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शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary

शार्ङ्गधराचार्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished356 पृष्ठ

248 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे

248 | शार्ङ्गधरसंहिता | [उत्तरखण्डे
मधुर द्रवों के संयोगा भी 'बृंहण नस्य' के योग प्रस्तुत किये
जा सकते हैं।
अणुतैल— 'चन्दनागुरूणी पत्रं दार्वीत्वक् मधुकं
बलाम्। प्रपौण्डीकं सूक्ष्मैलां विडङ्गं बिल्वमुत्पलम्।
ह्रीबेरमभयां वन्यं त्वङ्मस्तं सारिवां स्थिराम्।। जीवन्तीं
पृश्निपर्णीं च सुरदारु शतावरीम्। हरेणुं बृहतीं व्याघ्रीं
सुरभीं पद्मकेसरम्।। विपाचयेच्छतगुणे माहेन्द्रे
विमलेऽम्भसि। तैलाद् दशगुणं शेषं कषायमवतारयेत्।।
तेन तैलं कषायेण दशकृत्वो विपाचयेत्। अथास्य दशमे
पाके समांशं छागलं पयः।। दद्याद्देषोऽणुतैलस्य
नावनीयस्य संविधिः। अस्य मात्रां प्रयुञ्जीत तैलस्यार्ध-
पलोन्मिताम्।। स्निग्धस्विन्नोत्तमाङ्गस्य पिचुना
नावनैस्त्रिभिः। त्र्यहात् त्र्यहाच्च सप्ताहमेतत्कर्म समाचरेत्।।
निवातोष्णसमाचारो हिताशी नियतेन्द्रियः। तैलमेतत्
त्रिदोषघ्नमिन्द्रियाणां बलप्रदम्।। प्रयुञ्जानो यथाकालं
यथोक्तानश्नुते गुणान्।' अर्थात्-सफेदचन्दन, अगुरु,
तेजपत्ता, दारुहल्दी, दालचीनी, मुलेठी, बरियारा, पुंडेरिया,
छोटी इलायची, वायविडंग, बेलगिरी, कमल, नेत्रबाला, हरड़,
केवटीमोथा, दालचीनी, नागरमोथा, सारिवा, शालपर्णी,
जीवन्ती, पिठवन, देवदारु, शतावर, हरेणु, बनभण्टा, भटकटैया,
सुरभी, (रास्ना) तथा कमल का केसर-इन सब द्रव्यों को
तैल से सौगुने वर्षा के निर्मल जल में पकायें, फिर तैल से
दशगुना क्वाथ अवशिष्ट रख लें, इस क्वाथ से दस बार
अर्थात् बार-बार समभाग क्वाथ डालकर पाक करें और दसवें
पाक में समभाग बकरी का दूध डालकर पाक करें। यह
नस्योपयोगी 'अणुतैल' के निर्माण की विधि है। इस तैल की
आधा पल (64 बिन्दु) की मात्रा का प्रयोग करें। रोगी के
शिर पर स्नेहन तथा स्वेदन करने के अनन्तर फाहा द्वारा दिन
में तीन बार नस्य दें। तीन-तीन दिन के बाद सात दिन (21
दिन) तक यह कर्म करें। रोगी निवातस्थान में रहें, उष्ण
अन्न, जल तथा हित भोजन का सेवन करें और जितेन्द्रिय
बना रहे। यह तैल त्रिदोषनाशक एवं इन्द्रियों को शक्ति देने
वाला है। इसका यथासमय प्रयोग करने से मानव स्नेहन-नस्य
के सभी गुणों को प्राप्त कर लेता है।
**स्पष्टीकरण—**तैल 1 सेर, वर्षा का जल 100 सेर, शेष 10
सेर, औषध 1 सेर, बकरी का दूध 1 सेर। शेष विधि स्पष्ट है।
**विशेष वक्तव्य—**वृद्धवाग्भट ने गद्यरूप में प्रथम, द्वितीय
भेद से दो अणुतैलों की चर्चा की है। इसके अधिकांश द्रव्य
द्वितीय अणुतल से मिलते हैं। देखें—अ०सं०सू०अ० 29
गद्य 9।
कुंकुम-नस्य
(सशर्करं पयःपिष्टं भृष्टमाज्येन कुङ्कुमम्।
नस्यप्रयोगतो हन्याद् वातरक्तभवा रुजः।।32।।
भ्रूशङ्खाक्षिशिरःकर्णसूर्यावर्त्तार्धभेदकान् ।)
केशर को घी में भून लें, फिर समान भाग खाँड मिलाकर
दूध में पीस लें। इसकी नस्य लेने से वात तथा रक्त से उत्पन्न
होने वाली पीड़ायें और भ्रू (भौंह), शंख (कनपटी), नेत्र
शिर, कान के रोग, सूर्यावर्त्त तथा अर्द्धावभेदक नामक शिरोरोग
नष्ट हो जाते हैं।
**वक्तव्य—**यह बृंहण नस्यों में सुप्रसिद्ध योग है।
बृंहण-नस्य के द्रव्य
नस्यं स्यादणुतैलेन तथा नारायणेन वा।।33।।
माषादिना वा सर्पिर्भिस्तत्तद् भेषजसाधितैः।
अणुतैल, नारायण तैल, माषादि तैल तथा उपयुक्त द्रव्यों
के संयोग से विधिपूर्वक पकाये हुये घृत की नस्य 'बृंहण-नस्य'
कही जाती हैं।
दोष-भेद से स्नेह-व्यवस्था
तैलं कफे स्याद् वाते च केवले पवने वसाम्।।34।।
दद्यान्नस्यं सदा पित्ते सर्पिर्मज्जानमेव च।
कफ तथा वायु के विकारों में तैल, केवल वायु के
विकारों में वसा तथा पित्त के विकारों में घी और मज्जा की
नस्य देनी चाहिये।
माषादि नस्य
माषात्मगुप्तारास्नाभिर्बलारुबुकरोहिषैः ।।35।।
कृतोऽश्वगन्धया क्वाथो हिङ्गुसैन्धवसंयुतः।
कोष्णो नस्यप्रयोगेण पक्षाघातं सकम्पनम्।।36।।
जयेदर्दितवातं च मन्यास्तम्भापबाहुकौ।
उड़द, किवाँच के बीज, रासना, बरियारा, एरण्ड के
बीज, रोहिषतृण तथा असगन्ध के क्वाथ में हींग तथा सेंधा
नमक मिलाकर रख लें, फिर इसको गुनगुना करके नस्य लें।
यह पक्षाघात, कम्पवायु, अर्दित (मुख-प्रदेश का लकवा)
मन्यास्तम्भ तथा अपबाहुक रोगों को जीत लेता है।
प्रतिमर्श-नस्य-विधि
प्रतिमर्शस्य मात्रा तु द्विद्विबिन्दुमिता मता।।37।।
प्रत्येकशो नस्तः कायो स्नेहेनेति विनिश्चितम्।

अष्टमोऽध्यायः] नस्यविधिः 249
प्रतिमर्श-नस्य का मात्रा स्नेह के दो-दो बूँदों की मानी जितना स्नेह नाक में डालने पर थोड़ा-सा मुख में पहुँच
जाती है और वह दोनों नथुनों में प्रयुक्त की जाती है। यह जाये उतना स्नेह प्रतिमर्श की एक मात्रा है। इसे पीना नहीं
शास्त्रीय निश्चय है। चाहिये, अपितु मुख में आये हुये स्नेह को थूक देना चाहिये।
वक्तव्य-मर्श और प्रतिमर्श नस्यों के नामभेद में मात्रा प्रतिमर्श के योग्य रोगी
का भेद ही कारण है। क्षीणे तृष्णास्यशोषार्ते बाले वृद्धे च युज्यते ।। 44 ।।
प्रतिमर्श की मात्रा प्रतिमर्शेन शाम्यन्ति रोगाश्चैवोर्ध्वजत्रुजाः।
स्नेहे ग्रन्थिद्वयं यावन्मग्ना चोद्धता ततः ।। 38 ।। वलीपलितनाशश्च बलमिन्द्रियजं भवेत् ।। 45 ।।
तर्जनीयं स्रवेद् बिन्दुं सा मात्रा बिन्दुसंज्ञिता। क्षीण (जिसकी धातुओं का क्षय हो चुका है), तृष्णा
एवंविधैर्बिन्दुसंज्ञैरष्टभिः शाण उच्यते ।। 39 ।। तथा मुखशोष से पीड़ित, बालक तथा वृद्ध को प्रतिमर्श का
स देयो मर्शनेस्त्ये तु प्रतिमर्शो द्विबिन्दुकः । प्रयोग करना उचित होता है। इससे जत्रु के ऊपरी भाग के रोग
स्नेह में दो ग्रन्थि तक तर्जनी (अँगुठे के समीप वाली) शान्त होते हैं, बलियों (झुर्रियों) तथा अकालपलित का नाश
अंगुली को डुबा दें और फिर निकाल लें, उससे जो बूँद होकर ज्ञानेन्द्रियों का बल बढ़ता है।
गिरती है, उसको 'बिन्दुमात्रा' कहा जाता है। इस प्रकार के पलित में नस्य
आठ बिन्दुओं का एक शाण होता है और वह मर्श नामक बिभीतनिम्बगम्भारी शिवा शेलुश्च काकिनी।
नस्य में प्रयुक्त होता है। प्रतिमर्श की मात्रा तो दो बिन्दुओं की एकैकतैलनस्येन पलितं नश्यति ध्रुवम् ।। 46 ।।
होती ही है। बहेड़ा, नीम, गम्भार, हरड़, लिसोड़ा तथा मकोय-इनमें
प्रतिमर्श के काल से किसी एक तेल की नस्य लेने से पलित (अकाल में बाल
समयाः प्रतिमर्शस्य बुधैः प्रोक्ताश्चतुर्दश ।। 40 ।। पकना) अवश्य नष्ट हो जाता है।
प्रभाते दन्तकाष्ठान्ते गृहान्निर्गमने तथा। नस्य-ग्रहण-विधि
व्यायामाध्वव्यवायान्ते विण्मूत्रान्तेऽञ्जने कृते ।। 41 ।। अथ नस्यविधिं वक्ष्ये नस्यग्रहणहेतवे।
कवलान्ते भोजनान्ते दिवा सुप्तोत्थिते तथा। देशे वातरजोमुक्ते कृतदन्तनिघर्षणम् ।। 47 ।।
वमनान्ते तथा सायं प्रतिमर्शः प्रयुज्यते ।। 42 ।। विशुद्धं धूमपानेन स्विन्नभालगलं तथा।
विद्वानों ने प्रतिमर्श-नस्य के 14 समय कहे गये हैं। उत्तानशायिनं किञ्चित् प्रलम्बशिरसं नरम् ।। 48 ।।
यथा-1. प्रातःकाल, 2. दतवन करने के पश्चात्, 3. घर से आस्तीर्णहस्तपादं च वस्त्राच्छादितलोचनम्।
बाहर जाते समय, 4. व्यायाम के पश्चात्, 5. मार्ग-गमन के समुन्नमितनासाग्रं वैद्यो नस्येन योजयेत् ।। 49 ।।
पश्चात्, 6. मैथुन के पश्चात्, 7. मलोत्सर्ग के पश्चात्, 8. कोष्णमच्छिन्नधारं च हेमतारादिशुक्तिभिः।
मूत्रोत्सर्ग के पश्चात्, 9. अञ्जन लगाने के पश्चात्, 10. कवल शुक्त्या वा यन्त्र युक्त्या वा प्लोतैर्वा नस्यमाचरेत् ।। 50 ।।
(जलपान) के पश्चात्, 11. भोजन के पश्चात्, 12. दिन में नस्येष्वासिच्यमानेषु शिरो नैव प्रकम्पयेत्।
सोने के पश्चात्, 13. वमन के पश्चात् और 14. सायंकाल। न कुप्येन प्रभाषेत नोच्छिङ्खेन हसेत् तथा ।। 51 ।।
इन समयों में प्रतिमर्श का प्रयोग किया जाता है। एतैर्हि विहितः स्नेहो नैवान्तः सम्प्रपद्यते।
वक्तव्य-इसके विशेष विवेचन के लिए देखे-सु० ततः कासप्रतिश्यायशिरोऽक्षिगदसम्भवः ।। 52 ।।
चि० अ० 40। शृङ्गाटकमभिप्लाव्य स्थापयेन्न गिलेद् द्रवम्।
प्रतिमर्श की विधि इसके पश्चात् नस्य लेने के लिये उसकी विधि कही
ईषदूच्छिङ्कनात् स्नेहो यदा वक्त्रं प्रपद्यते। जायेगी। इसके लिए वायु (तीव्र वायु) तथा धूलि से रहित
नस्ये निषिक्तं तं विद्यात् प्रतिमर्शं प्रमाणतः ।। 43 ।। स्थान होना चाहिये। रोगी को पहले दतवन तथा धूमपान
उच्छिन्दन् पिबेच्चैतन्निष्ठीवेन्मुखमागतम्। कराकर शुद्ध कर लें, उसके मस्तक तथा गले को स्वेदित कर
दें, फिर उसे चित लेटा दें और गरदन के नीचे तकिया रखकर
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