Skip to content
SarvaKosh
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 257 of 699

Read in context
Page 257

का० २, अ० ३, ब्रा० २, कं० १-८ शतपथब्राह्मण / २३६
स्रुवे में रह जाता है वह अग्निहोत्र का उच्छिष्ट है। जो थाली में रह जाता है वह वैसा ही है
जैसा कि (गाड़ी के) घेरे में से (चावल निकालना)। यदि कोई इसे पिये तो ब्राह्मण के सिवाय
अन्य न पीवे। यह अग्नि में रखा हुआ (पवित्र) है, इसलिए अब्राह्मण न पीवे ॥३६॥
अध्याय ३—ब्राह्मण २
जो कोई (यजमान) होता है उसमें ये देवते होते हैं—इन्द्र, राजा, यम, नड-नैषिध (या
नैषध), अनश्नत् सांगमन, असन्पांसव ॥१॥
यह जो आहवनीय है वह इन्द्र है, जो गार्हपत्य है वह राजा यम है। यह जो अन्वाहार्य-
पचन (दक्षिणाग्नि) है वह नड-नैषिध है। चूँकि प्रतिदिन दक्षिण से (अग्नि) लाते हैं, इसलिए
कहते हैं कि नड-नैषिध प्रतिदिन राजा यम को दक्षिण से लाता है ॥२॥
और यह जो सभा में अग्नि है वह अनश्नत् सांगमन है। इसको अनश्नत् इसलिए कहते
हैं कि लोग बिना खाये उसके पास जाते हैं। और उसमें से राख निकालकर जहाँ फेंकते हैं वह
असन्पांसव है। जो इस बात को जानता है वह सब लोकों को जीतता है, सब लोकों में विचरता
है और समझता है कि ये देवतागण मुझमें विद्यमान हैं ॥३॥
अब उन (अग्नियों) के उपस्थान (उपासना) के विषय में। जो सायं और प्रातः को
आहवनीय के पास खड़ा होना और बैठना है यही उसकी उपासना है, और जब लौटकर गार्हपत्य
के पास बैठना या लेटना है वह उसकी उपासना है, और जब (आहवनीय से) निकलकर
अन्वाहार्य-पचन का स्मरण करना तथा मन में उसके पास ठहरना है वह उसकी उपासना है ॥४।
और प्रातःकाल बिना खाये मुहूर्त्त-भर सभा में बैठना और यथेच्छा परिक्रमा देना है वही
उसकी उपासना है। और जहाँ उसमें से लेकर भस्म डाली जाती है वहाँ ठहरना है, वही उसकी
उपासना है। इस प्रकार उन देवताओं की उपासना हो गई ॥५॥
गार्हपत्य का देवता यजमान है, और अन्वाहार्य-पचन का देवता उसका शत्रु है, इसलिए
(दक्षिणाग्नि को) रोज-रोज (गार्हपत्य से) नहीं ले जाना चाहिए। उसके कोई शत्रु नहीं होते ।
जो इस बात को जानता है उसके यहाँ इस अग्नि को रोज-रोज नहीं निकालते। यह अन्वाहार्य-
पचन है ॥६॥
उपवास के दिन ही उसको लाना चाहिए जब इसमें यज्ञ करनेवाले हों, और यह
(यजमान के) अमोघ (निश्चित सफलता) के लिए लाई जाती है ॥७॥
या इसको नये घर में ले जायें। उसमें पकावें और ब्राह्मणों को खिलाएँ। यदि पकाने के
लिए और कुछ न मिले तो गाय के दूध को ही अग्नि पर रख दें और ब्राह्मणों को पिला दें। जिस
किसी यह जाननेवाले के लिए वे ऐसा करते हैं उसके शत्रु पापी (अवनति-शील) हो जाते हैं।