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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages
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२६४ सौंदर्य लहरी


अर्थः— हे तुहिन गिरि अर्थात् हिमाचल के वंश की
ध्वजा की पताके । तेरे नाक का यह बांस हमको शीघ्र उचित
फल का देने वाला हो । अथवा उसपर हमारे लिये उचित फल
लगे । क्योंकि उसके भीतर तेरे अति शीतल निश्वासों से मोती
बन रहे हैं, और उनकी वायें नथने में इतनी समृद्धि है कि एक
मुक्तामणि बाहर भी दिखा रहा है । यहां नथ के मोती से
अभिप्राय है जो बायें नाक में पहनी जाती है ।
वंश द्व्यर्थवाचक शब्द है बांस और कुल । हिमाचल पर
लगे हुए बांस पर ध्वजा फहराई जाय, तो उसकी पताका के सदृश
भगवती की उपमा है, दूसरे अर्थ में भगवती को हिमालय के कुल
की ध्वजपताका सदृश कहा गया है । बांस में फल नहीं लगते,
परन्तु उसके अन्दर मोतियों की उत्पत्ति कही जाती है । 'मुक्ता'
शब्द भी द्व्यर्थवाचक है, मोती को मुक्ता कहते हैं और जीवन
मुक्त पुरुष भी मुक्त कहलाते हैं । बांस में मोती होते हैं और कुल
में मुक्त पुरुष उत्पन्न होते हैं । शंकर भगवत्पाद प्रार्थना करते हैं
के तेरी नासिका रूपी बांस में हमारे लिये उचित फल लगें और
उनकी समृद्धि भी हो । परन्तु जैसे बांस में फल नहीं लगते, और
उसके भीतर पोल में मोतियों का उत्पन्न होना सुना जाता है, उसी
प्रकार भगवती की नासिका वत् श्रेष्ट कुल में अर्थात् भगवती के
उपासक संप्रदाय में मुक्त पुरुषों की उत्पत्ती होती है, जिसका उचित
फल मुक्ति है । और भगवती के कर्ण फूलों (ताटंको) की झंकार
रूपी प्रणवोपासना से उनकी समृद्धि होती है । फल का अर्थ

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सौंदर्य लहरी २६५
कामना की पूर्ति के लिये किया जाना है। शंकर भगवत्पाद एक
संन्यासी होने के नाते त्यक्त काम थे, जो दारैषणा, वित्तैषणा,
लोकैषणा सब ही इच्छाओं से विनिर्मुक्त थे, उन को उचित फल
की इच्छा परोपकारार्थ और संसारी जीवों की मुमुक्षा के अतिरिक्त
क्या हो सकती थी। अपिच वे स्वयं नासिका के बाहर लगे हुए
नथ के मोती के सदृश स्वयं एक मुक्त पुरुष थे, इस लिये उनकी
प्रार्थना का भाव यह ही था, कि भगवती की उपासक परंपरा में
सदा जीवन्मुक्तों की समृद्धि होती रहे।
हिमगिरी कन्या का निश्वास भी हिमवत् शीतल होना चाहिये,
जिस के स्पर्श से तुरन्त ओसकण जमकर मुक्तामणियों के सदृश
जमजाते हैं। तद्वत् मानो चन्द्र अथवा ईडा नाडी के वाम
नासापुट से जिस पर नथ पहिनी जाती है, टपकने वाले जल
कण जमकर मोती बन गए हैं, जो नथ पर दृष्टिगोचर होरहे हैं,
यद्यपि नासा वंश में निहित न जाने कितने मुक्ता होसकते हैं।
शीतल निश्वास से परम शान्ति का भी अभिप्राय है, जिसके स्पर्श
मात्र से मनुष्य जीवन मुक्त हो जाता है।
कर्ण फूलों की प्रणव रूपी झंकार से अन्तर्नाद का भी
अभिप्राय होसकता है, जो सरस्वती के शिवस्तवन की एक प्रति
ध्वनि कही जा सकती है।
हिन्दी की एक उक्ति है कि केला बिच्छु बांस अपने फले
नाश, अर्थात् केला बिच्छु और बांस को फल लगने से वे नष्ट
होजाते हैं। इसलिये भगवती के नासावंश में फल न लगाकर,

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२६६ सौंदर्य लहरी
उसके भीतर मोतियों की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है, जिन की
सदा समृद्धि होती रहती है और वह वंश अनादि अनन्त नित्य
परंपरा वाला है।
भीतर से बाहर निकलने वाला श्वास निश्वास कहलाता है,
और वह उष्ण होता है। यदि किसी मनुष्य का निश्वास शीतल
चलने लगे, तो वह उसकी निकटस्थ मृत्यु का अरिष्टसूचक होता है।
यहां भगवती का निश्वास शिशिरतर कहागया है, भगवती के परम
शान्तिमय अन्तर्हृदय का यह पराक्रम है, जिस से मृत्यु को भी भय
लगता है, और उसके परम शान्तिप्रद निश्वास के स्पर्श मात्र से
उपासक शीघ्र जीवन मुक्ति का परमानन्द प्राप्त कर लेते हैं।
नासावंशः का अर्थ नासोपम वंशः भी किया जासकता है।
किसी मनुष्य की यशः श्लाघा करते समय कहा करते हैं कि वह मनुष्य
तो अपने कुल, जाति, वंश अथवा देश की नाक है, इसी प्रकार
भगवती के उपासकों का वंश प्रकृति देवी की नाक है, ऐसा कहने
से भगवती के उपासकों की सर्वोपरि गणना समझी जानी चाहिये
जिन की वंशावलि में जीवन मुक्त महान पुरुषों की सदा समृद्धि
होती रहती है। जिन में से कोई कोई प्रकाशित भी होजाते हैं,
परन्तु गुप्त रूप से रहने वाले अनेक सन्तों के अस्तित्व की वे
साक्षि देते रहते हैं। हिमगिरी के हिम शिखरों का शीतल शान्ति
प्रद पवन ही मानो भगवती का कल्याणमय निश्वास है, जो श्रेय
के जिज्ञासुओं को उत्तरोत्तर आवाहन करता रहता है।

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सौंदर्य लहरी २६९
ओष्ठों का ध्यान:—
( ६२ )
प्रकृत्याऽऽरक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।
न बिम्बं तद्विम्बप्रतिफलनरागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव न लज्जेत कलया ॥
अर्थ:—हे सुन्दर दांतों वाली भगवति ! स्वाभाविक लाल-
रंग के तेरे होठों की शोभा का सादृश्य करने वाले पदार्थों के
नाम कहता हूं । मूंगे की लता में यदि फल आजायं, (तो उतने
सुन्दर कहे जा सके हैं), परन्तु विंव फल तो नहीं, क्योंकि
उनकी अरुणिमा तो तेरे विम्व की प्रतिबिंवित् अरुणिमा की
झलक सदृश है, यदि उनमें किसी प्रकार तेरे होठों की तुलना
भी की जाय, तो वे तेरे होठों की सुन्दरता की एक कला के
बराबर भी सुन्दर न उतरने से क्या लज्जित नहीं होते ?
प्रवाल लता में फल नहीं लगते, क्योंकि वे जड होती हैं !
परन्तु यदि उनमें फल लगने लगें, तो संभव है कि भगवती के होठों
की उनसे उपमा दी जा सके । और बिंब फल की अरुणिमा तो
सामान्य अरुणिमा है, और उसे प्रकृति देवी की आंशिकदेन ही
समझना चाहिये, मानो असली रंग की छाया मात्र है । बिंव फलों

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२६८ सौंदर्य लहरी
से कविजन सामान्य स्त्रियों के होठों की उपमा दिया करते हैं परन्तु
भगवती के होठों से उनकी उपमा देना उचित नहीं है, क्योंकि
उनका सौंदर्य अनुपम है ।
<u>मुस्कान का ध्यान:—</u>
( ६३ )
स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिवतां
चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।
अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमाम्लरुचयः
पिवन्ति स्वच्छन्दं निशिनिशि भृशं काञ्जिकधिया ॥
अर्थ:— तेरे चन्द्रवदन की मुस्कान रूपी ज्योत्स्ना
(चांदनी) की प्रचुरता को पीकर, अति मधुर होने के कारण
चकोरों की चंचु अति रसास्वाद से जड हो गई है अर्थात् हट
गई है । इसलिये वे खट्टे रस के इच्छुक चन्द्रमा के अमृत की
लहरी को कांजी सदृश समझ कर प्रतिरात्रि खूब स्वच्छन्द
पीते रहते हैं ।
अर्थात् चांद की चांदनी प्रकृति की मुस्कराहट की मधुरता के
सामने कांजीवत् खट्टी है ।

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सौंदर्य लहरी २६२
जिह्वा का ध्यानः—
( ६४ )
अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाऽऽम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।
यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ॥
कठिन शब्दः—आम्रेडन=बारंबार, दृषद=पत्थर, अच्छत=स्वच्छ ।
अर्थः— हे जननि ! बिना थके पति के गुणानुवाद का
वारंवार जप करने वाली, तेरी जवाकुसुम की द्युति सदृश लाल
जिह्वा की जय है । जिसके अग्र भाग पर आसीन स्फटिक
पत्थर की जैसी शुद्ध कांतिमयी सरस्वती की मूर्ति के शरीर का
वर्ण माणिक्य सदृश परिणत हो गया हैं ।
स्फटिक का धर्म है कि उसपर निकटस्थ पदार्थ का रंग झलकने
लगता है अर्थात वह स्वयं उसके रंग में रंग जाता है । सरस्वती का
निवास जिह्वा के अग्र भाग पर होता है, और उसका वर्ण स्फटिक
वत् स्वच्छ होता है, परन्तु जिह्वा के रंग से लाल दिखने लगता है ।

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२७० सौन्दर्य लहरी
( ६५ )
रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्रैः कवचिभि—
र्निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।
विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला
विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकवलाः ॥
कठिन शब्द:— शिरस्र=शिर कवच, विशाख=षडानन
अर्थ:--हे मां ! दैत्यों को रण में जीतकर अपहृत शिरस्र
और कवचों को उतारकर, शिवजी के निर्माल्य से विमुख जो
चंड का भाग होता है, स्कन्द, इन्द्र और उपेन्द्र तीनों तेरे मुख
के पान के ग्रास को, जिसमें चन्द्रमा जैसे स्वच्छ कपूर के
टुकडे पड़े हैं, ग्रहण करते हैं ।
जैसे मां अपने छोटे २ बालकों को अपने मुख से निकालकर
बड़े प्रेम से आधे चबे पान के टुकड़े खिलाया करती है, वैसे ही
भगवती स्कन्द, इन्द्र और उपेन्द्र को, जो उसके बालक हैं, दैत्यों
पर जय प्राप्त करने पर प्रसन्न होकर पुरस्कार स्वरूप अपने मुख से
निकालकर तांबूल के टुकड़े खिलाती है । चण्ड शंकर के एक गण
का नाम है, उसका स्थान नन्दी के दक्षिण हाथ की ओर उसके
और जलहरी के बीच में होता है । शंकर का निर्माल्य चंड का ही
भाग होता है, दूसरा उसे ग्रहण नहीं कर सकता । इसलिये चण्ड
के पास खड़े होकर शंकर की पूजा नहीं की जाती, वह सब निष्फल

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सौंदर्य लहरी २७१
होती है। स्कन्द इन्द्र और उपेन्द्र तीनों, दैत्यों को हराकर जब
शंकर के पास गये तो वहां पर कोई पुरस्कार नहीं मिल सका
क्योंकि उनका निर्माल्य का अधिकारी चण्ड होता है इसलिये वे
भगवती के पास गये; और मां का सब से ऊंचा पुरस्कार उसका
वात्सल्य प्रेम प्रकट करने में ही होता है।
वाणी की प्रशंसा:—
( ६६ )
विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपते-
स्त्वयाऽऽरब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।
तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवां
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥
कठिन शब्दः— विपञ्ची=वीणा, अपदान=भले हुए लोकोपकार
अर्थः-- पशुपति के विविध अपदानों को वीणा पर
गाते समय, तेरे शिर हिलाकर सरस्वती की श्लाघा के वचन
कहना आरंभ करने पर, जो अपनी मधुरता से वीणा के
कलरव को फीका करते हैं, सरस्वती अपने वीणा को कपड़े में
लपेट कर रख देती है।
अर्थात् भगवती की वाणी के माधुर्य के सामने सरस्वती के
बीणा के सुर भी फीके पड जाते हैं।

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२७२ सौंदर्य लहरी
चिबुक का ध्यान:—
(६७)
कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।
करग्राह्यं शंभोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते
कथंकारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥
अर्थ:-- हे गिरीसुते ! उपमारहित तेरी चिबुक ( ठोडी )
का वर्णन हम कैसे करें ? जिसे हिमाचल ने अर्थात तेरे पिता
ने वात्सल्य प्रेम से अपनी अंगुलियों से स्पर्श किया है, और
गिरीश ने अधरपान करने की आकुलता से बार २ उठाया है,
और जो उस समय ऐसी प्रतीत होती हैं मानों वह शंभु के
हाथ में मुख देखने के लिये उठाए हुए दर्पण का दस्ता हो ।
प्रकृति का मुख दर्पण सदृश है, जिसमें शंकर का मुख प्रति-
भासित हो रहा है । यह भाव बिहारी सतसई में इस प्रकार
दिखाया गया है ।
मैं समझो निर्धार यह जग कांचों कांचसो ।
एक ही रूप अपार प्रतिबिंबित लखियत जगत ॥

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सौंदर्य लहरी २७३
(६८)
ग्रीवा का ध्यान
भुजाश्लेषान्नित्य पुरदमयितुः कण्टकवती
तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् ।
स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना
मृणालीलालित्यं वहति यदधो हारलतिका ॥
कठिन शब्द— कालागुरु=अगर, एक सुगंधित द्रव्य, जम्बाल=
कीचड, लेप ।
अर्थ — तेरी ग्रीवा जो पुरारि की भुजा के नित्य स्पर्श से
खरदरी हो रही है, तेरे मुखकमल को धारण करती हुई
कमलनाल (मृणाली) जैसी सुन्दर लगती है, जो स्वतः तो
गौर वर्ण है परन्तु अधिक समय तक अगरु के गाढे लेप से
कीचड में सनी हुई सी मलीन दिखती है, और जिसके नीचे
हार पहना हुआ है ।
गले का ध्यान
(६९)
गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे
विवाहव्य'नद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः ।
विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव ते ॥
अर्थः— हे गति, गमक और गीत में निपुणे ! तेरे गले
में पडी हुई तीन रेखायें जो विवाह के समय बांधी गई तीन

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२७४ सौंदर्य लहरी
सौभाग्यसूत्रों की लडियों से पड गई हैं, ऐसी प्रतीत हो रही हैं
मानो वे नानाविध मधुर राग रागिनियों के तीनों ग्रामों पर गाने
से उनके स्थिति नियम की सीमा के चिन्ह हों ।
गान विद्या के अनुसार प्रत्येक राग में गति, गमक और गीत
तीन अंग होते हैं । गतिचाल को कहते है, गमक सुरों के आरोह
अवरोह को कहते हैं और गीत तीनों सप्तकों के सुरों के क्रम को
कहते हैं । संगीत तीन ग्रामों वाला होता है, उनके नाम षडज,
मध्यम और गांधार ग्राम हैं । जिस ग्राम पर कोई राग गाया जाता
है, उसका आरम्भ और अन्त उस ही ग्राम के सुर से होता है ।
अर्थात् षडज ग्राम पर गाने वाला अपने राग का आरम्भ षडज से
करेगा और षडज पर ही समाप्त करेगा, इसी तरह मध्यम और
गांधार ग्रामों पर गाने वाले के राग मध्यम अथवा गांधार सुर से
ही उठाये जाकर उस ही सुर पर समाप्त किये जायंगे । प्रचलित
पद्धति में केवल षडज ग्राम पर ही सब गाने गाये जाते हैं, और
अन्य दो ग्रामों का प्रचलन नहीं रहा । इसलिये उनका संगीत शास्त्र
में उल्लेख मात्र मिलता है । प्राचीन काल में उनका प्रचलन होगा ।
भगवती तीनों ग्रामों पर गा सकती है, इसलिये उनके गले की
तीन रेखाएँ, ऐसी प्रतीत होती हैं, मानों प्रत्येक ग्राम पर गाने से
उनके सुरों की पृथक २ सीमा बन गई है ।

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सौंदर्य लहरी १७५
चारों भुजाओं का ध्यान
( ७० )
मृणालो मृद्वीनां तव भुजलतानांच तसृणां
चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः ।
नखेभ्यः संत्रस्यन्प्रथममथनादन्धकरिपो–
श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ॥
कठिन शब्द—अंधकरिपु=शिवजी ।
अर्थ — शिवजी के नखों के द्वारा पहिले पुराकाल में कभी
( पांचवा शिर ) मथन किया जाने की स्मृति से संत्रस्त होकर,
चारों शिरों की एक समान रक्षा के लिये, तेरे अभयदान देने
वाले हाथ की शरण में समर्पण बुद्धि रखकर, मृणाली सदृश
कोमल तेरी चारों लता जैसी भुजाओं के सौंदर्य की, ब्रह्मा चारों
मुखों से स्तुति किया करते हैं ।
पौराणिक एक गाथा के अनुसार ब्रह्मा के भी ५ शिर थे,
जिससे उन्हें बडा अभिमान था, इसलिये शिवजी ने रुष्ट होकर
उनका एक शिर अपने नखों से तोड डाला था । उस समय की
स्मृति से वे सदा भगवती के चारों हाथों की चारों मुखों से स्तुति
किया करते हैं । इस आख्यायिका का अभिप्राय यह प्रतीत होता

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२७६ सौंदर्य लहरी
है कि ब्रह्मा के चारों मुख चार वेदों से प्रकृति के हाथों की कृति
का व्याख्यान करते हैं । ब्रह्मा को सृष्टि बनाने का जब अहंकार
उत्पन्न हुआ तो उनका अहंकार शिवजी ने तोड दिया । वह अहंकार
ही पांचवा शिर था ।
हाथों का ध्यानः—
( ७१ )
नखानामुद्योतै र्नवनलिनरागं विहसतां
कराणां ते कान्ति कथय कथयामः कथमुमे ।
कयाचिद्वा साम्यं भवतु कलया हन्त कमलं
यदि क्रीडलक्ष्मी चरणतल लाक्षाऽरुण दलम् ॥
अथः— हे उमे ! तेरे हाथों की कांति का कहो कैसे
वर्णन करूं, जिनके नखों की द्युति नवविकसित कमल की
अरुणिमा का परिहास करती है । यदि किसी अंश में किसीं
प्रकार कमळ के दलों की अरुणिमा से सामान्यता की जाय,
तो अरे ! वह तो लक्ष्मी के क्रीडा करते समय चरणों में लगी
लाक्षा के कारण है ।
अर्थात् कमलों की अरुणिमा उनकी स्वाभाविक नहीं है,
लक्ष्मी के चरणों में लगी लाख के कारण है, परन्तु भगवती के
नखों की अरुणिमा स्वाभाविक है ।

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सौन्दर्य लहरी २७७
दोनों स्तनों का ध्यान:—
( ७२ )
समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं
तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्रुतमुखम् ।
यदालोक्याशङ्काऽऽकुलितहृदयो हासजनकः
स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झटिति ॥
कठिन शब्द:— द्विप=हाथी, हेरम्ब=गणेशजी
अर्थ: — हे देवि ! स्कन्द और गणेशजी के पान किये
हुए तेरे दोनों स्तन, जिनके मुख से दूध टपक रहा है, सदा हमारे
खेद का हरण करें पीते समय जिन स्तनों को देखकर गणेशजी
शंका से आकुलित हृदय होकर झट अपने ही सिर के कुंभवत्
भागों को टटोलकर हास्यजनक चेष्टा करते हैं ।
अर्थात् गणेशजी को अपने शिर के कुंभ सदृश उभरे हुए
मस्तक और मां के स्तनों में भेद न दिखने के कारण शंका हो
जाने से वे तुरन्त अपने सिर को टटोलने लगे । बालक दूध पीते
समय माता के स्तनों को हाथ में थामकर दूध पीया करता है,
परन्तु गणेशजी गलती से अपने ही सिर को पकडने लगे, जिसको
देखकर मां हंस पडी ।

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२७८ सौंदर्य लहरी
( ७३ )
अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ (कलशौ)
न संदेहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः ।
पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसंगमरसौ
कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥
कठिन शब्दः—वक्षोज=स्तन, कुतुप=कुप्पा, नग=पर्वत, द्विरद
=हाथी
अर्थः—हे हिमाचल पर्वतराज की पताका सदृश्य पुत्रि !
अमृत रस से भरे माणिक्य के बने कुप्पों अथवा कलशों के
सदृश तेरे स्तनों को देखकर हमारे मन में संदेह का स्पन्द
भी नहीं होता (जैसा कि स्त्रियों के स्तनों से होना संभव हैं)
क्योंकि (उनका ऐसा प्रभाव है कि) उनके दुग्ध पान करने
से गणेशजी और स्कन्द दोनों आज भी कुमार ही हैं और
उनको स्त्री संगम का रस विदित नहीं है ।
दोनों के पास पत्नियां होते हुए भी वे श्रृंगार रस से परिचित
नहीं हैं, यह भगवती के स्तन पाने का फल है । गणेशजी के
साथ ऋद्धि सिद्धि दोनों पत्नियों के समान हैं और देवताओं के
सेनापति स्कन्द के पास देवताओं की सेना (देवसेना) रूपी पत्नि है ।
अर्थात् ऋद्धि सिद्धि और देवसेना स्त्रीवाचक शब्द मात्र हैं, और
वे शक्तियां हैं न कि पत्नियां, परन्तु तो भी उनको ऋद्धि सिद्धियों

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सौंदर्य लहरी २७९
से युक्त गणपति और देवताओं के सेनापति कहने से, उनमें पति
पत्नि का दाम्पत्य संबंध होने की भ्रान्ति मात्र होती है। वास्तव
में दोनों नित्य नैष्ठिक ब्रह्मचारी ही हैं !
( ७४ )
वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः
समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम् ।
कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां
प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ॥
कठिन शब्दः—स्तम्बेरम=हाथी, दनुज=असुर, पुरदमयिता=
पुरारि, शिवजी !
अर्थः—हे मां ! तेरा कुचभाग (छाती का भाग) जो
गजासुर के मस्तक रूपी कुंभ से निकली हुई मुक्तामणियों की
विमल माला पहने हुए है, उसपर तेरे बिंबसदृश लाल होठों
की कान्ति पडने से अरुण छाया दिखती है, इसलिये वह हार
शिवजी की प्रताप-मिश्रित-कीर्ति का प्रतीकवत् है।
हाथी के मस्तक से गजमुक्ता का निकलना प्रसिद्ध है।
इसलिये जो मुक्तामणियां गजासुर के मारे जाने पर शिवजी को
मिली थीं, उनकी माला भगवती ने छाती पर पहिनी हुई है। और
उनपर भगवती के होठों का लाल रंग चढा हुआ है, अर्थात् वे
मणियां होठों की अरुण कान्ति की छाया से लाल दिखने लगी हैं।

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२८० सौंदर्य लहरी
इस प्रकार हार में दोनों का मिश्रण हो रहा है । कविलोग प्रताप
को लालरंग से और कीर्ति को स्वच्छरंग से उपमित किया करते
हैं। यहां मणियां स्वच्छ होने के कारण कीर्ति की प्रतीक हैं और
उनपर चमकने वाला लालरंग प्रताप का प्रतीक है। यहां गजासुर का
वध रूपी प्रताप शंकर की शक्ति का प्रताप है और मणियां उस
प्रताप की कीर्ति के चिन्ह हैं। भगवती स्वयं शंकर की शक्ति है।
श्लोक का अन्तिम पद 'ते' 'कुचाभागो' पद के लिये सर्वनाम है,
प्रथम पंक्ति में क्रियापद 'वहति' को 'कीर्तिमिवहारलतिकां वहति'
इस क्रम से पढना चाहिये, 'कुचाभागो' 'वहति' का कर्ता है।
(७५)
तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः
पयः पारावारः परिवहति सारस्वतमिव ।
दयावत्यादत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्
कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ॥
अथः—हे धरणिधर कन्ये ! मैं ऐसा समझता हूं कि तेरे
स्तनों के दूध का पारावार तेरे हृदय से बहने वाला सारस्वतं
ज्ञान सदृश है । जिसे पीकर, दयावती होकर तेरे स्तनपान कराने
पर द्रविडशिशु ने प्रौढकवियों के सदृश कमनीय कविता
की रचना की थी ।
द्रविडशिशु कौन था, जिसका संकेत इस श्लोक में है, इसपर
विद्वानों का मतभेद है। कुछ विद्वानों का मत है कि शंकर
भगवत्पाद ने यहां अपने लिये ही संकेत किया है।

सौन्दर्यलहरी: श्लोक ७१ से १०० (कण्ठ, बाहु, चरण-कमल व सौन्दर्यलहरी उपसंहार)

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सौंदर्य लहरी २८१
भगवती के स्तन पान कराने की दैवी कृपा की घटना इस प्रकार
घटित हुई बताई जाती हैं कि एक बार भगवत्पाद के शिशुकाल में जब
उनके पिता किसी स्थानान्तर को जाने लगे, तो अपनी धर्मपत्नी
को भगवती का पूजन करने को कह गये । परन्तु वे पति की
अनुपस्थिति में मासिक धर्म के कारण पूजन नहीं कर सकीं, और
बालक शंकर को भगवती का पूजन करने का सुअवसर मिला ।
भगवती को नैवेद्यार्थ दूध अर्पण किया जाता था । शंकर भगवत्पाद
बालपन के भोलेपन से समझे कि भगवती दूध को प्रतिदिन साक्षात्
पीया करती थीं, परन्तु उसदिन न पीते देखकर, वे रोकर प्रार्थना
करने लगे । बालक के आग्रह से प्रसन्न होकर भगवती प्रकट हो गईं
और सारा दूध पी गईं । परन्तु शंकर भगवत्पाद के पिता नैवेद्य
का दूध पुत्र को दिया करते थे । भगवती के सारा दूध पी लेने पर
बाल शंकर रो पड़े । इसपर भगवती को दया आई, और बालक को
अपने स्तनों का दूध पिलाया । भगवती के स्तन का पान करते ही
शंकर एक उच्चकोटि की कविता में भगवती की स्तुति करने लगे,
जो उनके मुख से स्वतः निकलने लगी थी । पिता को घर आकर
यह सब सुनने पर बडी प्रसन्नता हुई । फिर भगवती ने उनको स्वप्न
में दर्शन देकर कहा कि यह बालक एक महान पुरुष होगा । यह
कथा कैवल्य शर्मा ने लिखी है ।
इसपर कुछ लोग आपत्ति करते हैं कि शंकर भगवत्पाद अपनी
लेखिनी से अपनी श्लाघा नहीं कर सकते, इसलिये द्रविड शिशु कोई
दूसरा व्यक्ति होना चाहिये, जो भगवत्पाद का सम कालीन था ।
परन्तु हमें तो, इतना कहने में कि एक शिशु प्रौढ कवियों जैसी

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२८२ सौन्दर्य लहरी
कमनीय कविता करने लगा, कोई विशेष आत्मश्लाघा की बात नहीं
दिखती । यदि उसे आत्मश्लाघा कहा भी जाय, तो वह वास्तव में
भगवती के स्तन पान के फल की महिमा का गान मात्र है ।
एक ऐसी भी किंवदन्ती है कि द्रविड शिशु एक सिद्ध
महात्मा थे, उन्होंने एक स्तोत्र कैलाश के पत्थरों पर लिखा था,
जब शंकर भगवत्पाद कैलाश यात्रा को गये, तब उन्होंने उसे पढा ।
परन्तु भगवती के इशारे से इनको स्तोत्र पढते देखकर सिद्ध ने
उसे मिटाना आरंभ कर दिया । इतने अवसर में भगवत्पाद ने पूर्व के
४१ श्लोक कंठाग्र कर लिये थे, वे ही इस स्तोत्र के प्रथम ४१ श्लोक
हैं। उस द्रविड शिशु का संकेत इस श्लोक में किया गया है ।
परन्तु हमारे मत की पुष्टि, कि द्रविड शिशु से भगवत्पाद ने अपना
ही संकेत किया है, श्लोक १०० से होती है, जिससे सौन्दर्य
लहरी का लेखन समय उनका विद्यार्थी वय सिद्ध होता है ।
नाभि का ध्यानः -
( ७६ )
हरक्रोधज्वालाऽवलिभिरवलीढेन वपुषा
गभीरे ते नाभीसरसि कृतसंगो मनसिजः ।
समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका
जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ॥
अर्थः- हे अचल तनये ! हर के क्रोध की ज्वालाओं
से लिपटे हुए शरीर से कामदेव ने गहरे सरोवर सदृश तेरी

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सौंदर्य लहरी २८३
नाभि में जब गोता लगाया, उनमे लता सदृश उठने वाले धूवें
की जो रेखा बनी, उसे जन साधारण, हे जननि ! तेरी नाभी
के ऊपर उठने वाली रोमावलि समझते हैं ।
इसका आध्यात्मिक भाव यह है कि कामोद्दीपन होने पर भ्रूमध्य
में शंकर का ध्यान करने से जहां उनका ज्ञानरूपी तीसरा नेत्र है.
हृदय में उदय होने वाला काम का ताप नाभि चक्र में उतर कर
शान्त हो जाता है और अग्नि के पानी में बुझने से जो धुआं सा
ऊपर उठता है, तद्वत् नाभि से हृदय में उठने वाली रोमांच की
लता सी उठकर शांति प्रदान करती है ।
( ७७ )
यदेतत्कालिन्दीतनुतरतरङ्गाकृति शिवे
कृशेमध्ये किञ्चिज्जननि तव तद्भाति सुधियाम् ।
विमर्दादन्योन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं
तनुभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम् ॥
कठिन शब्दः— कालिन्दी=यमुना, कुहरिणी=कुं हरतीति कुहर,
कुहं राति ददातीति वा, बिल, रंध्र, सर्पिणी ।
अर्थः— हे शिवे, हे जननि ! यह जो यमुना की बहुत
पतली तरंग के सदृश आकृति वाली ( रोमावलि ) तेरे कृश
कटि भाग में किंचित दिख रही है, वह सद्बुद्धि वाले मनुष्यों
को ऐसी जान पड़ती है, मानो तेरे कुच कलशों के बीच एक