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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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सौंदर्य लहरी ९
अज्ञान से उत्पन्न होने वाला भ्रम पांच प्रकार का
पांच प्रकार होता है ।
का भ्रम और
तीन प्रकार का मल
जीवेश्वरौ भिन्नरूपौ इति प्रथमः,
आत्मनिष्ठं कर्तृगुणं वास्तवं वा द्वितीयकः,
शरीरत्रय- संयुक्तजीवः संगी तृतीयकः,
जगत्कारण- रूपस्यावेकारित्वं चतुर्थकः,
कारणाद्भिन्नजगतः सत्यत्वं पंचमों भ्रमः
( अन्नपूर्णोपनिषत् )
जीव ब्रह्म का भेद पहला भ्रम है । आत्मा में कर्ता भोक्तापन वास्तविक
है या नही, यह दूसरा भ्रम है । स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों
शरीरों के संयोग से इतरेत्तर अध्यास के कारण आत्मा संगी हो गया
है, यह तीसरा भ्रम है। प्रथम मायामल, दूसरा कर्तामल और तीसरा
आणव मल कहलाता है । चौथा और पांचवा भ्रम दोनों जगत और
उसके अभिन्न निमित्तोपादान कारण-ब्रह्म सम्बन्धी हैं । पहिला भ्रम
जगत के कारणस्वरुप अपरिणामी ब्रह्म तत्व में विकारीपन की प्रतीति
कराता है, और दूसरा, कारण और कार्य में भेद बुद्धि उत्पन्न कराता
है । मायामल, कर्तामल और आणव मल की निवृति कुण्डलिनी शक्ति
के जागरणोपरांत षट् चक्र वेध द्वारा तत्व शुद्धि होने पर होती है ।
तत्व ३६ हैं जिनका वर्णन आगे आयगा । उनमें पांच युद्ध तत्व;
सात शुद्धाशुद्ध तत्व और चौबीस अशुद्ध तत्व होते हैं । प्रथम
पांच शुद्ध तत्वों को छोडकर शुद्धि शेष इकतीस तत्वों की होती है,