सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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बुद्धि का ज्ञान स्वयं अपूर्ण है । इसलिये हम उसे शून्य कहते हैं ।
अभाव का अर्थ भी साधारण भाषामें किसी नामरूपके अभाव का ही
द्योतक है । जैसे हमारे पास घडा नहीं है, इसका अर्थ इतना मात्र
है कि हमारे पास घडे की आकृति धारण किये हुये मृतिका का
एक रूप नही है । जब विश्व के सब नाम रूपों के अभाव की
कल्पना की जाती है, तो उसे हम शून्य कहते हैं । परन्तु वास्तव
में क्या वह अभावात्मक शून्य है ? नहीं वरन आदि कारण की
पूर्णता का भाव उसमें निहित है । जैसे सिनेमा के पर्दे की तस्वीरें
लुप्त होने पर पूर्ण पर्दा दृष्टिगोचर होने लगता है । इसी तरह विश्व
के नाम रूपों के अभाव में उसके एकमात्र आधार का, जो पूर्ण है,
अनुभव होता है; दर्शन उसको विकार रहित पूर्ण-ब्रह्म कहते हैं ।
उसकी पूर्णता के कारण ही, विश्व का प्रत्येक नाम रूपात्मक अंग,
अपने स्थान पर सत्य और पूर्ण प्रतीत होता है । अभाव का ही दूसरा
नाम असत्य भी है, जो बात अथवा घटना जैसी हो वैसी ही न कही
या समझी जाय वह असत्य कहलाती है । प्रत्येक वस्तु का यथार्थ
ज्ञान सत्य कहलाता है, परन्तु उसकी संख्या, गणना अथवा सीमा
बद्ध होनेसे वह ज्ञान अल्प हो जाता है, और निरपेक्ष अनन्त-ज्ञान
यद्यपि सत्य है, तो भी बुद्धि की समझ के बाहर का विषय होने से
समझ में नहीं आता है । यह रूप है उस पूर्ण परमात्मा का, जिसको
वेद 'सत्य ज्ञानं अनंतं ब्रह्म' कह कर व्याख्या करते हैं । अर्थात उस
बृहत् अनंत सत्य ज्ञान को ईश्वर कहते हैं । वह ही पूर्ण बिन्दु है ।
इसलिये एक मत के दार्शनिक विद्वान उसे परबिन्दु भी कहते हैं ।
परन्तु वह ऐसा गोलाकार बिन्दु है जिसका केन्द्र सर्वत्र है परन्तु
सीमांत कहीं भी नहीं । उसका अनुभव साधारण-जन सुषुप्ति में