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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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सौंदर्य लहरी २५
वे ही लोग अधिकारी हैं, जिनके कषाय परिपक्व हो चुके हैं।
यह बात वे भूल जाते हैं कि कषाय परिपक्व होने के लिये योग
और उपासना ही अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। "अथा तो
ब्रह्म जिज्ञासा" ब्रह्मसूत्र के इस प्रथम सूत्र के भाष्य में 'अथ'
शब्द पर भाष्यकार श्री मच्छंकर भगवत्पाद लिखते हैं कि ब्रह्म
जिज्ञासा के उपदेश के पहिले कुछ भी साधन तो आवश्यक होना
चाहिये, जो 'अथ' शब्द से निर्दिष्ट है वह क्या है ? वह है
नित्यानित्य विवेक, इह और परलोक के भोगों से वैराग्य, शम,
दम, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा और .समाधान की षट सम्पत्ति और
मोक्ष की इच्छा। इस साधन चतुष्टय के पश्चात. श्रवण, मनन,
निदिध्यासन का अधिकार प्राप्त होता है। 'अभ्यास वैराग्याभ्यां
तन्निरोध' योग दर्शन के इस सूत्र में भी विवेक और वैराग्य दोनों
का सर्व प्रथम स्थान है। इस सूत्र पर व्यास भाष्य पढने योग्य है
वहां नित्यानित्य विवेक को ही अभ्यास बताया गया है। शम,
अर्थात मनोनिरोध के लिये अभ्यास और वैराग्य दोनों प्रथम साधन
है। भगवान ने भी गीता में ऐसा ही उपदेश किया है:—
"अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते" (गीता ६.३५)
अभ्यास और वैराग्य के साथ साथ ईश्वर प्रणिधान भी आवश्यक है।
'ईश्वर प्रणिधानाद्वा' सूत्र में ईश्वर प्रणिधान को मनोनिरोध का
दूसरा मुख्य साधन कहा है। इस लिये योग के साथ उपासना की
भी आवश्यकता होती है। योग दर्शन में ईश्वर प्रणिधान का उपदेश
तीन स्थानों पर किया गया है और उनका फल भी भिन्न बताया
गया है। प्रथम ईश्वर प्रणिधानाद्वा, इस सूत्र में अभ्यास वैराग्य के