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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished699 pages

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कां० २, अ० ३, ब्रा० ३, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २४३
अधिक इसलिए डालता है कि मनुष्य देवों से अधिक हैं। स्रुक् में सबसे अधिक इसलिए छोड़ता
है कि पशु मनुष्यों से भी अधिक हैं। जो कोई समझकर अग्निहोत्र करता है उसके आश्रित मनुष्यों
(भार्य) की अपेक्षा पशु अधिक होते हैं। जिसके भार्य (आश्रित मनुष्य) कम और पशु अधिक
हों, उसी को समृद्ध पुरुष कहते हैं ॥१८॥
अध्याय ३—ब्राह्मण ३
जब प्रजापति ने प्रजा उत्पन्न की और अग्नि उत्पन्न की तो यह उत्पन्न होते ही सबको
जलाने लगी, और सबने उससे बचना चाहा, और जो प्रजा थी उसने उसको बुझाना चाहा। यह
सहन न करके वह पुरुष के पास आई ॥१॥
उसने कहा—"मैं यह सहन नहीं कर सकती। तुझमें घुस जाऊँ। तू मुझे उत्पन्न करके
पालन कर। जैसा तू इस लोक में मुझे जन्म देकर पालन करेगा वैसा ही परलोक में तुझे जन्म
देकर पालन करूँगी।" उसने कहा-"अच्छा।" उसने उसे उत्पन्न किया और पालन किया ॥२॥
जब वह दो अग्नियों का आधान करता है तो उनको उत्पन्न करता है और उत्पन्न करके
उनका पालन करता है। और जैसा वह इसका इस लोक में उत्पन्न करके पालन करता है, वैसा
ही वह (अग्नि) उस लोक में उसको उत्पन्न करके उसका पालन करता है।
इस अग्नि को अधूरा न हटावे। यदि इसको अधूरा हटा देगा तो जिस प्रकार अग्नि को
इस लोक में ह्रास करेगा, उसी प्रकार अग्नि उस लोक में उसका भी ह्रास कर देगा। इसलिए
उसको अग्नि को अधूरा न हटाना चाहिए ॥४॥
और जब वह मरता है और उसे अग्नि पर रखते हैं तो वह अग्नि से ही उत्पन्न होता
है। जो (अग्नि) अब तक उसका पुत्र था, वह अब उसका पिता हो जाता है ॥५॥
इसीलिए ऋषि ने कहा था-"शतमिन्नु शरदोऽअन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः" (यजु० २५।२२; ऋ० १।८६।६)
—"हे देवताओ, सौ वर्ष हमारे सामने हैं जब तुम हमारे शरीरों के बुढ़ापे को करते हो। जब पुत्र
पिता हो जाते हैं आप हमारी पूरी होनेवाली आयु को बीच में मत काटो।" क्योंकि जो (अग्नि)
अब तक पुत्र था अब पिता हो गया। यही कारण है कि अग्न्याधान करना चाहिए ॥६॥
यह जो सूर्य है वह मृत्यु है, इसलिए उससे इस ओर की प्रजा मर जाती है। और जो
उससे परली ओर हैं अर्थात् देव, वे अमर रहते हैं। ये सब प्रजाएँ किरणों द्वारा प्राणों में स्थित
हैं। इसीलिए किरणें प्राणों तक जाती हैं ॥७॥
यह सूर्य जिसको चाहता है उसके प्राण लेकर उदय होता है और वह मर जाता है। जो