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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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२ सौंदर्य लहरी
सत् चित् आनन्द से अभिव्यक्त होने वाली चिति अर्थात चिन्मयी
शक्ति के साथ समन्वय करके अद्वैतवाद का ही प्रतिपादन किया
गया है। स्थूल बहिर्दृष्टि रखने वाले उपासकों का उपास्यदेव बहुधा
किसी न किसी रूप में व्यक्तित्व की भावना की प्रधानता लिये
होता है, परन्तु एक दार्शनिक का दृष्टिकोण, जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म
स्तरों पर अपना लक्ष्य रखता है, उपासक के मूर्तिमान एकदेशीय
व्यक्तिमापन्न रूप से सन्तुष्ट नहीं होता, वह सदा दोनों का समन्वय
करने का यत्न किया करता है। जैसा कि श्री भगवान स्वयं
गीता में कहते हैं:—
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ ( गीता ७-२४ )
अर्थ:—बुद्धिहीन मनुष्य मुझ अव्यक्त को व्यक्तिमापन्न
मानते हैं। क्योंकि वे मेरे उत्तम अव्यय परं भाव को नहीं जानते !
सौन्दर्य लहरी को पढने से यह बात स्पष्ट दिखने लगती है।
ब्रह्म अक्षर है, अर्थात उसमें कभी किसी प्रकार का परिणाम
नहीं होता, वह अपरिणामी, अव्यय, अविनाशी
शिव शक्ति है, परन्तु जगत के सृष्टि स्थिति संहार का अभिन्न-
निमित्तोपादान कारण भी है, इसलिये सर्वशक्तिमान है। शक्ति
शक्तिमान से भिन्न नहीं कही जा सकती और न वह शक्तिमान से
पृथक ही हो सकती है, यद्यपि सब कर्म शक्ति की ही क्रिया से
सम्पादित होते हैं। अर्थात शक्ति ही सारे जगत का कारण है,
तो भी शक्तिमान की शक्ति शक्तिमान की इच्छा के ही आधीन