सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in context१२ सौन्दर्य लहरी
तारतम्यता से अनुभव में आने वाले दुखों मे सुख का भाव अर्थात
सर्वथा विपरीतता का आभास उत्पन्न हो जाता है । इस लिये इसे
तम कहते हैं । अष्टधा प्रकृति में आत्मभाव होने के कारण यह
तम भी आठ प्रकार का है । अणिमादि आठ सिद्धियों के लिये
उनका आश्रय लेकर अभिमान करना, अथवा उनमें फंसकर उनका
अहंकार करना आठ प्रकार का मोह है । उक्त आठों सिद्धियों और
शब्दस्पर्शरूपरसगन्धात्मक दिव्य और सामान्य १० विषयों की
आसक्ति १८ प्रकार का महामोह कहलाता है । फिर उनके
प्रतिबन्धकों से द्वेष करना १८ प्रकार का तामिस्र है, और
उनके भोगने के साधन रूप देह के सदा बने रहने की वृथा इच्छा
करना १८ प्रकार का अन्ध तामिस्र कहलाता है । यह सब अविद्या
की फसल है, इससे निवृत्ति पाने पर तत्वों की शुद्धि कही जाती है ।
विरजा हबन के मंत्रों द्वारा बहिर्यज्ञ करके तत्व शुद्धि की जो
भावना की जाती है, अन्तर्याग द्वारा ही उसकी उपलब्धि होना शक्य
है, जो योग और उपासना का अंग होने के कारण, अन्तःसाधन से
सम्पादित होती है ।
विरजा हवन के मंत्र नीचे दिये जाते हैं:—
१ प्राणा पान व्यानोदान समाना मे शुध्यन्तां ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा
भूयासं स्वाहा ।
२ वाङ् मनश्चक्षुः श्रोत्र जिव्हा
घ्राणं रेतो बुद्ध्या स्फूर्ति संकल्पा ” ”
३ त्वक् चर्म मांस रुधीर
मेदो मज्जास्नायवोऽस्थिनि ” ”