सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in context२७२ सौंदर्य लहरी
चिबुक का ध्यान:—
(६७)
कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।
करग्राह्यं शंभोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते
कथंकारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥
अर्थ:-- हे गिरीसुते ! उपमारहित तेरी चिबुक ( ठोडी )
का वर्णन हम कैसे करें ? जिसे हिमाचल ने अर्थात तेरे पिता
ने वात्सल्य प्रेम से अपनी अंगुलियों से स्पर्श किया है, और
गिरीश ने अधरपान करने की आकुलता से बार २ उठाया है,
और जो उस समय ऐसी प्रतीत होती हैं मानों वह शंभु के
हाथ में मुख देखने के लिये उठाए हुए दर्पण का दस्ता हो ।
प्रकृति का मुख दर्पण सदृश है, जिसमें शंकर का मुख प्रति-
भासित हो रहा है । यह भाव बिहारी सतसई में इस प्रकार
दिखाया गया है ।
मैं समझो निर्धार यह जग कांचों कांचसो ।
एक ही रूप अपार प्रतिबिंबित लखियत जगत ॥