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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 326 of 415

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Page 326

२७६ सौंदर्य लहरी
है कि ब्रह्मा के चारों मुख चार वेदों से प्रकृति के हाथों की कृति
का व्याख्यान करते हैं । ब्रह्मा को सृष्टि बनाने का जब अहंकार
उत्पन्न हुआ तो उनका अहंकार शिवजी ने तोड दिया । वह अहंकार
ही पांचवा शिर था ।
हाथों का ध्यानः—
( ७१ )
नखानामुद्योतै र्नवनलिनरागं विहसतां
कराणां ते कान्ति कथय कथयामः कथमुमे ।
कयाचिद्वा साम्यं भवतु कलया हन्त कमलं
यदि क्रीडलक्ष्मी चरणतल लाक्षाऽरुण दलम् ॥
अथः— हे उमे ! तेरे हाथों की कांति का कहो कैसे
वर्णन करूं, जिनके नखों की द्युति नवविकसित कमल की
अरुणिमा का परिहास करती है । यदि किसी अंश में किसीं
प्रकार कमळ के दलों की अरुणिमा से सामान्यता की जाय,
तो अरे ! वह तो लक्ष्मी के क्रीडा करते समय चरणों में लगी
लाक्षा के कारण है ।
अर्थात् कमलों की अरुणिमा उनकी स्वाभाविक नहीं है,
लक्ष्मी के चरणों में लगी लाख के कारण है, परन्तु भगवती के
नखों की अरुणिमा स्वाभाविक है ।