सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी २७१
होती है। स्कन्द इन्द्र और उपेन्द्र तीनों, दैत्यों को हराकर जब
शंकर के पास गये तो वहां पर कोई पुरस्कार नहीं मिल सका
क्योंकि उनका निर्माल्य का अधिकारी चण्ड होता है इसलिये वे
भगवती के पास गये; और मां का सब से ऊंचा पुरस्कार उसका
वात्सल्य प्रेम प्रकट करने में ही होता है।
वाणी की प्रशंसा:—
( ६६ )
विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपते-
स्त्वयाऽऽरब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।
तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवां
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥
कठिन शब्दः— विपञ्ची=वीणा, अपदान=भले हुए लोकोपकार
अर्थः-- पशुपति के विविध अपदानों को वीणा पर
गाते समय, तेरे शिर हिलाकर सरस्वती की श्लाघा के वचन
कहना आरंभ करने पर, जो अपनी मधुरता से वीणा के
कलरव को फीका करते हैं, सरस्वती अपने वीणा को कपड़े में
लपेट कर रख देती है।
अर्थात् भगवती की वाणी के माधुर्य के सामने सरस्वती के
बीणा के सुर भी फीके पड जाते हैं।