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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 318

२६८ सौंदर्य लहरी
से कविजन सामान्य स्त्रियों के होठों की उपमा दिया करते हैं परन्तु
भगवती के होठों से उनकी उपमा देना उचित नहीं है, क्योंकि
उनका सौंदर्य अनुपम है ।
<u>मुस्कान का ध्यान:—</u>
( ६३ )
स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिवतां
चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।
अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमाम्लरुचयः
पिवन्ति स्वच्छन्दं निशिनिशि भृशं काञ्जिकधिया ॥
अर्थ:— तेरे चन्द्रवदन की मुस्कान रूपी ज्योत्स्ना
(चांदनी) की प्रचुरता को पीकर, अति मधुर होने के कारण
चकोरों की चंचु अति रसास्वाद से जड हो गई है अर्थात् हट
गई है । इसलिये वे खट्टे रस के इच्छुक चन्द्रमा के अमृत की
लहरी को कांजी सदृश समझ कर प्रतिरात्रि खूब स्वच्छन्द
पीते रहते हैं ।
अर्थात् चांद की चांदनी प्रकृति की मुस्कराहट की मधुरता के
सामने कांजीवत् खट्टी है ।