शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० २, अ० ३, ब्रा० २, कं० ८-१८ शतपथब्राह्मण / २४१
इसलिए ऐसा ही करना चाहिए ॥८॥
जब अग्नि पहले ही जलाई जाती है और उसमें धुआँ ही निकलता है, तब यह अग्नि रुद्र
होती है। जैसे रुद्र इन प्रजाओं को कभी अश्रद्धा से, कभी कड़ेपन में, कभी मारकर बरतता है,
उसी प्रकार यदि कोई चाहे कि अन्न खाऊँ तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता
है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती है।
जब अग्नि अधिक प्रदीप्त हो जाती है तो वरुण हो जाती है। जैसे वरुण प्रजा को कभी
पकड़कर, कभी कड़ेपन से और कभी मारकर बरसता है, इसी प्रकार यदि कोई चाहे कि मैं अन्न
खाऊँ तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती
है ॥१०॥
जब अग्नि बहुत प्रज्वलित होती है और पुष्कल धुआँ चक्कर काटता हुआ ऊपर को
उठता है तो यह इन्द्र हो जाती है। जो कोई चाहे कि इन्द्र के समान श्री और यश वाला हो जाऊँ
तो वह यह आहुति दे। जो कोई समझकर आहुति देता है उसको अन्न की प्राप्ति हो जाती
है ॥११॥
जब यह अग्नि घटती हुई शान्त-सी तिरछी जलती है तो मित्र हो जाती है। यदि कोई
चाहे कि मित्रता से अन्न खाऊँ, जैसे कहा करते हैं कि अमुक ब्राह्मण मित्र है, वह किसी की
हानि नहीं करता, तो वह आहुति दे। जो समझकर आहुति देता है वह अन्न को प्राप्त कर लेता
है ॥१२॥
जब इस (अग्नि) के अङ्गारे जलते हैं तब यह ब्रह्म हो जाती है। जो चाहे कि मैं ब्रह्म-
वर्चसी हो जाऊँ वह यह आहुति दे। जो समझकर आहुति देता है उसे अन्न की प्राप्ति हो जाती
है ॥१३॥
उसको साल-भर तक इनमें से एक का सेवन करना चाहिए, चाहे स्वयं आहुति दे या
किसी से दिलावे। और जो कभी किसी के और कभी किसी के लिए आहुति देता है तो वैसा ही
व्यर्थ है जैसे पानी के लिए कभी यहाँ खोदे, कभी वहाँ, या अन्न के लिए और बीच में छोड़ दे।
और यदि लगातार आहुति देता जाय तो ऐसा है जैसे जल या अन्न के लिए खोदता-खोदता शीघ्र
प्राप्त कर ले ॥१४॥
ये जो आहुतियां हैं वे अन्न के (खोदने के) लिए अभ्रि या खुरपा हैं। जो समझकर
अग्निहोत्र करता है वह अन्न की प्राप्ति करता है।
जो पूर्वाहुति है वह देव है, जो पिछली है वह मनुष्य और जो स्रुक् में बच रहे वह
पशु ॥१६॥
पूर्वाहुति में थोड़ा ही डालता है, पिछली में अधिक और उससे भी अधिक स्रुक् में बचा
रखता है ॥१७॥
पूर्वाहुति में थोड़ा-सा इसलिए डालता है कि देव आदमियों से कम हैं। दूसरी आहुति में