सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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अर्थः— हे तुहिन गिरि अर्थात् हिमाचल के वंश की
ध्वजा की पताके । तेरे नाक का यह बांस हमको शीघ्र उचित
फल का देने वाला हो । अथवा उसपर हमारे लिये उचित फल
लगे । क्योंकि उसके भीतर तेरे अति शीतल निश्वासों से मोती
बन रहे हैं, और उनकी वायें नथने में इतनी समृद्धि है कि एक
मुक्तामणि बाहर भी दिखा रहा है । यहां नथ के मोती से
अभिप्राय है जो बायें नाक में पहनी जाती है ।
वंश द्व्यर्थवाचक शब्द है बांस और कुल । हिमाचल पर
लगे हुए बांस पर ध्वजा फहराई जाय, तो उसकी पताका के सदृश
भगवती की उपमा है, दूसरे अर्थ में भगवती को हिमालय के कुल
की ध्वजपताका सदृश कहा गया है । बांस में फल नहीं लगते,
परन्तु उसके अन्दर मोतियों की उत्पत्ति कही जाती है । 'मुक्ता'
शब्द भी द्व्यर्थवाचक है, मोती को मुक्ता कहते हैं और जीवन
मुक्त पुरुष भी मुक्त कहलाते हैं । बांस में मोती होते हैं और कुल
में मुक्त पुरुष उत्पन्न होते हैं । शंकर भगवत्पाद प्रार्थना करते हैं
के तेरी नासिका रूपी बांस में हमारे लिये उचित फल लगें और
उनकी समृद्धि भी हो । परन्तु जैसे बांस में फल नहीं लगते, और
उसके भीतर पोल में मोतियों का उत्पन्न होना सुना जाता है, उसी
प्रकार भगवती की नासिका वत् श्रेष्ट कुल में अर्थात् भगवती के
उपासक संप्रदाय में मुक्त पुरुषों की उत्पत्ती होती है, जिसका उचित
फल मुक्ति है । और भगवती के कर्ण फूलों (ताटंको) की झंकार
रूपी प्रणवोपासना से उनकी समृद्धि होती है । फल का अर्थ