सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी २६२
जिह्वा का ध्यानः—
( ६४ )
अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाऽऽम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।
यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ॥
कठिन शब्दः—आम्रेडन=बारंबार, दृषद=पत्थर, अच्छत=स्वच्छ ।
अर्थः— हे जननि ! बिना थके पति के गुणानुवाद का
वारंवार जप करने वाली, तेरी जवाकुसुम की द्युति सदृश लाल
जिह्वा की जय है । जिसके अग्र भाग पर आसीन स्फटिक
पत्थर की जैसी शुद्ध कांतिमयी सरस्वती की मूर्ति के शरीर का
वर्ण माणिक्य सदृश परिणत हो गया हैं ।
स्फटिक का धर्म है कि उसपर निकटस्थ पदार्थ का रंग झलकने
लगता है अर्थात वह स्वयं उसके रंग में रंग जाता है । सरस्वती का
निवास जिह्वा के अग्र भाग पर होता है, और उसका वर्ण स्फटिक
वत् स्वच्छ होता है, परन्तु जिह्वा के रंग से लाल दिखने लगता है ।