिभि॒रित्ये॑ति वा॒ऽउत्प॑वितारो

Page 31Permalink

का० १, अ० १, ब्रा० ३, क० १-६ शतपथब्राह्मण / १३
“दरवाजोंवाले पृथिवी पर सुदृढ़ होवें।” अब वह (गार्हपत्य के उत्तर की ओर) चलता है यह
मंत्रांश (यजु० १।१०) पढ़कर--“मैं अन्तरिक्ष में चलता हूँ।” इसका वही अर्थ है ॥२२॥
जिस यजमान की गार्हपत्य अग्नि में अध्वर्यु आदि हवि पकाते हैं, उसी गार्हपत्य में पात्र
भी रखते हैं। वे पात्र गार्हपत्य के पिछले भाग में रखने चाहिएं। परन्तु जिसकी आहवनीय में
हवि पकाते हैं उस आहवनीय में पात्र रखते हैं। इन पात्रों को आहवनीय के पीछे रखना चाहिए।
यजु० १।११ के इस अंश को जपकर ऐसा कहे, “मैं तुझको पृथिवी की नाभि में रखता हूँ।” नाभि
का अर्थ है—मध्य में भय नहीं होता। इसलिए कहता है कि “मैं तुझे पृथ्वी की नाभि में रखता
हूँ।”—“अदिति की गोद में।” जब किसी चीज़ को सुरक्षित रखते हैं तो कहावत है कि 'गोद में
रख ली है'। इसलिए कहा “अदिति की गोद में।” 'अग्नि ! हवि की रक्षा कर', इस प्रकार वह
हविः को पृथिवी और अग्नि के संरक्षण में देता है। इसलिए कहता है, “हे अग्नि, तू इस हवि की
रक्षा कर” ॥२३॥
अध्याय १—ब्राह्मण ३
अब दो पवित्रे बनाता है यजु० १।१२ का यह अंश पढ़कर-“तुम पवित्रे हो विष्णु के।”
यज्ञ का नाम विष्णु है। इसलिए कहता है कि तुम यज्ञ के हो ॥१॥
वे दो होते हैं। यह जो वायु बहता है वह पवित्र है। वह एक ही होता है। परन्तु जब
वह पुरुष के भीतर जाता है तो उसके दो भाग हो जाते हैं—एक अगला और दूसरा पिछला। ये
हैं प्राण और उदान। यह पवित्रीकरण भी उसी भाँति का है। इसलिए पवित्रे दो होते हैं ॥२॥
पवित्रे तीन भी हो सकते हैं, क्योंकि व्यान भी तो है। परन्तु दो ही होने चाहिएँ। इन
दोनों पवित्रों से प्रोक्षणी जल को छिड़कता है। इसका कारण यह है—॥३॥
वृत्र इस सब पृथिवी को घेरकर सो रहा। द्यौ और पृथिवी के बीच में जो कुछ है उस
सब को ढककर सो रहा। इसलिए उसका नाम वृत्र पड़ा ॥४॥
उस वृत्र को इन्द्र ने मारा। वह मरकर बदबू करता हुआ चारों ओर जलों की ओर बह
निकला। समुद्र तो चारों ओर ही हैं। इससे कुछ जल भयभीत हुए और ऊपर-ऊपर बहे। वहीं से
ये दर्भ उत्पन्न हुए (जिनके पवित्रे बनते हैं)। ये उस जल के भाग हैं जो सड़ा नहीं था। परन्तु
दूसरे जलों में वह बदबूदार भाग मिल गया, क्योंकि वृत्र उनमें बहकर जा मिला। इन पवित्रों
से वह उस भाग को शुद्ध करता है। इसलिए पवित्र जल से छिड़कता है। इसलिए उससे शुद्ध
करता है ॥५॥
वह इस मन्त्रांश (यजु० १।१२) को पढ़कर पवित्र करता है—“सविता की प्रेरणा से,
छिद्ररहित पवित्रे से, सूर्य की किरणों से।” सविता देवों का प्रेरक है। 'छिद्ररहित पवित्रे से'