Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
Page 42Permalink

२ सौंदर्य लहरी
सत् चित् आनन्द से अभिव्यक्त होने वाली चिति अर्थात चिन्मयी
शक्ति के साथ समन्वय करके अद्वैतवाद का ही प्रतिपादन किया
गया है। स्थूल बहिर्दृष्टि रखने वाले उपासकों का उपास्यदेव बहुधा
किसी न किसी रूप में व्यक्तित्व की भावना की प्रधानता लिये
होता है, परन्तु एक दार्शनिक का दृष्टिकोण, जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म
स्तरों पर अपना लक्ष्य रखता है, उपासक के मूर्तिमान एकदेशीय
व्यक्तिमापन्न रूप से सन्तुष्ट नहीं होता, वह सदा दोनों का समन्वय
करने का यत्न किया करता है। जैसा कि श्री भगवान स्वयं
गीता में कहते हैं:—
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ ( गीता ७-२४ )
अर्थ:—बुद्धिहीन मनुष्य मुझ अव्यक्त को व्यक्तिमापन्न
मानते हैं। क्योंकि वे मेरे उत्तम अव्यय परं भाव को नहीं जानते !
सौन्दर्य लहरी को पढने से यह बात स्पष्ट दिखने लगती है।
ब्रह्म अक्षर है, अर्थात उसमें कभी किसी प्रकार का परिणाम
नहीं होता, वह अपरिणामी, अव्यय, अविनाशी
शिव शक्ति है, परन्तु जगत के सृष्टि स्थिति संहार का अभिन्न-
निमित्तोपादान कारण भी है, इसलिये सर्वशक्तिमान है। शक्ति
शक्तिमान से भिन्न नहीं कही जा सकती और न वह शक्तिमान से
पृथक ही हो सकती है, यद्यपि सब कर्म शक्ति की ही क्रिया से
सम्पादित होते हैं। अर्थात शक्ति ही सारे जगत का कारण है,
तो भी शक्तिमान की शक्ति शक्तिमान की इच्छा के ही आधीन

Page 43Permalink

सौंदर्य लहरी ३
कार्य करती है। स्वतंत्र रूप से उसकी कोई सत्ता नहीं होती, या
यों कहें कि शक्तिमान की इच्छा ही शक्ति है। परन्तु वह
उसका अंग भी नहीं कही जा सकती; अर्थात् दोनों में अंग
अंगी का सम्बन्ध नहीं है। दोनों में कोई वास्तविक भेद नहीं कहा
जा सकता। जो भिन्नता दीख पडती है, वह सर्वथा व्यवहारिक
ही है पहिले शक्तिमान में इच्छा अथवा संकल्प के रूप में उसका
उदय होता है फिर वह क्रिया और ज्ञान का रूप धारण कर लेती
है। इच्छा क्रिया और ज्ञान के रूपों में अभिव्यक्ति होने पर
भी शक्ति एक ही है, और शक्तिमान का ही रूप है; परन्तु वह
शक्तिमान का परिणाम अथवा विकार भी नहीं है। क्योंकि
ब्रह्म अपरिणामी है।
श्वेताश्वेतरोपनिषत् का कथन है कि :—
ब्रह्मवादियों की समाज में यह प्रश्न उपस्थित हुवा कि हम
कहां से पैदा हुवे, हम किस के आधार पर जीवित और प्रतिष्ठित हैं,
और किस के कारण सुख दुःख के चक्कर में पडे हैं। तो उन्होंने
ध्यान योग द्वारा देखा कि सब का कारण एक शक्ति ही है, जो
जड नहीं बरन देवात्मिका चेतन शक्ति है। “ते ध्यान योगानुगता
अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्”। यह हम कह चुके हैं कि
शक्ति शक्तिमान की ही इच्छा के परतन्त्र है, अथवा वह शक्तिमान
की इच्छा की ही अभिव्यक्ति है। ब्रह्मसूत्र अध्याय १. पाद ४
सूत्र ३ “तदधीनत्वादर्थवत्” के भाष्य में शंकर भगवत्पाद कहते हैं:-

Page 44Permalink

४ सौंदर्य लहरी
“ परमेश्वराधीनात्वियमस्माभिः प्रागवस्था जगतोऽम्युप-
गम्यते न स्वतंत्रा । अर्थवती ही सा नहि तया
विना परमेश्वरस्य स्रष्टृत्वं सिद्धयति । शक्तिरहितस्य तस्य
प्रवृत्त्यनुपपत्तेः ।
अर्थः— हम तो जगत की प्रागवस्था परमेश्वर के आधीन
मानते हैं, न कि स्वतंत्र । क्योंकि वह अर्थवती अर्थात सार्थक है
उसके बिना तो परमेश्वर का सृष्टि करना भी सिद्ध नहीं होता
शक्ति रहित परमेश्वर में प्रवृत्ति का अभाव होने के कारण ।
जब कि शक्ति की शक्तिमान से पृथक स्वतंत्र सत्ता नहीं, तो
शक्ति की महिमा का स्तवन करना शक्तिमान का ही गुणगान
करना है । किसी मनुष्य की वीरता अथवा कला कौशल की बडाई
करने से उस मनुष्य की ही वडाई समझी जाती हे । इसी प्रकार
आदि शक्ति की भी उपासना, पूजन, स्तवन आदि द्वारा परमात्मा
की ही उपासना, पूजन अथवा स्तवन करना है ।
प्रत्येक ग्रंथ में चार अंग हुवा करते हैं— १ प्रयोजन २ विषय
३ उपाय और ४ सम्बन्ध । पाठकों को किसी भी ग्रंथ
प्रयोजन के स्वाध्ययन करने से पहिले यह जानना आवश्यक
है, कि ग्रंथकार का इस ग्रंथ के लिखने में क्या प्रयोजन है; उसका
विषय क्या है, अपने प्रयोजन की सिद्धि के लिये ग्रंथकार ने क्या
क्या उपाय अथवा साधन बताये हैं, और अन्त में यह भी जानना
आवश्यक है कि इन तीनों का परस्पर क्या सम्बन्ध है ।

Page 45Permalink

सौंदर्य लहरी ५
श्री मच्छङ्कर भगवतपाद का किसी भी ग्रंथ के लिखने में
मोक्ष के एक मात्र साधन तत्त्वज्ञान की अपरोक्षानुभूति की उपलब्धि
के सिवाय दूसरा अन्य प्रयोजन नहीं हो सकता । विषय चाहे कुछ
भी क्यों न हो । सौंदर्य लहरी का विषय भगवंती का स्तवन है ।
स्तुति मनन का एक साधन है, जिससे तत्त्व दर्शन और तत्त्व दर्शन
से अपरोक्ष ज्ञान होता है । कोई शंका करे कि योग और उपासना
कर्म-कांड के विषय हैं, और कर्म का फल ज्ञान नहीं होता; उनको
यह समझना जरूरी है कि योग अथवा उपासना के बहिरंग और
अन्तरंग दो स्तर होते है । वहिरंग क्रियाएं कर्म प्रधान हुवा करती
हैं, जिनका प्रयोजन मन को परमार्थ की ओर आकर्षित कराना
मात्र है । जैसे बालक की पढने में रुचि बढाने के लिये पहिले
उसे खिलौनों के विचित्र खेलों द्वारा kindergarten की
आधुनिक पद्धति के अनुसार खेल में ही प्रवृत्त किया जाता है ।
उपासना का बाह्य कर्म-कांड ज्ञान का कारण नहीं । परन्तु उपासना
के समय उपासक का चित्त भावना से युक्त होता है । भावना रहित
उपासना प्राणहीन समझनी चाहिये । भावना और ध्यान ही
उपासना और योग के बाह्य कर्माडम्बर रूपी स्थूल शरीर में प्राण
का काम करते हैं ।
तज्जपस्तदर्थ भावनम् । (यो. द. १, २८)
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽन्तरायाभावश्च (यो. द. १, २९)
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना (गी. १३.२४)
भगवान का अनन्य, तैलधारा प्रवाहवत, अनवच्छिन्न चिन्तन
अथवा योग का "आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचदपि चिन्तयेत्" साधन

Page 46Permalink

६ सौन्दर्य लहरी
वेदान्त का निदिध्यासन ही है। जीव ब्रह्मैक्यज्ञान तो वाणी से
कथन मात्र का ज्ञान अथवा बुद्धि की समझ का परोक्ष ज्ञान नहीं,
वह तो ध्यान की वह भूमिका है जिस पर आरूढ होने पर जीव की
अहँ वृत्ति में देहाभिमान की वृत्ति तनु होकर ब्रह्म वृत्ति बढने
लगती है, अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पण करके मन
उपास्य देव से तल्लीनता प्राप्त कर लेता है। ऐसे दृढ भावना युक्त
ध्यान अथवा अनन्य चिंतन का फल ही तत्त्व दर्शन है। उपासना
के अन्तरंग स्तरों पर प्रगति होने के साथसाथ बाह्य कर्म-कांड का
आडम्बर स्वयं छूटने लगता है।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
(गीता ३. १७)
सौन्दर्य लहरी का विषय तो भगवती का स्तवन ही है। परन्तु
उसकी शैली ऐसी है कि स्तुति के बहाने प्रथम ४१ श्लोकों में श्री
विद्या के रहस्य, हादि कादि विद्या का उद्धरण, षट्-चक्र-वेध का
प्रकरण. ग्रंथि त्रय का वर्णन इत्यादि साधनोपायों का दिग्दर्शन
कराकर जीव ब्रह्म की एकता पर साधक का लक्ष्य कराया गया है,
उक्त साधन-क्रम को तीन स्तरों में बांटा जाता है, जिनकी दीक्षा
के लिये किसी समर्थ गुरु की शरण लेनी पडती है, क्योंकि साधन
का रहस्य पुस्तकों के पढने से नही मिलता ! वह गुरु कृपा का ही
विषय है, और गुरु की कृपा ही दीक्षा तत्त्व है।

Page 47Permalink

सौंदर्य लहरी ७
दीयते शिव सायुज्यं क्षीयते पाश बन्धनम् ।
अतो दीक्षेति कथिता बुधैःसच्छास्त्रवेदिभिः ॥
दीक्षा ३ प्रकार की होती है, १ आणवी, २ शाक्ति और ३
दीक्षा शाम्भवी । प्रथम आणवी दीक्षा में मंत्र दीक्षा द्वारा
श्रीचक्र के पूजन सहित कादि हादि विद्याओं में
प्रवेश कराकर, बहिर्पूजन में जो कर्म प्रधान है, साधक को दीक्षित किया
जाता है । अंतिम दोनों दीक्षाएं बेध दीक्षाएं कहलाती हैं, जिनमें
गुरु शिष्य पर शक्तिपात करके शिष्य की कुंडलिनी शक्ति को जागृत
कर देता है । शक्ति दीक्षा में षट्-चक्र के बेध द्वारा ग्रंथित्रय अर्थात
रुद्रग्रंथि, विष्णु ग्रंथि और ब्रह्म ग्रंथि का बेध किया जाता है ।
इसीलिये इसको बेध दीक्षा भी कहते हैं। अंतिम शांभवी दीक्षा में
जो तीव्रतम दीक्षा है, जीव ब्रह्मैकत्व ज्ञान का प्रस्फुटन होता है,
इसीलिये इसको महावेध दीक्षा भी कहते हैं ।
यह ऊपर कहा जा चुका है कि उपरोक्त दीक्षाएं गुरु के शक्तिपात
रूपी अनुग्रह के द्वारा ही संपादित होती हैं। शक्ति-
शक्तिपात पात दीक्षा में गुरु अधिकारी जिज्ञासु को स्पर्श,
अवलोकन, मंत्र देकर वाणी द्वारा अथवा संकल्प मात्र से अनुगृहीत
करता है; यदि शिष्य अपने को अनुगृहीत अनुभव न करे, तो
दीक्षा का होना न होने के तुल्य समझना चाहिये ।
श्री मच्छङ्कराचार्य ने सौंदर्य लहरी जैसा ग्रंथ लिख कर मानव
समाज पर बडी कृपा की है क्योंकि केवल वाचक ज्ञानियों को यह

Page 48Permalink

८ सौंदर्य लहरी
बताना अत्यावश्यक है कि बिना गुरु के शक्तिपात रूपी अनुग्रह के
जीव ब्रह्मैक्य ज्ञान का होना दुर्लभ ही नहीं असंभव है, कहा है:—
दुर्लभो विषय त्यागो दुर्लभं तत्व दर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥
नहीं तो क्या यह आश्चर्य अत्याश्चर्य नहीं है कि ब्रह्म-सूत्रों के
भाष्यकार एक ऐसे विषय को इतनी महानता दें, जो वेदांत की
परिपाटी से सर्वथा असंगत हो । इस विषय का अधिक स्पष्टीकरण
करने के लिये हम नीचे श्री वासुदेव ब्रह्मेन्द्र सरस्वतीजी के
‘ब्रह्मांशिका’ नामक पुस्तक से संग्रहीत निम्न-श्लोक उद्धृत करते हैं:—
तत्वज्ञानेन मायायाबाधो नान्येन कर्मणा ।
ज्ञानं वेदांतवाक्योत्थं ब्रह्मात्मैकत्व गोचरम् ॥
तच्चदेवप्रसादेन गुरोः साक्षान्निरीक्षणात् ।
जायते शक्तिपातेन वाक्यादेवाधिकारिणाम् ॥
अर्थः—तत्वज्ञान से ही माया का बाध होता है । अन्य
कर्म से नहीं, जो ज्ञान वेदान्त के महावाक्यों द्वारा ब्रह्म और
जीवात्मा के एकत्व की अनुभूति दिलाता है वह ज्ञान ईश्वर के
प्रसाद से और गुरु के साक्षात निरीक्षण अथवा वचन से शक्तिपात
द्वारा अधिकारियों में प्रकाशित होता है ।
गीता में भगवान ने भी कहा है:—
“ तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ”(गीता ४,३८)
अर्थः—वह (ज्ञान) स्वयं योग सिद्ध को यथा समय
अपने अन्तर में ही मिलता है ।

Page 49Permalink

सौंदर्य लहरी ९
अज्ञान से उत्पन्न होने वाला भ्रम पांच प्रकार का
पांच प्रकार होता है ।
का भ्रम और
तीन प्रकार का मल
जीवेश्वरौ भिन्नरूपौ इति प्रथमः,
आत्मनिष्ठं कर्तृगुणं वास्तवं वा द्वितीयकः,
शरीरत्रय- संयुक्तजीवः संगी तृतीयकः,
जगत्कारण- रूपस्यावेकारित्वं चतुर्थकः,
कारणाद्भिन्नजगतः सत्यत्वं पंचमों भ्रमः
( अन्नपूर्णोपनिषत् )
जीव ब्रह्म का भेद पहला भ्रम है । आत्मा में कर्ता भोक्तापन वास्तविक
है या नही, यह दूसरा भ्रम है । स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों
शरीरों के संयोग से इतरेत्तर अध्यास के कारण आत्मा संगी हो गया
है, यह तीसरा भ्रम है। प्रथम मायामल, दूसरा कर्तामल और तीसरा
आणव मल कहलाता है । चौथा और पांचवा भ्रम दोनों जगत और
उसके अभिन्न निमित्तोपादान कारण-ब्रह्म सम्बन्धी हैं । पहिला भ्रम
जगत के कारणस्वरुप अपरिणामी ब्रह्म तत्व में विकारीपन की प्रतीति
कराता है, और दूसरा, कारण और कार्य में भेद बुद्धि उत्पन्न कराता
है । मायामल, कर्तामल और आणव मल की निवृति कुण्डलिनी शक्ति
के जागरणोपरांत षट् चक्र वेध द्वारा तत्व शुद्धि होने पर होती है ।
तत्व ३६ हैं जिनका वर्णन आगे आयगा । उनमें पांच युद्ध तत्व;
सात शुद्धाशुद्ध तत्व और चौबीस अशुद्ध तत्व होते हैं । प्रथम
पांच शुद्ध तत्वों को छोडकर शुद्धि शेष इकतीस तत्वों की होती है,

Page 50Permalink

१० | सौन्दर्य लहरी

अनात्म तत्वों में आत्म भावना के न रहने पर उन तत्वों की शुद्धि
कहलाती है ।
चौथे भ्रम की निवृत्ति जगत को सत् शक्ति का परिणाम जान
कर ब्रह्म के विकार रहित सिद्ध होने पर होती है; और पांचवे भ्रम
की निवृत्ति शक्ति में ब्रह्म दृष्टि होने पर होती है ।
अनात्म तत्वों में से आत्माध्यास की निवृत्ति होना अर्थात पंचकोशों
तत्त्व शुद्धि के विभिन्न स्तरों पर से आत्म-भावना रूपी तादात्म्यता
को नष्ट करना ही तत्व शुद्धि कहलाता है ।
जैसा कि 'तैत्तिरीयोपनिषत्' के आठवे अनुवाक में कहा है कि
इस लोक से प्रयाण करते समय अपने आत्म स्वरूप को जैसा बताया
गया है, वैसा जानने वाला मनुष्य इस आत्मा को अन्नमय कोष से
निकालता है, इस आत्मा को प्राणमय कोष में से निकालता है, इस
आत्मा को मनोमय कोष से निकालता है, इस आत्मा को विज्ञानमय कोष
से निकालता है, इस आत्मा को आनन्दमय कोष से निकालता है ।
आनन्द ब्रह्म को जानने वाला, जहां से मन सहित वाणी
बिना उसे प्राप्त किये लौट आती है, किसी से भी भय नहीं खाता ।
अर्थात वह निर्भय ब्रह्म पद को प्राप्त हो जाता है ।
अन्नमय कोष पांच महाभूतों से बना है, इसलिये उससे
निकालने के लिये क्रमशः पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और
आकाश के ५ स्तरों से आत्मा को हटाना पडेगा । उक्त तत्व भी
अपने अपने स्तर पर अन्य तत्वों के सम्मिश्रण के परिणाम हैं;
पृथ्वी में ५६, जल में ५२, अग्नि में ६२, वायु में ५४, और
आकाश में ७२ किरणें होती हैं, जिनका सम्बन्ध तत्वों और

Page 51Permalink

सौंदर्य लहरी ११

मातृकाओं से है। और फिर उनके उतने ही अधिदेवता होते हैं।
आत्मा का सब से सम्बन्ध है। उसको सब से पृथक करना होता
है (देखें श्लोक १४); इसी प्रकार प्राणमय कोष के भी पांच स्तर
हैं, उनके नाम प्राण, अपान, समान, व्यान, और उदान हैं,
जिनके द्वारा अन्नमय कोष के अभ्यन्तर व्यापारों की सब क्रियाएं
होती हैं। ये क्रियाएं पांचों महाभूतों से सम्बन्धित होने के कारण
पांच प्रकार की हैं। अभ्यन्तर क्रियाएं श्वास प्रश्वास, पाचन,
रस का सातों धातुओं में वितरण और उनका निर्माण, निकम्मे
पदार्थों का मल-मूत्र स्वेद आदि से रेचन और शरीर को धारण
करने इत्यादि की क्रियाएं हैं। मनोमय कोष में भी पांचों भूतों से
सम्बन्धित ५ व्यापार हैं और उनकी ६४ किरणें हैं। (देखें श्लोक
१४) वे हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ और वाक् शक्ति की कर्मेन्द्रियों
की क्रियाएं हैं। विज्ञानमय कोष के भी ५ स्तर हैं वे भी पांचों
महाभूतों से सम्बन्धित ५ ज्ञानेन्द्रियों के व्यापार हैं। चारों कोषों
का अन्वय व्यतिरेक द्वारा पारस्परिक सम्बन्ध हैं। आनन्दमय कोष
के तीन गुणों के अनुरूप सात्विक, राजसिक और तामसिक
तीन स्तर हैं; जिनका भेद जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति में देखने में
आता है।
उपरोक्त पांचों कोषों और उनके व्यापारों से तादात्म्य करके
आत्मा जन्म मृत्यु जरा व्याधि शोक मोह के जाल में पडी है।
इस तादात्म्य का कारण माया अथवा अविद्या का तम है। अविद्या
का यह ही रूप है कि अनात्म तत्वों में आत्मभाव, उनकी अनित्यता
में नित्यत्व का भाव, उनके अपवित्र संघातों में पवित्रता का भाव
और उन पर पडने वाली आत्मा के ही आनन्द की छाया की

Page 52Permalink

१२ सौन्दर्य लहरी
तारतम्यता से अनुभव में आने वाले दुखों मे सुख का भाव अर्थात
सर्वथा विपरीतता का आभास उत्पन्न हो जाता है । इस लिये इसे
तम कहते हैं । अष्टधा प्रकृति में आत्मभाव होने के कारण यह
तम भी आठ प्रकार का है । अणिमादि आठ सिद्धियों के लिये
उनका आश्रय लेकर अभिमान करना, अथवा उनमें फंसकर उनका
अहंकार करना आठ प्रकार का मोह है । उक्त आठों सिद्धियों और
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धात्मक दिव्य और सामान्य १० विषयों की
आसक्ति १८ प्रकार का महामोह कहलाता है । फिर उनके
प्रतिबन्धकों से द्वेष करना १८ प्रकार का तामिस्र है, और
उनके भोगने के साधन रूप देह के सदा बने रहने की वृथा इच्छा
करना १८ प्रकार का अन्ध तामिस्र कहलाता है । यह सब अविद्या
की फसल है, इससे निवृत्ति पाने पर तत्वों की शुद्धि कही जाती है ।
विरजा हबन के मंत्रों द्वारा बहिर्यज्ञ करके तत्व शुद्धि की जो
भावना की जाती है, अन्तर्याग द्वारा ही उसकी उपलब्धि होना शक्य
है, जो योग और उपासना का अंग होने के कारण, अन्तःसाधन से
सम्पादित होती है ।
विरजा हवन के मंत्र नीचे दिये जाते हैं:—
१ प्राणा पान व्यानोदान समाना मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासं स्वाहा ।
२ वाङ् मनश्चक्षुः श्रोत्र जिव्हा
घ्राणं रेतो बुद्ध्या स्फूर्ति संकल्पा ” ”
३ त्वक् चर्म मांस रुधीर
मेदो मज्जास्नायवोऽस्थिनि ” ”

Page 53Permalink

सौन्दर्य लहरी १३
मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासं स्वाहा ।
४ शिरः पाणिपाद पार्श्वपृष्ठोरुदर
जङ्घ शिश्नोपस्थ पायवो ” ”
५ उत्तिष्ट पुरुष हरित पिङ्ग—
लोहिताक्ष देहिर ददापयिता ” ”
६ पृथिव्यापस्तेजो वायुगकाशाः ” ’
७ शब्द स्पर्श रूप रस गन्धा ’ ”
८ मनोवाक् काय कर्माणि ” ”
९ अव्यक्त भावैरहंकारै ज्योतिरहं इत्यादि ”
१० आत्मा ” ”
११ अन्तरात्मा ” ”
१२ परमात्मा ” ”
१३ अन्नमय प्राणमय मनोमय
विज्ञानमयमानन्दमयमात्मा ” ”
प्राणायाम द्वारा भी भूत शुद्धि की जाती है । परन्तु वह भी
भावनाप्रधान ही है । उसकी विधि इस प्रकार है:—
१. पिंगला से पूरक करे और हँ बीज के जप सहित यह भावना
करे कि मूलाधार से जीवात्मा को सुषुम्ना पथ द्वारा ब्रह्मरंध्र में
ले जाकर उसका परम शिव से योग कर रहा हूं, फिर कुम्भक
करके ईडा से रेचक कर दे ।
२. ईडा से पूरक करके यं बीज के जप सहित यह भावना
करे कि शरीर सूख गया है और पिंगला से रेचक कर दे ।

Page 54Permalink

१४ · सौन्दर्य लहरी
३. पिंगला से पूरक करके रं बीज के जप सहित यह भावना
करे कि शरीर भस्म होगया है, कुम्भक करके ईडा से रेचक करे ।
४. ईडा से पूरक करके वं बीज सहित यह भावना करे कि
सहस्रार से अमृत स्राव हो रहा है, फिर कुम्भक करके पिंगला से
रेचक कर दे, वं बीज के जप सहित यह प्राणायाम करना चाहिये ।
५. पिंगला से पूरक करे और लं बीज के जप सहित यह
भावना करे कि दिव्य देह उत्पन्न होगया है । लं बीज के सहित
कुम्भक करके इडा से रेचक कर दे ।
६. इडा से पूरक करे और यह भावना करे कि शिव से
एकीभूत जीव पुनः मूलाधार में उतर आया है । 'हंसः सोहं' के
जप सहित यह प्राणायाम करना चाहिये ।
आधुनिक वेदान्त वादियों में प्रायः देखने में आता है कि वे
[ज्ञान के पूर्व योग] योग और उपासना की अवहेलना करते हैं, और
[और उपासना] केवल महावाक्यों का श्रवण, मनन और निदि-
[की आवश्यकता] ध्यासन मात्र अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति के लिये
पर्याप्त समझते हैं । उनके मतानुसार योग उपासना
में समय नष्ट करना वृथा है; क्योंकि वे ज्ञान के साधन नहीं होते ।
ज्ञान महावाक्यज ज्ञान ही है और उसकी उपलब्धि महावाक्यों के ·
विचार द्वारा हो सकती है । परन्तु शास्त्रों के अवलोकन से उनकी
यह धारणा भ्रमात्मक सिद्ध होती है । यह बात तो सत्य है कि
महावाक्यों के श्रवण, मनन और निदिध्यासन द्वारा ही ब्रह्मात्मैक्य
ज्ञान का उदय होगा; परन्तु श्रवण, मनन और निदिध्यासन के

Page 55Permalink

सौंदर्य लहरी २५
वे ही लोग अधिकारी हैं, जिनके कषाय परिपक्व हो चुके हैं।
यह बात वे भूल जाते हैं कि कषाय परिपक्व होने के लिये योग
और उपासना ही अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। "अथा तो
ब्रह्म जिज्ञासा" ब्रह्मसूत्र के इस प्रथम सूत्र के भाष्य में 'अथ'
शब्द पर भाष्यकार श्री मच्छंकर भगवत्पाद लिखते हैं कि ब्रह्म
जिज्ञासा के उपदेश के पहिले कुछ भी साधन तो आवश्यक होना
चाहिये, जो 'अथ' शब्द से निर्दिष्ट है वह क्या है ? वह है
नित्यानित्य विवेक, इह और परलोक के भोगों से वैराग्य, शम,
दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और .समाधान की षट सम्पत्ति और
मोक्ष की इच्छा। इस साधन चतुष्टय के पश्चात. श्रवण, मनन,
निदिध्यासन का अधिकार प्राप्त होता है। 'अभ्यास वैराग्याभ्यां
तन्निरोध' योग दर्शन के इस सूत्र में भी विवेक और वैराग्य दोनों
का सर्व प्रथम स्थान है। इस सूत्र पर व्यास भाष्य पढने योग्य है
वहां नित्यानित्य विवेक को ही अभ्यास बताया गया है। शम,
अर्थात मनोनिरोध के लिये अभ्यास और वैराग्य दोनों प्रथम साधन
है। भगवान ने भी गीता में ऐसा ही उपदेश किया है:—
"अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते" (गीता ६.३५)
अभ्यास और वैराग्य के साथ साथ ईश्वर प्रणिधान भी आवश्यक है।
'ईश्वर प्रणिधानाद्वा' सूत्र में ईश्वर प्रणिधान को मनोनिरोध का
दूसरा मुख्य साधन कहा है। इस लिये योग के साथ उपासना की
भी आवश्यकता होती है। योग दर्शन में ईश्वर प्रणिधान का उपदेश
तीन स्थानों पर किया गया है और उनका फल भी भिन्न बताया
गया है। प्रथम ईश्वर प्रणिधानाद्वा, इस सूत्र में अभ्यास वैराग्य के

Page 56Permalink

६ सौन्दर्य लहरी
थ ईश्वर प्रणिधान का फल, मनोनिरोध रूपी शम है। दूसरे
मान पर “तपः स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि क्रिया योग” (२-१)
तप और स्वाध्याय के साथ ईश्वर प्रणिधान का फल समाधि के
ल्ये भूमिका तैयार करता है, और अविद्या आदि क्लेशों को तनु
रता है। तीसरी जगह “शौचसन्तोषतपः स्वाध्यायेश्वर प्रणि-
ानानि नियमः” में ईश्वर प्रणिधान के पूर्व तप और स्वाध्याय के
थ शौच और सन्तोष और बढा दिये गये हैं, जिनसे युक्त ईश्वर
णिधान का फल समाधि की सिद्धि है। “समाधि सिद्धिरीश्वर
णिधानात्”। दम इंद्रिय निग्रह को कहते हैं। उपरति का अर्थ
िषयों से हट कर वृत्ति का अन्तर्मुखी होना है, जिसको प्रत्याहार
हते हैं। ये अष्टांग योग का पांचवा अंग है। उपरति के साथ
ख दुःख के सम रहने का साधन तितिक्षा कहलाता है। गुरु और
ास्त्रों में श्रद्धा सहित मन की स्वाभाविक एकाग्र अवस्था का उदय
ोना समाधान कहलाता है। इनके पश्चात मोक्ष की इच्छा होती
। तब ब्रह्म जिज्ञासा की क्षुधा लगने पर साधक महावाक्यों के
वण का अधिकारी बनता है। “शान्तौ दान्त उपरस्तितिक्षुः
माहितो भूत्वाऽत्मन्येवात्मन पश्यति” (बृह ४, ४, २३) इस
ृति के आधार पर ब्रह्म-जिज्ञासा के लिये उपरोक्त षट्सम्पत्ति
ी आवश्यकता बताई गई है। जिसका फल आत्म दर्शन है, और
ात्म दर्शन के पश्चात ब्रह्म जिज्ञासा उत्पन्न होती है। यह बात
ोचे दी हुई श्रुति से स्पष्ट हो जाती हं:—
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मंतव्यो निदिध्यासितव्यो
मैत्रेय्यात्मनि खल्वरे द्रष्टे श्रुते मते विज्ञात इदं सर्वं
विदितम्” (बृह ४ ५ ६)

Page 57Permalink

सौंदर्य लहरी १७
इस श्रुति में श्रवण, मनन और निदिध्यासन के पूर्व दर्शन
वाचक भी शब्द हैं, अर्थात श्रवण मनन और निदिध्यासन के पूर्व
आत्मदर्शन होना जरूरी है जो षट सम्पत्ति के साधन से हो सकेगा।
आत्मदर्शन होने के पश्चात मार्ग सरल हो जाता है । यह दर्शन
प्रज्ञान आत्मा का दर्शन है । जब गुरू उपदेश करता है-“ अयं आत्मा
ब्रह्म तत्वमसि ” । अर्थात प्रज्ञात्म दर्शन के पश्चात महावाक्यों के
उपदेश से साधक जानता है कि यही आत्मा जिसका उसने दर्शन
किया है ब्रह्म है । इस बात का युक्ति और न्याय के आधार पर
निश्चय करता है, जिसको मनन कहते हैं । और फिर एकाग्र चित्त
से उसी पर सदा अपना लक्ष रखता हुवा ‘ अहं ब्रह्मास्मि ’ का साधन
करता है, यही निदिध्यासन है । ‘ द्रष्टव्यः ’ शब्द का लक्ष्य आत्मा
है जो महावाक्यों के उपदेश के पूर्व द्रष्टा को अपने स्वरूप का लक्ष
कराता है और पश्चात ब्रह्म का लक्ष करा कर ब्रह्मात्मैक ज्ञान का
साधन बन जाता है ।
हम इस बात को उपर समझा आये हैं कि योग का साधन भी
ईश्वर प्रणिधान रूपी साधना के बिना समाधि की उपलब्धि के लिये
पूर्ण नहीं है । उपासना और योग दोनों साथ साथ रहते हैं। एक दूसरे
के बिना अपूर्णता का अनुभव करता है । श्रीमच्छंकर भगवतपाद् ने
तो सौंदर्य लहरी में कुण्डलिनी योग को प्रधानता देकर, उपासना और
योग की एकता ही सिद्ध कर दी है, जो योग की एक तांत्रिक योग
पद्धति है । उसका फल है शिव सायुज्य पदवी । देखें श्लोक २२ ।
शून्य एक निषेधात्मक शब्द है, और पूर्ण में सर्वात्मिता का
ज्ञानयोग और भाव है । यदि बिन्दु को अभाव वाचक समझें
भावयोग तो अभाव पर अभाव कितना भी बढाया

Page 58Permalink

१८
सौंदर्य लहरी


जाय, वह सदा अभाव ही रहेगा । अभाव अथवा सर्वथा
विशेषण युक्त अभाव में केवल विकल्प मात्र की प्रतिध्वनि
दिखती है । अनन्त बिन्दुओं को एकत्रित करने पर भी क्या
कभी कोई संख्याबन सकती है ? फिर किसी संख्या पर उस
अभावात्मक बिन्दु को रख देने से उस संख्या का मूल्य क्यों
बढना चाहिये ? एक पर एक बिन्दु रखने से उसका भूल्य दस
गुणा हो जाता है, क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है ? इसलिये
वह बिन्दु शून्य नहीं वरन पूर्ण है । एक पर एक बिन्दु रखने से
उसमें दस की पूर्णता समझी जाती है, और दो बिन्दु लगाने से
वह दुबारा दस की पूर्णता प्रदान करती है, अर्थात प्रत्येक बिन्दु की
वृद्धि से पूर्णता की वृद्धि होती जाती है, परन्तु शून्य तो सदा शून्य
ही है । इसलिये यह कहना अधिक सत्य प्रतीत होता है कि, जिसे
शून्य कहते हैं, उस बिन्दु का मूल्य, अभाव नहीं, वरन पूर्ण है ।
यदि पूर्ण पर पूर्ण जोड कर उसका मूल्य बढ़ जाय तो प्रथम पूर्ण
की अपूर्णता सिद्ध होती है । क्योंकि अनेक पूर्ण नहीं हो सकते,
पूर्ण एक ही होना सम्भव है, इसलिये अनेक बिन्दुओं को एकत्रित
करने से उनका संग्रह पूर्णता से अतिरिक्त किसी संख्या का निर्माण
नहीं कर सकता और प्रत्येक संख्या अपूर्ण वाच्य ही है, क्योंकि
पूर्ण की कोई संख्या अथवा गणना नहीं की जा सकती, इसलिये
बिन्दु शून्य नहीं वरन पूर्ण है । और संख्यायें सब अपूर्ण हैं । गणित
विज्ञान का यह सिद्धांत अखिल विश्व पर लागू है । जहां तक नाम
रूपों के भेदों की गिनती की जा सकती, वह पूर्ण नही कहला सकता
और पूर्ण की पूर्णता को हमारी बुद्धि नहीं समझ सकती, क्योंकि उस

Page 59Permalink

सौंदर्य लहरी १९

बुद्धि का ज्ञान स्वयं अपूर्ण है । इसलिये हम उसे शून्य कहते हैं ।
अभाव का अर्थ भी साधारण भाषामें किसी नामरूपके अभाव का ही
द्योतक है । जैसे हमारे पास घडा नहीं है, इसका अर्थ इतना मात्र
है कि हमारे पास घडे की आकृति धारण किये हुये मृतिका का
एक रूप नही है । जब विश्व के सब नाम रूपों के अभाव की
कल्पना की जाती है, तो उसे हम शून्य कहते हैं । परन्तु वास्तव
में क्या वह अभावात्मक शून्य है ? नहीं वरन आदि कारण की
पूर्णता का भाव उसमें निहित है । जैसे सिनेमा के पर्दे की तस्वीरें
लुप्त होने पर पूर्ण पर्दा दृष्टिगोचर होने लगता है । इसी तरह विश्व
के नाम रूपों के अभाव में उसके एकमात्र आधार का, जो पूर्ण है,
अनुभव होता है; दर्शन उसको विकार रहित पूर्ण-ब्रह्म कहते हैं ।
उसकी पूर्णता के कारण ही, विश्व का प्रत्येक नाम रूपात्मक अंग,
अपने स्थान पर सत्य और पूर्ण प्रतीत होता है । अभाव का ही दूसरा
नाम असत्य भी है, जो बात अथवा घटना जैसी हो वैसी ही न कही
या समझी जाय वह असत्य कहलाती है । प्रत्येक वस्तु का यथार्थ
ज्ञान सत्य कहलाता है, परन्तु उसकी संख्या, गणना अथवा सीमा
बद्ध होनेसे वह ज्ञान अल्प हो जाता है, और निरपेक्ष अनन्त-ज्ञान
यद्यपि सत्य है, तो भी बुद्धि की समझ के बाहर का विषय होने से
समझ में नहीं आता है । यह रूप है उस पूर्ण परमात्मा का, जिसको
वेद 'सत्य ज्ञानं अनंतं ब्रह्म' कह कर व्याख्या करते हैं । अर्थात उस
बृहत् अनंत सत्य ज्ञान को ईश्वर कहते हैं । वह ही पूर्ण बिन्दु है ।
इसलिये एक मत के दार्शनिक विद्वान उसे परबिन्दु भी कहते हैं ।
परन्तु वह ऐसा गोलाकार बिन्दु है जिसका केन्द्र सर्वत्र है परन्तु
सीमांत कहीं भी नहीं । उसका अनुभव साधारण-जन सुषुप्ति में

Page 60Permalink

२० सौंदर्य लहरी
करते हैं और योगिजन समाधि में; परन्तु उसके सौंदर्य की द्युति
सर्वत्र है और उसको सौंदर्य की लहरी में आनन्द की लहर का योगी
उपासक अपने अन्तर में अनुभव करते हैं। क्योंकि सौंदर्य का भाव,
अधिभौतिक प्रायः दृष्टिगोचर होता है। परन्तु उसकी अध्यात्म
प्रतिक्रिया आनन्द में व्यक्त हुआ करती है। हम तीन स्तरों पर
एक ही तत्व की अनुभूति इस प्रकार करते हैं। प्रथम स्तर पर वह
परमतत्व अद्वैत अक्षर परम ब्रह्म कहलाता है। जगत में उसकी
अधिभूता अभिव्यक्ति के सौंदर्य की मोहात्मिका शक्ति का विकास
है और अध्यात्म पर आनन्द लहरी का। हम कह चुके हैं कि
नामरूपात्म जगत, आदि सत् शक्ति की परिणति है और उसके सौंदर्य
में उसी आधिदेवी की सौंदर्य लहरी झलक रही है। इस दृष्टि से
प्रथम ४१ श्लोकों का पूर्वार्ध जो अध्यात्म विद्या परक है-आनन्द
लहरी नाम से संज्ञित किया गया है। आठवें श्लोक में चिदानन्द-
लहरी और २१वें श्लोकोक्त परमानंद लहरी पद इस बात के स्पष्ट
संकेत हैं; और अंतिम उत्तरार्ध विराट विश्व में आदि कारणभूता
शक्ति जगज्जननी के मुख की सुन्दर झांकी दिखाता है। जैसा कि
४४वें श्लोकोक्त 'तव वदन सौंदर्यलहरी' पद से स्पष्ट है, आधि-
भौतिक रूप, आधिदैव की ओर लक्ष्य कराता है। और ३५वे
श्लोक में पिण्ड और ब्रह्मांड की एक समानता दिखाने के अभिप्राय
से कहा गया है कि दोनों एक चिदान्-द के ही परिणाम मात्र है।
क्योंकि यह देह आधिभौतिक तत्वों का ऐसा संघात है, जिसमें
परम और अध्यात्म दोनों ही भावों की उपलब्धि होती है। जिनका
प्रत्यक्षोकरण अध्यात्म विद्या का विषय है। परम तत्व का ज्ञेयत्व
दो भावों से प्राप्त होता है और उसकी अनुभूति अध्यात्म स्तर पर

Page 61Permalink

सौंदर्य लहरी ९१
ही की जाती है । उक्त दोनों भावों को हम इन दो नामों के
सम्बन्ध से स्पष्ट समझ सकते हैं । प्रथम 'सच्चिदेकं ब्रह्म' और दूसरा
'सच्चिदानन्द ब्रह्म' प्रथम पद में सद्ब्रह्म के एक प्रज्ञानघन भाव की
प्रकर्षता का प्रत्याभास प्रस्फुटित होता है और दूसरे पद में चिदा-
नंदघन भाव की प्रधानता का । इस प्रकार अध्यात्म विद्या के दो
फांटे हो जाते है, प्रथम को ज्ञान मार्ग और दूसरे को भक्ति मार्ग
कहते हैं; जिनका वर्णन भगवान ने गीता के १२वें अध्याय के
२-४ श्लोकों में भी किया है, और प्रथम ज्ञान मार्ग को क्लिष्टतर
बताकर दूसरे मार्ग की प्रशंसा की है किः—
“मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते” (गीता १२–२)
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ (गी. १२–७)
यहां मय्यावेश्य मनः अथवा मय्यावेशित चेतस् से आनन्द के
आबेश का ही अभिप्राय है । क्यों कि ज्ञान का आवेश नहीं हो
सकता । आबेश सदा आनन्द का ही हुवा करता है । ज्ञान मार्ग
'अहं ब्रह्मास्मि', 'अयमात्मा ब्रह्म', 'प्रज्ञानं ब्रह्म', 'तत्वमसि'
महावाक्य के श्रवण, मनन, निदिध्यासन का मार्ग है । और दूसरा
योग का मार्ग है, उस योग का जिसमे प्रत्यगात्मा के आनन्दाबेश
से अहंवृत्ति का तादात्म्य किया जाता है । इन दोनों मार्गों को ज्ञान
योग और भाव योग भी कहते हैं । प्रथम में शिव तत्त्व की और
दूसरे में शक्ति तत्त्व की प्रधानता समझनी चाहिये । वैष्णव सम्प्रदायों
में भी राधा तत्त्व, शक्ति तत्त्व, आनन्दाबेश प्रधान है और सब