शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextका० २, अ० ३, ब्रा० १, कं० ३०-३६ शतपथब्राह्मण / २३७
और जब सूर्य निकलता है तो सूर्य ज्योति होता है। जो सत्यता के साथ आहुति देता है वह देवों
को प्राप्त होता है ॥३०॥
ब्रह्मवर्चस् की कामना के लिए तक्षा ने अरुण के प्रति यही कहा था—'अग्निर्वर्चो
ज्योतिर्वर्चः सूर्योवर्चो ज्योतिर्वर्चः' (यजु० ३।६) । जो पुरुष समझकर अग्निहोत्र करता है वह
ब्रह्मवर्चसी हो जाता है ॥३१॥
यह मन्त्र सन्तानोत्पत्ति का रूप है। "अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा" कहकर वह
ज्योतिरूपी वीर्य को देवता के द्वारा दोनों ओर से घेर देता है। दोनों ओर से घिरकर ही तो
वीर्य से उत्पत्ति होता है। इस प्रकार दोनों ओर से घेरकर ही वह इससे सन्तानोत्पत्ति कराता
है ॥३२॥
प्रातःकाल की आहुति का मन्त्र—"सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा" (यजु० ३।६) ।
कहकर वह ज्योतिरूपी वीर्य को देवता के द्वारा दोनों ओर से घेर देता है, क्योंकि दोनों ओर से
घिरकर ही वीर्य से उत्पत्ति होती है। इस प्रकार दोनों ओर से इसे घेरकर ही वह इससे
सन्तानोत्पत्ति कराता है ॥३३॥
जीवल चैलकि का कथन है कि आरुणि गर्भ ही धारण करता है, सन्तानोत्पत्ति नहीं
कराता। इसलिए उसी आहुति से सायंकाल को होत्र करे ॥३४॥
प्रातःकाल "ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा" (यजु० ३।६), कहकर वह देवता के
द्वारा ज्योति रूपी वीर्य को बाहर कर देता है। बाहर आकर ही वीर्य उत्पत्ति करता है, इसलिए
इसके द्वारा उत्पत्ति करता है ॥३५॥
इसके विषय में कुछ लोग कहते हैं कि वह सायंकाल को अग्नि में सूर्य के लिए आहुति
देता है और प्रातःकाल सूर्य में अग्नि के लिए। यह उनके लिए सच है जो 'उदितहोमि' अर्थात्
सूर्योदय के पश्चात् होम करनेवाले हैं। क्योंकि जब सूर्य अस्त होता है तब अग्नि ज्योति होती है
और जब सूर्य उदय होता है तो सूर्य ज्योति होता है। इसमें कोई दोष नहीं है। दोष इसमें है कि
जो अग्निहोत्र के देवता हैं उनको निश्चय करके न कहा जाय (अर्थात् सूर्य और अग्नि को अलग-
अलग) । वह कहता है 'अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा' न कि 'अग्नये स्वाहा।' इसी प्रकार
प्रातःकाल के समय 'सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा' न कि 'सूर्याय स्वाहा' ॥३६॥
(सायंकाल को) इससे भी आहुति दे—'सजूर्देवेन सवित्रा' (यजु० ३।१०)। इस प्रकार
सवितृ-युक्त हो जाता है, प्रेरणा के लिए। फिर कहता है 'सजूरात्र्येन्द्रवत्या', इससे वह इसका
रात्रि से जोड़ मिलाता है और इन्द्र से युक्त करता है। इन्द्र ही यज्ञ का देवता है। 'जुषाणो
अग्निर्वेतु स्वाहा' (यजु० ३।१०) कहकर वह प्रत्यक्ष रूप से अग्नि के लिए आहुति देता है ॥३७॥
अब प्रातःकाल को 'सजूर्देवेन सवित्रा' कहकर प्रेरणा के लिए सवितृ-युक्त करता है। अब
कहता है—'सजूरुषसेन्द्रवत्या', इस प्रकार वह इसका दिन या उषा से जोड़ मिलाता है और इसे
इन्द्र-युक्त करता है। इन्द्र यज्ञ का देवता है। 'जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा' (यजु० ३।१०) कह-
कर वह प्रत्यक्ष रूप से सूर्य के लिए आहुति देता है। इसलिए इसी प्रकार आहुति दे ॥३८॥
उन्होंने कहा—'हमारे लिए कौन आहुति देगा?' 'ब्राह्मण ही।' 'हे ब्राह्मण, हमारे
लिए आहुति दे।' 'तब मेरा भाग क्या होगा?' 'अग्निहोत्र का उच्छिष्ट (बचा हुआ)।' यह जो