सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी २६९
ओष्ठों का ध्यान:—
( ६२ )
प्रकृत्याऽऽरक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।
न बिम्बं तद्विम्बप्रतिफलनरागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव न लज्जेत कलया ॥
अर्थ:—हे सुन्दर दांतों वाली भगवति ! स्वाभाविक लाल-
रंग के तेरे होठों की शोभा का सादृश्य करने वाले पदार्थों के
नाम कहता हूं । मूंगे की लता में यदि फल आजायं, (तो उतने
सुन्दर कहे जा सके हैं), परन्तु विंव फल तो नहीं, क्योंकि
उनकी अरुणिमा तो तेरे विम्व की प्रतिबिंवित् अरुणिमा की
झलक सदृश है, यदि उनमें किसी प्रकार तेरे होठों की तुलना
भी की जाय, तो वे तेरे होठों की सुन्दरता की एक कला के
बराबर भी सुन्दर न उतरने से क्या लज्जित नहीं होते ?
प्रवाल लता में फल नहीं लगते, क्योंकि वे जड होती हैं !
परन्तु यदि उनमें फल लगने लगें, तो संभव है कि भगवती के होठों
की उनसे उपमा दी जा सके । और बिंब फल की अरुणिमा तो
सामान्य अरुणिमा है, और उसे प्रकृति देवी की आंशिकदेन ही
समझना चाहिये, मानो असली रंग की छाया मात्र है । बिंव फलों