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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

284 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे

यहाँ पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

284 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे
चूर्णरूप अञ्जन की मात्रा
वैरेचनिकचूर्णं तु द्विशलाकं विधीयते।
मृदौ तु त्रिशलाकं स्याच्चतस्रः स्नेहिकेऽञ्जने।।70।।
विरेचन (लेखन) चूर्णाञ्जन की मात्रा दो सलाई भर, मृदु
(रोपण) की तीन सलाई तथा स्नेहन की चार सलाई भर
मात्रा मानी जाता है।
वक्तव्य—सुरमे की शीशी में सलाई को डालने पर उसके
एक अंगुल अग्रभाग पर जितना सुरमा लग जाता है, वह मात्रा
एक शलाका कही जाता है।
शलाका-निर्माण-विधि
मुखयोः कुण्ठिता श्लक्ष्णा शलाकाष्टाङ्गुलोन्मिता।
अश्मजा धातुजा वा स्यात् कलायपरिमण्डला।।71।।
ताम्रलोहाश्मसञ्जाता शलाका लेखने मता।
सुवर्णरजतोट्भूता शलाका स्नेहने मता।।72।।
अङ्गुलीव मृदुत्वेन कथिता रोपणे बुधैः।
अञ्जन (सुरमा) लगाने की 'शलाका' (सलाई) आठ
अंगुल लम्बी हो, दोनों ओर से कुण्ठित (गोलाईदार हो),
श्लक्ष्ण (खुरदरी न हो), उसके दोनों मुख मटर के समान
मोटे हों तथा वह पत्थर तथा स्वर्ण आदि धातु की बनानी
चाहिये। लेखन-अञ्जन के लिए ताँबा, लोहा तथा पत्थर की,
स्नेहन अञ्जन के लिए सोना तथा चाँदी को शलाका होनी
चाहिये और रोपण अञ्जन में मृदु होने के कारण अंगुली को
ही उत्तम माना जाता है।
वक्तव्य—यषद (जस्ता) का शलाका उत्तम होती है।
आचार्य शार्ङ्गधर ने इसी प्रकरण में आगे शलाका बनाने की
विधि भी कही है।
अञ्जन प्रयोग विधि एवं काल
सायं प्रातर्वाञ्जनं स्यात् तत्सदा नैव कारयेत्।।73।।
नातिशीतोष्णवाताभ्रवेलायां सम्प्रशस्यते।
कृष्णभागादधः कुर्यादपाङ्गं यावदञ्जनम्।।74।।
अञ्जन सायंकाल अथवा प्रातःकाल लगाना चाहिये। इसके
अतिरिक्त समयों में अञ्जन लगाना उचित नहीं है। अत्यन्त
शतिकाल में, अत्यन्त उष्णकाल में, प्रवात (जब अत्यन्त
हवा चलती हो) में तथा अभ्रकाल (जब आकाश में बादल
छाये हों) में अञ्जन नहीं लगाना चाहिये। कृष्ण-भाग के
नीचे तथा अपाङ्ग (नेत्र के बाहरी कोण) तक अञ्जन लगाना
चाहिये।
वक्तव्य—अञ्जन लगाने का समुचित विधि के लिए
देखें-सु० उ० अ० 18 श्लो० 64-65। इन श्लोकों का तात्पर्य
यह है, कि कोया से लेकर अपांग (आँख के कोने) तक
अञ्जन लगी हुई। शलाका को आँख के भीतर डालकर घुमा
लेना चाहिये।
चन्द्रोदयावर्ति
शङ्खनाभिर्विभीतस्य मज्जा पथ्या मनःशिला।
पिप्पली मरिचं कुष्ठं वचा चेति समांशकम्।।75।।
छागीक्षीरेण सम्पेष्य वर्तिं कृत्वा यवोन्मिताम्।
हरेणुमात्रां सङ्घृष्य जलैः कुर्यात्तथाञ्जनम्।।76।।
तिमिरं मांसवृद्धिं च काचं पटलमर्बुदम्।
रात्र्यन्ध्यं वार्षिकं पुष्पं वर्तिश्चन्द्रोदया जयेत्।।77।।
शंखनाभि, बहेड़ा की मींगी, बड़ी हरड़, मैनसिल, पीपल,
मरिच, कूठ तथा वच इन सब द्रव्यों को समान भाग लेकर
अत्यन्त सूक्ष्म चूर्ण बनाये और फिर उसको बकरी के दूध में
भली-भाँति पीसकर जौ जैसप लम्बी-लम्बी बत्तियाँ बना लें
और हरेणु परिमित औषधि जल के साथ घिसकर अञ्जन
करें। यह तिमिर (धुन्ध), मांसवृद्धि (अर्म आदि), काच
(मोतिया), पटलगत दोष, अर्बुद (नेत्रार्बुद), रतौंधी तथा
वर्ष भर के पुष्प (फूलों) को जीतता है।
वक्तव्य—उक्त योग में विचारणीय विषय यह है, कि जौ
भर की तो बत्ती बनाने का विधान है और हरेणु भर औषध
लगाने का ? हरेणु नाम मटर का है तदनुसार सुश्रुत के भाष्यकार
डल्हणाचार्य तथा शार्ङ्गधर के टीकाकार श्रीआढमल्ल ने उसका
अर्थ भी किया है। हमारा विचार है कि 'हरेणु' के पर्यायों में
बड़ा चना, मटर, पित्तपापड़ा तथा हरेणुका भी देखे जाते हैं।
अतः यथोचित निर्णय लेकर मात्रा का विधान करें।
करञ्जवर्ति
पलाशपुष्पस्वरसैर्बहुशः परिभाविता।
करञ्जबीजवर्तिस्तु दृष्टेः पुष्पं विनाशयेत्।।78।।
करञ्ज के बीजों का कपड़छन चूर्ण बनाकर उसको पलाश
के फूलों के स्वरस का अनेक (सात) भावनायें दें, फिर
इसकी वर्ति बना लें। यह भी फूली को नष्ट करती है।
समुद्रफेनादिवर्ति
समुद्रफेनसिन्धूत्थशङ्खदक्षाण्डवल्कलैः ।
शिग्रुबीजयुतैर्वर्तिः शुक्रादींश्छत्रवल्लिखेत्।।79।।
समुद्रफेन, सेंधा नमक, शंख, मुरगी के अण्डों के छिलके

[त्रयोदशोऽध्यायः ] नेत्रप्रसादनविधिः 285

[बायाँ स्तम्भ]

और सहजन के बीज-इन सभी द्रव्यों को पीसकर (सहजन
के रस से) वर्ति बनायें। यह भी शुक्रादि नेत्ररोगों को शस्त्र के
समान काट देती है।

दन्तवर्ति
दन्तैर्दन्तिवराहोष्ट्रगोहयाजखुरोद्भवैः ।
शङ्खमुक्ताम्भोधिफेनयुतैः सर्वैर्विचूर्णितैः ।। 80 ।।
दन्तवर्तिः कृता श्लक्ष्णा शुक्राणां नाशिनी परा।
हाथी, सूअर, ऊँट, गाय, घोड़ा, बकरी, तथा गधा इनके
दाँत, शंख, मोती तथा समुद्री झाग इन सब द्रव्यों को समभाग
लेकर और अत्यन्त बारीक पीसकर (किसी भी उपयुक्त द्रव
से) वर्ति बना लें। यह भी शुक्र नामक नेत्ररोगों को नष्ट
करती है।

नीलोत्पलवर्ति
नीलोत्पलं शिग्रुबीजं नागकेशरकं तथा ।। 81 ।।
एतत्कल्कैः कृता वर्तिरतितन्द्रां निवारयेत्।
नीलकमल, सहजन के बीज तथा नागकेसर इन सबको
पीसकर वर्ति बनायें। यह अतिनिन्द्रा को रोकती है।

कुसुमिकावर्ति
तिलपुष्पाण्यशीतिः स्युः षष्टिः पिप्पलतण्डुलाः ।। 82 ।।
जातीकुसुमपञ्चाशन्मरिचानि च षोडश।
सूक्ष्मं पिष्ट्वा जले वर्तिः कृता कुसुमिकाभिधा ।। 83 ।।
तिमिरार्जुनशुक्राणां नाशिनी मांसवृद्धिहृत्।
( एतस्याश्चाञ्जने मात्रा प्रोक्ता सार्धहरेणुका ।। 84 ।।)
तिल के फूल 80, पीपल के चावल (जो उसे कूटने पर
मिलते हैं) 60, चमेली के फूल 50 और कालीमरिच 16
दाना इन सबको बारीक पीसकर जल से बत्ती बनाये। इसका
नाम 'कुसुमिकावर्ति' है। यह तिमिर, अर्जुन तथा शुक्र नामक
नेत्र रोगों का नाश करती है और मांसवृद्धि को हरती है।
इसकी मात्रा अञ्जन करने में डेढ़ हरेणु भर का कही गयी है।

रसाञ्जनवर्ति
रसाञ्जनं हरिद्रे द्वे मालतीनिम्बपल्लवाः।
गोशकृद्रससंयुक्ता वर्तिर्नक्तान्ध्यनाशिनी ।। 85 ।।
रसवत, हल्दी, दारुहल्दी, चमेली और नीम के पत्ते-इन
सबको अत्यन्त सूक्ष्म पीसकर गाय के गोबर के रस से वर्ति
बनाये। यह रतौंधी को नष्ट करती है।

धात्र्यादिवर्ति
धात्र्यक्षपथ्याबीजानि एकद्वित्रिगुणानि च।


[दायाँ स्तम्भ]

पिष्ट्वा वर्तिं जलैः कुर्यादञ्जनं द्विहरेणुकम् ।। 86 ।।
नेत्रस्रावं हरत्याशु वातरक्तरुजं तथा।
आँवला के बीज एक भाग, बहेड़ा के बीज दो भाग और
हरड़ के बीजों की गिरी तीन भाग लेकर और भली-भाँति
पीसकर जल से वर्ति बना लें। इसका दो हरेणु भर अञ्जन
करें। यह नेत्रस्राव (उलका) तथा वातरक्त की पीड़ा को शीघ्र
ही हरती है।

वक्तव्य-उक्त सभी उदाहरण वर्ति स्वरूप गुटिकाञ्जन
के हैं। अब इसके आगे रस रूप में प्रयुक्त होने वाले अञ्जनों
के उदाहरण कहे जायेंगे।

तुत्थादि-रसक्रिया
तुत्थमाक्षिकसिन्धूत्थं सिताशङ्खमनःशिला ।। 87 ।।
गैरिकोदधिफेनं च मरिचं चेति चूर्णयेत्।
संयोज्य मधुना कुर्यादञ्जनार्थं रसक्रियाम् ।। 88 ।।
वर्त्मरोगार्मतमिरकाचशुक्रहरां पराम्।
शुद्ध तूतिया, सुवर्णमाक्षिक, सेंधा नमक, खाँड, शंख,
मैनसिल, गेरू, समुद्रफेन तथा मरिच इन सबको अत्यन्त
सूक्ष्म पीसकर और मधु के साथ मिलाकर रस रूप अञ्जन
बना लें। यह वर्त्मरोग (रोहा आदि), अर्म, तिमिर, काच
(मोतिया) तथा शुक्र नामक नेत्ररोग का विनाश करने के
लिए उत्तम योग है।

वटक्षीर-रसाञ्जन
वटक्षीरेण संयुक्तो मुख्यः कर्पूरजः कणः ।। 89 ।।
क्षिप्रमञ्जनतो हन्ति कुसुमं तु द्विमासिकम्।
शुद्ध कपूर को बरगद के दूध में पीसकर अञ्जन करने से
दो महीने का पुराना फूला भी शीघ्र नष्ट हो जाता है।

अतिनिद्रानाशक योग
क्षौद्राश्वलालासङ्घृष्टैर्मरिचैर्नेत्रमञ्जयेत् ।। 90 ।।
अतिनिद्रा शमं याति तमः सूर्योदयादिव।
कालीमरिच को मधु तथा घोड़े की लार में घिसकर नेत्र
में अञ्जन करें। इससे अतिनिद्रा उस प्रकार शान्त हो जाती है
जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर अन्धकार।

तन्द्रानाशक योग
जातीपुष्पं प्रवालं च मरिचं कटुकी वचा ।। 91 ।।
सैन्धवं बस्तमूत्रेण पिष्टं तन्द्राघ्नमञ्जनम्।
चमेली के फूल तथा पत्ते, मरिच, कुटकी, वच तथा

286 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे

सेंधा नमक इन सबको समभाग लेकर और बकरे के मूत्र में
पीसकर अञ्जन लगाने से तन्द्रा (उँघाई) नष्ट हो जाती है।

प्रबोधाञ्जन
शिरीषबीजगोमूत्रकृष्णामरिचसैन्धवैः ॥ ९२॥
अञ्जनं स्यात् प्रबोधाय सरसोनशिलावचैः।

सिरस (शिरशि) के बीज, पीपल, मरिच, सेंधा नमक,
लहसुन, मैनसिल तथा वच इन सबको समान भाग लेकर
गोमूत्र में पीसकर अञ्जन लगाने से मूर्च्छित रोगी संज्ञावान्
(चैतन्य) हो जाता है।

दार्व्यादि रसक्रिया
दार्वा पटोलं मधुकं सन्निम्बपद्मकोत्पलम् ॥ ९३॥
प्रपौण्डरीकं चैतानि पचेत् तोये चतुर्गुणे।
विपाच्य पादशेषं तु शृतं नीत्वा पुनः पचेत् ॥ ९४॥
शीते तस्मिन्मधु सितां दद्यात् पादांशिकां नरः।
रसक्रियैषा दाहाश्रुरक्तरागरुजो हरेत् ॥ ९५॥

दारुहल्दी, परवल की पत्ती, मुलेठी, नीम के पत्ते,
पद्मकाठ, लाल कमल तथा सफेद कमल इन सब द्रव्यों को
कूटकर चौगुने जल में पकायें, चतुर्थांश जल शेष रह जाने पर
छान लें। इस क्वाथ को फिर पकायें जब गाढ़ा हो जाये तो
उतार लें। शीतल हो जाने पर उसमें मधु तथा खाँड (क्वाथ्य
द्रव्यों के) चतुर्थांश मिला दें। यह रसक्रिया दाह, आँसू तथा
पीड़ा को हरती है।

रसाञ्जनादि रसक्रिया
रसाञ्जनं सर्जरसो जातीपुष्पं मनःशिला।
समुद्रफेनो लवणं गैरिकं मरिचानि च॥ ९६॥
एतत् समांशं मधुना पिष्ट्वा प्रक्लिन्नवर्त्मनि।
अञ्जनं क्लेदकण्डूघ्नं पक्ष्मणां च प्ररोहणम् ॥ ९७॥

रसवत, राल, चमेली के फूल, मैनसिल, समुद्रफेन, सेंधा
नमक, गेरू तथा मरिच इन सब द्रव्यों को समभाग लेकर
सूक्ष्म पीसकर तथा मधु मिलाकर अञ्जन करें। इससे प्रक्लिन्न-
वर्त्म रोग, क्लेद तथा कण्डू (खुजली) का नाश हो जाता है।
पक्ष्मों (आँख के बालों) का पुनः प्ररोहण (उत्पन्न) हो
जाता है।

गुडूची रसक्रिया
गुडूचीस्वरसः कर्षः क्षौद्रं स्यान्माषकोन्मितम्।
सैन्धवं क्षौद्रतुल्यं स्यात् सर्वमेकत्र मर्दयेत् ॥ ९८॥
अञ्जयेन्नयनं तेन पिल्लार्मतिमिरं जयेत्।
काचं कण्डूं लिङ्गनाशं शुक्लकृष्णगतान् गदान्॥ ९९॥

गिलोय का स्वरस एक कर्ष (1 तोला), मधु और सेंधा
नमक एक-एक माशा सबको एक साथ पीसकर उसको नेत्रों
में लगायें। यह पिल्ल, अर्म, तिमिर, काच, कण्डू, लिंगनाश
तथा शुक्ल भाग तथा कृष्ण भाग के नेत्र रोगों को जीतता है।

पुनर्नवा रसाञ्जन
दुग्धेन कण्डूं क्षौद्रेण नेत्रस्त्रावं च सर्पिषा।
पुष्पं तैलेन तिमिरं काञ्जिकेन निशान्धताम् ॥ १००॥
पुनर्नवा जयेदाशु भास्करस्तिमिरं यथा।

पुनर्नवा की जड़ दूध के साथ घिसकर आँख में लगाने
से कण्डू (खुजली) को मधु के साथ नेत्रस्राव को, घी के
साथ फूली को, तेल के साथ तिमिर को तथा काञ्जी के साथ
रतौंधी को उस प्रकार नष्ट करती है, जैसे सूर्य अन्धकार को।

बब्बूल रसक्रिया
बब्बूलदलनिःक्वाथो लेहीभूतस्तदञ्जनात् ॥ १०१॥
नेत्रस्त्रावं जयत्येष मधुयुक्तो न संशयः।

बब्बूल के पत्तों का क्वाथ करके उसे छानकर फिर
पकायें, जब गाढ़ा हो जायें तो उसमें मधु मिलाकर अञ्जन
करें। यह नेत्रस्राव को जीतता है। इसमें कुछ भी सन्देह नही
है।

हिज्जल-रसक्रिया
हिज्जलस्य फलं घृष्ट्वा पानीये नित्यमञ्जनम् ॥ १०२॥
चक्षुःस्त्रावोपशान्त्यर्थं कार्यमेतन्महौषधम्।

हिज्जल (समुद्रफल) के फल को जल में घिसकर
प्रतिदिन अञ्जन करें। यह नेत्रस्राव की शान्ति के लिए महौषध
है।

कतक-रसक्रिया
कतकस्य फलं घृष्ट्वा मधुना नेत्रमञ्जयेत् ॥ १०३॥
ईषत्कर्पूरसहितं स्मृतं नेत्रप्रसादनम्।

कतक (निर्मली) के फल को घिसकर मधु तथा कपूर
मिलाकर अञ्जन करें। इससे नेत्र का प्रसादन (प्रसन्नता)
होता है।

शिरोत्पात में रसक्रिया
सर्पिः क्षौद्रं चाञ्जनं स्याच्छिरोत्पातस्य शान्तये ॥ १०४॥

शिरोत्पात (आँख में जो लाल-लाल सिरायें दिखलायी
पड़ती हैं) की शान्ति के लिये घी तथा मधु का अञ्जन लगाना
चाहिये।

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त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 287


[स्तम्भ १]

कृष्णसर्प वसाञ्जन
कृष्णसर्पवसा शङ्खः कतकात्फलमञ्जनम्।
रसक्रियेयमचिरादन्धानां दर्शनप्रदा।। 105 ।।
शंखनाभि, निर्मली के बीज तथा अञ्जन (कालासुरमा)
को भली-भाँति पीसकर काल साँप की वसा में मिला दें। यह
अञ्जन अन्धों को भी शीघ्र ही दर्शन-शक्ति प्रदान करता है।
वक्तव्य—शंखनाभि तथा अञ्जन को अलग अलग पीस
लें और निर्मली के बीजों को कूटकर तथा जल डालकर
पृथक् से पीसना चाहिये। इसे पीसने में अधिक परिश्रम लगता
है। इन सबका साँप की चर्बी में मिला लें। सर्पवसा सपेरों से
मिल जाती है।

लेखनाञ्जन
दक्षाण्डत्वक्शिलाकाचशङ्खचन्दनसैन्धवैः ।
द्रव्यैरञ्जनयोगोऽयं पुष्पार्मादिविलेखनः ।। 106 ।।
मुरगी के अण्डों के छिलके, मैनसिल, काँच, शंख,
लाल चन्दन तथा सेंधा नमक इन द्रव्यों का अञ्जनयोग (अञ्जन
लगाने का निरन्तर अभ्यास), पुष्प (फूल) तथा अर्म आदि
को काट देता है।
वक्तव्य—काँच को तपाकर निर्मल जल में तब तक
बुझाना चाहिये जब तक उसकी चमक नष्ट न हो जाये। इसी
काँच के बारीक चूर्ण का अञ्जन में प्रयोग किया जाता है।

कणा-अञ्जन
कणा छागयकृन्मध्ये पक्त्वा नेत्रयुगेऽञ्जिता।
अचिराद्धन्ति नक्तान्ध्यं तद्वत् सक्षौद्रभूषणम् ।। 107 ।।
पिप्पली को बकरे के यकृत् में रखकर पुटपाक विधि से
पकायें और फिर घिसकर आँखों में लगायें। यह रतौंधी को
शीघ्र ही नष्ट कर देती है। इसी प्रकार मरिच को भी तैयार कर
और मधु के साथ मिलाकर लगाना चाहिये।
वक्तव्य—उक्त सभी अंजन रसरूप में मिलते हैं। इसके
आगे चूर्णरूप अंजन कहे जायेंगे।

चूर्णाञ्जन (लेखन)
शाणार्धं मरिचं द्वौ च पिप्पल्यर्णवफेनयोः।
शाणार्धं सैन्धवं शाणा नव सौवीरकाञ्जनात् ।। 108 ।।
पिष्टं सुसूक्ष्मं चित्रायां चूर्णाञ्जनमिदं शुभम्।
कण्डूकाचकफार्तानां मलानां च विशोधनम् ।। 109 ।।
मरिच चूर्ण दो माशा, पीपल तथा समुद्रफेन आठ-आठ
माशा, सेंधा नमक, दो माशा तथा सफेद सुरमा छत्तीस माशा


[स्तम्भ २]

इन द्रव्यों को चित्रा नक्षत्र में अत्यन्त सूक्ष्म पीसना चाहिये।
यह उत्तम चूर्ण अञ्जन है। यह खुजली, काच तथा कफजनित
विकारों तथा आँखों के मल (काचड़) को शुद्ध करता है।

चूर्णाञ्जन (रोपण)
शिलायां रसकं पिष्ट्वा सम्यगा प्लाव्‍य वारिणा।
गृह्णीयात् तज्जलं सर्वं यजेच्चूर्णमधोगतम् ।। 110 ।।
शुष्कं च तज्जलं सर्वं पर्पटीसन्निभं भवेत्।
विचूर्ण्य भावयेत् सम्यक् त्रिवेलं त्रिफलारसैः ।। 111 ।।
कर्पूरस्य रजस्तत्र दशमांशेन निक्षिपेत्।
अञ्जयेन्नयने तेन सर्वदोषहरं हि तत् ।। 112 ।।
सर्वरोगहरं चूर्णं चक्षुषोः सुखकारि च।
खपरिया को शिला (खरल)पर पीसकर और जल में
घोलकर रख दें, जब जल नितर जाये तो सावधानी से उसको
ले लें और नीचे बैठे हुये चूर्ण को फेंक दें, फिर उस जल को
धूप में सुखा लें। जल के सूख जाने पर पपड़ी जैसा पदार्थ
उपलब्ध होगा, इसको खरल में डालकर और पीसकर त्रिफला
के स्वरस की तीन भावना दें, अन्त में उक्त द्रव्य का दसवाँ
भाग कपूर मिलाकर रख लें। इसको आँख में लगाने से यह
सभी प्रकार के नेत्र दोषों तथा रोगों को हरता है। यह आँखों
के लिए सुखदायक है।
वक्तव्य—खपरिया को पीसकर पानी में डाल दें। उसका
घुलनशील भाग पीना में घुल जाता है। पानी के सूखने पर
वही पर्पटी जैसा प्राप्त होता है।

चूर्णाञ्जन (प्रसादन)
अग्नितप्तं हि सौवीरं निषिञ्चेत् त्रिफलारसैः।। 113 ।।
सप्तवेलं तथा स्तन्यैः स्त्रीणां सिक्तं विचूर्णितम्।
अञ्जयेत् तेन नयने प्रत्यहं चक्षुषोर्हितम् ।। 114 ।।
सर्वानक्षिविकारांस्तु हन्यादेतन्न संशयः।
सौवीराञ्जन (सफेद सुरमा) को अग्नि में तपाकर त्रिफला
के स्वरस में तथा स्त्री के दूध में सात-सात बार बुझायें और
फिर पीस लें। इसको प्रतिदिन नेत्रों में लगायें। यह आँख के
सभी विकारों को नष्ट कर देता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं
है।

शलाका-निर्माण-विधि
त्रिफलाभृङ्गशुण्ठीनां रसैस्तद्वच्च सर्पिषा ।। 115 ।।
गोमूत्रमध्वजाक्षीरैः सिक्तो नागः प्रतापितः।
तच्छलाकाऽञ्जन्त्येन सर्वानेत्रभवान् गदान् ।। 116 ।।

288 शार्ङ्गधरसंहिता [ उत्तरखण्डे
सीसा धातु को पिघला कर त्रिफला, भाँगरा तथा सौंठ के | जमालगोटा की मज्जा (मीगी) को नींबू के रस को
स्वरस में बुझायें और इसी प्रकार घी, गोमूत्र, मधु तथा बकरी | इक्कीस भावना दें और निरन्तर पीसते रहें, फिर इसकी बत्ती
के दूध में बुझायें। सीसे की यह शलाका (सलाई) नेत्रों में | बना लें। इस बत्ती को मनुष्य की लार या थूक में घिसकर
होने वाल सभी रोगों को अवश्य हरती है। | आँख में लगायें। यह साँप के विष को जीतकर मनुष्य को
वक्तव्य-सभी प्रकार के सुरमे तथा अंजन आदि उक्त | पुनः जीवित कर देता है।
शीशे की शलाका द्वारा लगाये जाते हैं और शुद्ध करके बनायी | वक्तव्य-यह अञ्जन विशेष करके सर्प द्वारा डसे हुये
गयी सीसा की सलाई का प्रयोग भी चक्षुष्य होता है। | व्यक्ति को सचेत कर प्रयुक्त किया जाता है। इससे
प्रत्यञ्जन-विधि | आश्चर्यजनक लाभ होते देखा गया है।
गतदोषमपेताश्रु सम्पश्यन् सम्यगम्भसा। | नेत्र-प्रसादन-विधि
प्रक्षाल्याक्षि यथादोषं कार्यं प्रत्यञ्जनं ततः ।। 117 ।। | भुक्त्वा पाणितलं घृष्ट्वा चक्षुषोर्दीयते यदि।
न वाऽनिर्गतदोषेऽक्षिण धावनं सम्प्रयोजयेत्। | जाता रोगा विनश्यन्ति तिमिराणि तथैव च ।। 123 ।।
प्रत्यञ्जनं तीक्ष्णतप्ते नेत्रे चूर्णं प्रसादनम् ।। 118 ।। | भोजन करने के पश्चात् दोनों हाथों को परस्पर घिसकर
जब दोष या उपद्रव शान्त हो जाये, आँसू बन्द हो जायें | यदि प्रतिदिन आँखों को मला जायें तो उत्पन्न हुये नेत्र रोग
और भली-भाँति देखने लग जायें तब जल से नेत्रों को धोकर | तथा तिमिर रोग नष्ट हो जाते हैं।
दोषों के अनुसार प्रत्यञ्जन का प्रयोग करें। जब तक दोष | नेत्र-सिंचन-विधि
शान्त न हो जाये तब तक धावन (आँख धोना) का प्रयोग न | शीताम्बुपूरितमुखः प्रतिवासरं यः
करें। तीक्ष्ण औषधियों से तपे हुये नेत्र में प्रसादन (नेत्र को | कालत्रयेण नयनद्वितयं जलेन।
स्वच्छ करने वाले) अञ्जन का प्रयोग करें। | आसिञ्चति ध्रुवमसौ न कदाचिदक्षि-
वक्तव्य-जिसका प्रतिदिन नेत्रों में प्रयोग किया जाता है | रोगव्यथाविधुरतां भजते मनुष्यः ।। 124 ।।
और जो प्रतिदिन आँखों को स्वस्थ रखने के लिए प्रयुक्त किया | शीतल जल से मुख को भरकर जो मनुष्य प्रतिदिन तीन
जाता है, उसे प्रत्यञ्जन कहते हैं। विशेष देखें-सु०उ०अ० 18। | बार (प्रातः, दोपहर तथा सायंकाल) दोनों आँखों को जल
नयनामृताञ्जन | (शीतल जल) से सींचता है, वह अवश्यमेव कभी भी आँखों
शुद्धे नागे दुते तुल्यं शुद्धं सूतं विनिक्षिपेत्। | के रोगों की व्यथा (पीड़ा) से व्याकुलता को प्राप्त नहीं
कृष्णाञ्जनं तयोस्तुल्यं सर्वमेकत्र चूर्णयेत् ।। 119 ।। | होता।
दशमांशेन कर्पूरं तस्मिंश्चूर्णे प्रदापयेत्। | नेत्र-रक्षा का महत्त्व
एतत् प्रत्यञ्जनं नेत्रगदजिन्नयनामृतम् ।। 120 ।। | चक्षूरक्षायां सर्वकालं मनुष्यै-
शुद्ध सीसा धातु को पिघलायें और तत्काल उसमें समभाग | र्यत्नः कर्तव्यो जीविते यावदिच्छा।
शुद्ध पारद डाल दें तथा उसका हिलाकर या घोलकर खरल में | व्यर्थो लोकोऽयं तुल्यरात्रिन्दिवानां
डाल दें (उसे दो तीन घण्टे तक उसे भली-भाँति घोटें) उसके | पुंसामन्धानां विद्यमानेऽपि वित्ते ।। 125 ।।
बाद दोनों के समान भाग में कालासुरमा डालकर देर तक | जब तक जीवित रहने की इच्छा हो तब तक मनुष्यों को
पीसें। अत्यन्त सूक्ष्म हो जाने पर सबकी अपेक्षा दसवाँ भाग | नेत्रों की रक्षा का सर्वदा यत्न करते रहना चाहिये, क्योंकि
उसमें कपूर मिला दे। यह प्रत्यञ्जन नेत्र के सभी विकारों को | अन्धे मनुष्यों के लिये तो रात-दिन समान होता है। ऐसे लोगों
जीतता है। | लिये धन रहने पर भी सम्पूर्ण संसार आँखा के न रहने कारण
सर्पविषनाशक अञ्जन | व्यर्थ होता है।
जयपालभवां मज्जां भावयेन्निम्बुकद्रवैः। | ग्रन्थकार की प्रार्थना
एकविंशतिवेलं तत् ततो वर्तिं प्रकल्पयेत् ।। 121 ।। | आयुर्वेदसमुद्रस्य गूढार्थमणिसञ्चयम्।
मनुष्यलालया घृष्ट्वा ततो नेत्रे तयाऽञ्जयेत्। | ज्ञात्वा कैश्चिद् बुधैस्तैस्तु कृता विविधसंहिताः ।। 126 ।।
सर्पदष्टविषं जित्वा सञ्जीवयति मानवम् ।। 122 ।। | किञ्चिदर्थं ततो नीत्वा कृतेयं संहिता मया।
| कृपाकटाक्षमिक्षेपमस्यां कुर्वन्तु साधवः ।। 127 ।।

त्रयोदशोऽध्यायः] नेत्रप्रसादनविधिः 289
[वाम स्तम्भ]
आयुर्वेद सागर के गूढ़ अर्थ (विषयरूपी) मणियों के
सञ्चय (खजाने) को कुछ विद्वानों ने जाना या समझा है।
तदनुसार उन्होंने अनेक संहितायें भी रची हैं। उन संहिताओं
(चरक, सुश्रुत आदि) में से कुछ अर्थ (विषय) को लेकर मैं
(शार्ङ्गधराचार्य) ने यह संहिता बनायी है। सज्जन लोग इस
पर सदैव कृपा-दृष्टि डालते रहें।
शुभकामना
विविधगदार्तिदरिद्रनाशनं या
हरिरमणीव करोति योगरत्नैः।
विलसतु शार्ङ्गधरस्य संहिता सा
कविहृदयेषु सरोजनिर्मलेषु।।128।।
जो (संहिता) योगरूपी रत्नों द्वारा हरिरमणी (लक्ष्मी)
के समान अनेक प्रकार के रोगों की पीड़ारूपी दरिद्रता का
नाश करती है शार्ङ्गधराचार्य द्वारा रचित वह संहिता कवियों
तथा कविराजों के कमल के समान निर्मल हृदयों में सदैव
विलास करती रहे।
ग्रन्थ की उपयोगिता
अल्पायुषामल्पधियामिदानीं
कृतं समस्तश्रुतिपाठशक्त्या।
तदत्र युक्तं प्रतिबीजमात्र-
मभ्यस्यतामात्महितं प्रयत्नात्।।129।।
इति श्रीदामोदरसूनुना शार्ङ्गधरेण विरचितायां
शार्ङ्गधरसंहितायाम् उत्तरखण्डे नेत्रप्रसादनविधिर्नाम
त्रयोदशोऽध्यायः।।13।।
आजकल छोटी आयु तथा छोटी बुद्धि वाले मनुष्य सम्पूर्ण
आयुर्वेद के ग्रन्थो को पढ़ने की शक्ति नहीं रखते। इसलिये मैं
(शार्ङ्गधराचार्य) ने इस संहिता में आयुर्वेद के बीज (मौलिक
भाव) लिख दिये हैं। अतः आप सब अपने लाभ के लिये
परिश्रमपूर्वक इसका अभ्यास करें।
वक्तव्य-चिकित्सक को चिकित्सा काल में सब प्रकार
से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं, इसीलिए कहा गया
है-'चिकित्सितात् पुण्यतमं न किञ्चिदपि शुश्रुमः'। सु०
क०अ० 8.142। इसमें सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि
परहित के साथ साथ इससे अपना हित भी इससे हो जाता है,
क्योंकि चिकित्सक सर्वदा यही चाहता है-'सर्वे भवन्तु
सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः'।
[दक्षिण स्तम्भ]
प्रतिसंस्कर्ता का निवेदन
षड्विंशतिः पद्यशतानि पूर्वं
प्रतिश्रुतं शार्ङ्गधरेण यत् सा।
सङ्ख्या क्वचित् संस्करणेऽद्य पूर्णा
नाऽऽलोक्यते तत्प्रदुनोति चित्तम्।।1।।
आचार्य शार्ङ्गधर ने अपनी इस संहिता के प्रारम्भ में
प्रतिज्ञा की थी, कि इस ग्रन्थ की श्लोक संख्या छब्बीस सौ
है। परन्तु आज उपलब्ध किसी भी संस्करण में उक्त संख्या
दृष्टिगोचर नहीं होती, जिससे मानसिक कष्ट हो रहा था।।1।।
उपेक्षया प्रस्तुतसंहिताया आसं
मुहुश्चिन्तितमानसः प्राक्।
पूर्तिः कथं स्यादिति तर्कयन्
द्वाग्गुरोः कृपा प्रादुरभूत् ततो मे।।2।।
इस प्रकार विद्वानों द्वारा शार्ङ्गधरसंहिता की उपेक्षा को
देखकर मैं पहले अत्यन्त चिन्तित था और सोचा करता था,
कि इसकी पूर्ति कैसे हो; तभी मेरे ऊपर गुरुचरणों की कृपा
हुई।।2।।
ग्रन्थं समालोक्य सुसूक्ष्मबुद्ध्या
संस्मृत्य पूर्वान् भिषगुत्तमांश्च।
ग्रन्थानुरोधाद् विषयानुरोधात्
पूर्तिमयाऽकारि च तत्त्वदृष्ट्या।।3।।
तदनन्तर मैंने सूक्ष्म बुद्धि से ग्रन्थ का अवलोकन किया
और प्राचीन आयुर्वेदविद् महर्षियों का स्मरण कर उनके ग्रन्थों
का अवलोकन किया। तदनन्तर ग्रन्थ तथा विषय को ध्यान में
रखकर तात्त्विक दृष्टि से इसकी पूर्ति कर दी।।3।।
प्रतिसंस्कारमासाद्य पूर्णेयं कृतिरुत्तमा।
रोगिणां रोगनाशाय कल्पतां भिषजां मुदे।।4।।
मेरे द्वारा प्रतिसंस्कृत यह उत्तम कृति रोगियों के रोगों का
नाश करे और विद्वान् चिकित्सकों को आनन्द प्रदान करे।।4।।
पुरा विकृतिमापन्ना श्रीशार्ङ्गधरसंहिता।
अधुना संस्कृता श्रीमद् ब्रह्मानन्दत्रिपाठिना।।5।।
इसके पहले यह शार्ङ्गधरसंहिता खण्डित (अपूर्ण) थी।
अब श्री ब्रह्मानन्द त्रिपाठी ने इसका प्रतिसंस्कार कर इसे पूर्ण
कर दिया है।।5।।
[अन्तिम पुष्पिका]
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी विरचित दीपिका व्याख्या,
विशेष वक्तव्य आदि से संवलित शार्ङ्गधरसंहिता उत्तरखण्ड का तेरहवाँ अध्याय समाप्त।। 13 ।।
उत्तरखण्ड समाप्त-शार्ङ्गधरसंहिता समाप्त।