सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
Page 61 of 415
Read in contextसौंदर्य लहरी ९१
ही की जाती है । उक्त दोनों भावों को हम इन दो नामों के
सम्बन्ध से स्पष्ट समझ सकते हैं । प्रथम 'सच्चिदेकं ब्रह्म' और दूसरा
'सच्चिदानन्द ब्रह्म' प्रथम पद में सद्ब्रह्म के एक प्रज्ञानघन भाव की
प्रकर्षता का प्रत्याभास प्रस्फुटित होता है और दूसरे पद में चिदा-
नंदघन भाव की प्रधानता का । इस प्रकार अध्यात्म विद्या के दो
फांटे हो जाते है, प्रथम को ज्ञान मार्ग और दूसरे को भक्ति मार्ग
कहते हैं; जिनका वर्णन भगवान ने गीता के १२वें अध्याय के
२-४ श्लोकों में भी किया है, और प्रथम ज्ञान मार्ग को क्लिष्टतर
बताकर दूसरे मार्ग की प्रशंसा की है किः—
“मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते” (गीता १२–२)
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ (गी. १२–७)
यहां मय्यावेश्य मनः अथवा मय्यावेशित चेतस् से आनन्द के
आबेश का ही अभिप्राय है । क्यों कि ज्ञान का आवेश नहीं हो
सकता । आबेश सदा आनन्द का ही हुवा करता है । ज्ञान मार्ग
'अहं ब्रह्मास्मि', 'अयमात्मा ब्रह्म', 'प्रज्ञानं ब्रह्म', 'तत्वमसि'
महावाक्य के श्रवण, मनन, निदिध्यासन का मार्ग है । और दूसरा
योग का मार्ग है, उस योग का जिसमे प्रत्यगात्मा के आनन्दाबेश
से अहंवृत्ति का तादात्म्य किया जाता है । इन दोनों मार्गों को ज्ञान
योग और भाव योग भी कहते हैं । प्रथम में शिव तत्त्व की और
दूसरे में शक्ति तत्त्व की प्रधानता समझनी चाहिये । वैष्णव सम्प्रदायों
में भी राधा तत्त्व, शक्ति तत्त्व, आनन्दाबेश प्रधान है और सब