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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 54 of 415

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Page 54

१४ · सौन्दर्य लहरी
३. पिंगला से पूरक करके रं बीज के जप सहित यह भावना
करे कि शरीर भस्म होगया है, कुम्भक करके ईडा से रेचक करे ।
४. ईडा से पूरक करके वं बीज सहित यह भावना करे कि
सहस्रार से अमृत स्राव हो रहा है, फिर कुम्भक करके पिंगला से
रेचक कर दे, वं बीज के जप सहित यह प्राणायाम करना चाहिये ।
५. पिंगला से पूरक करे और लं बीज के जप सहित यह
भावना करे कि दिव्य देह उत्पन्न होगया है । लं बीज के सहित
कुम्भक करके इडा से रेचक कर दे ।
६. इडा से पूरक करे और यह भावना करे कि शिव से
एकीभूत जीव पुनः मूलाधार में उतर आया है । 'हंसः सोहं' के
जप सहित यह प्राणायाम करना चाहिये ।
आधुनिक वेदान्त वादियों में प्रायः देखने में आता है कि वे
[ज्ञान के पूर्व योग] योग और उपासना की अवहेलना करते हैं, और
[और उपासना] केवल महावाक्यों का श्रवण, मनन और निदि-
[की आवश्यकता] ध्यासन मात्र अपरोक्ष ज्ञान की प्राप्ति के लिये
पर्याप्त समझते हैं । उनके मतानुसार योग उपासना
में समय नष्ट करना वृथा है; क्योंकि वे ज्ञान के साधन नहीं होते ।
ज्ञान महावाक्यज ज्ञान ही है और उसकी उपलब्धि महावाक्यों के ·
विचार द्वारा हो सकती है । परन्तु शास्त्रों के अवलोकन से उनकी
यह धारणा भ्रमात्मक सिद्ध होती है । यह बात तो सत्य है कि
महावाक्यों के श्रवण, मनन और निदिध्यासन द्वारा ही ब्रह्मात्मैक्य
ज्ञान का उदय होगा; परन्तु श्रवण, मनन और निदिध्यासन के