सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी २७९
से युक्त गणपति और देवताओं के सेनापति कहने से, उनमें पति
पत्नि का दाम्पत्य संबंध होने की भ्रान्ति मात्र होती है। वास्तव
में दोनों नित्य नैष्ठिक ब्रह्मचारी ही हैं !
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वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः
समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम् ।
कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां
प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ॥
कठिन शब्दः—स्तम्बेरम=हाथी, दनुज=असुर, पुरदमयिता=
पुरारि, शिवजी !
अर्थः—हे मां ! तेरा कुचभाग (छाती का भाग) जो
गजासुर के मस्तक रूपी कुंभ से निकली हुई मुक्तामणियों की
विमल माला पहने हुए है, उसपर तेरे बिंबसदृश लाल होठों
की कान्ति पडने से अरुण छाया दिखती है, इसलिये वह हार
शिवजी की प्रताप-मिश्रित-कीर्ति का प्रतीकवत् है।
हाथी के मस्तक से गजमुक्ता का निकलना प्रसिद्ध है।
इसलिये जो मुक्तामणियां गजासुर के मारे जाने पर शिवजी को
मिली थीं, उनकी माला भगवती ने छाती पर पहिनी हुई है। और
उनपर भगवती के होठों का लाल रंग चढा हुआ है, अर्थात् वे
मणियां होठों की अरुण कान्ति की छाया से लाल दिखने लगी हैं।