सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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( ७३ )
अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ (कलशौ)
न संदेहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः ।
पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसंगमरसौ
कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥
कठिन शब्दः—वक्षोज=स्तन, कुतुप=कुप्पा, नग=पर्वत, द्विरद
=हाथी
अर्थः—हे हिमाचल पर्वतराज की पताका सदृश्य पुत्रि !
अमृत रस से भरे माणिक्य के बने कुप्पों अथवा कलशों के
सदृश तेरे स्तनों को देखकर हमारे मन में संदेह का स्पन्द
भी नहीं होता (जैसा कि स्त्रियों के स्तनों से होना संभव हैं)
क्योंकि (उनका ऐसा प्रभाव है कि) उनके दुग्ध पान करने
से गणेशजी और स्कन्द दोनों आज भी कुमार ही हैं और
उनको स्त्री संगम का रस विदित नहीं है ।
दोनों के पास पत्नियां होते हुए भी वे श्रृंगार रस से परिचित
नहीं हैं, यह भगवती के स्तन पाने का फल है । गणेशजी के
साथ ऋद्धि सिद्धि दोनों पत्नियों के समान हैं और देवताओं के
सेनापति स्कन्द के पास देवताओं की सेना (देवसेना) रूपी पत्नि है ।
अर्थात् ऋद्धि सिद्धि और देवसेना स्त्रीवाचक शब्द मात्र हैं, और
वे शक्तियां हैं न कि पत्नियां, परन्तु तो भी उनको ऋद्धि सिद्धियों