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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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६ सौन्दर्य लहरी
वेदान्त का निदिध्यासन ही है। जीव ब्रह्मैक्यज्ञान तो वाणी से
कथन मात्र का ज्ञान अथवा बुद्धि की समझ का परोक्ष ज्ञान नहीं,
वह तो ध्यान की वह भूमिका है जिस पर आरूढ होने पर जीव की
अहँ वृत्ति में देहाभिमान की वृत्ति तनु होकर ब्रह्म वृत्ति बढने
लगती है, अहंकार को भगवान के चरणों में समर्पण करके मन
उपास्य देव से तल्लीनता प्राप्त कर लेता है। ऐसे दृढ भावना युक्त
ध्यान अथवा अनन्य चिंतन का फल ही तत्त्व दर्शन है। उपासना
के अन्तरंग स्तरों पर प्रगति होने के साथसाथ बाह्य कर्म-कांड का
आडम्बर स्वयं छूटने लगता है।
यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥
(गीता ३. १७)
सौन्दर्य लहरी का विषय तो भगवती का स्तवन ही है। परन्तु
उसकी शैली ऐसी है कि स्तुति के बहाने प्रथम ४१ श्लोकों में श्री
विद्या के रहस्य, हादि कादि विद्या का उद्धरण, षट्-चक्र-वेध का
प्रकरण. ग्रंथि त्रय का वर्णन इत्यादि साधनोपायों का दिग्दर्शन
कराकर जीव ब्रह्म की एकता पर साधक का लक्ष्य कराया गया है,
उक्त साधन-क्रम को तीन स्तरों में बांटा जाता है, जिनकी दीक्षा
के लिये किसी समर्थ गुरु की शरण लेनी पडती है, क्योंकि साधन
का रहस्य पुस्तकों के पढने से नही मिलता ! वह गुरु कृपा का ही
विषय है, और गुरु की कृपा ही दीक्षा तत्त्व है।