सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
दसवां अध्याय
दसवां अध्याय
पहला खंड
अक्रान्तसमुद्रः प्रथमे विधर्मन् जनयन्प्रजा भुवनस्य गोपाः.
वृषा पवित्र अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः.. (१)
सोम पानी बरसाने वाले, सब की रक्षा करने वाले व दिव्य हैं. सब से पहले आकाश में
उन्होंने प्रजा को उत्पन्न कर के प्रतिष्ठा प्राप्त की, फिर पृथ्वी के ऊपर प्राकृतिक छलनी से छन
कर के बढ़ोतरी प्राप्त की. (१)
मत्सि वायुमिष्टये राधसे नो मत्सि मित्रावरुणा पूयमानः.
मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम.. (२)
छाना गया सोमरस मित्र, वरुण तथा मरुद्गण की सामर्थ्य बढ़ा देने वाला हो. वह इंद्र के
भी बल को बढ़ाए. वह हमें अन्न, धन दिलाने के लिए वायु को प्रसन्न करे. सोमरस अनुपम
(दिव्य) है. वह स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक दोनों ही लोकों के लिए प्रसन्नता बढ़ाने वाला हो.
(२)
महत्तत्सोमो महिषश्चकारापां यद्गर्भो ऽ वृणीत देवान्.
अदधादिन्द्रे पवमान ओजो ऽ जनयत्सूर्ये ज्योतिरिन्दुः.. (३)
सोम ने सूर्य में प्रकाश उत्पन्न किया. इंद्र में ओज स्थापित किया. ये जल के गर्भ स्वरूप
और महानतम हैं. सोम ने बहुत से कार्य किए हैं. (३)
एष देवो अमर्त्यः पर्णवीरिव दीयते. अभि द्रोणान्यासदम्.. (४)
सोम अमर हैं. ये पक्षी के उड़ने की तरह वेग से द्रोणकलश में प्रवेश करते हैं. (४)
एष विप्रैरभिष्टुतो ऽ पो देवो वि गाहते. दधद्रत्नानि दाशुषे.. (५)
सोम दिव्य और ब्राह्मणों द्वारा प्रशंसित हैं. ये जल में मिलते हैं. सोम यजमानों के लिए
धन धारण करते हैं. (५)
एष विश्वानि वार्या शूरो यन्निव सत्वभिः. पवमानः सिषासति.. (६)
शूरवीर जैसे बल प्रयोग करता है, वैसे ही सोम अपना धन देते हैं. ये बलशाली,
सामर्थ्यवान और ऐश्वर्यशाली हैं. (६)
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एष देवो रथर्यति पवमानो दिशस्यति. आविष्कृणोति वग्वनुम्.. (७)
सोम पवित्र हैं. ये यजमानों की इच्छा पूर्ति के लिए यज्ञ स्थान तक जाना चाहते हैं. ये
आवाज करते हुए यज्ञ स्थान में जाने के लिए रथ चाहते हैं. (७)
एष देवो विपन्युभिः पवमान ऋतायुभिः. हरिर्वाजाय मृज्यते.. (८)
सोम पवित्र हैं. पुरोहित सोम को साफ कर के प्रार्थनाओं से उसी तरह सजाते हैं, जैसे
युद्ध में ले जाने के लिए घोड़ों को सजाया जाता है. (८)
एष देवो विपा कृतो ऽ ति ह्वरा ꣱ सि धावति. पवमानो अदाभ्यः.. (९)
सोम पवित्र हैं और स्वयं किसी से नहीं दबते, पर ये स्वयं शत्रुओं को दबा देते हैं. (९)
एष दिवं वि धावति तिरो रजा ꣱ सि धारया. पवमानः कनिक्रदत्.. (१०)
सोम पवित्र हैं. वे छन कर धारा का रूप धर कर आवाज करते हुए शत्रुलोक को जीतते
हैं. वे यज्ञ के प्रभाव से स्वर्गलोक की ओर दौड़ते हैं. (१०)
एष दिवं व्यासत्तिरो रजा ꣱ स्यस्तृतः. पवमानः स्वध्वरः.. (११)
सोम पवित्र हैं. वे अपने यज्ञ स्थान से स्वर्गलोक के लिए प्रस्थान करते हैं. वे यज्ञ के श्रेष्ठ
साधन हैं और शत्रुओं को हरा सकने की सामर्थ्य रखते हैं. (११)
एष प्रत्नेन जन्मना देवो देवेभ्यः सुतः. हरिः पवित्रे अर्षति.. (१२)
सोम पवित्र और हरित कांति वाले हैं. देवताओं और उन की पीढ़ियों द्वारा जन्म से ही
पवित्रतापूर्वक उपयोग में लाए जाते हैं. (१२)
एष उ स्य पुरुव्रतो जज्ञानो जनयन्निषः. धारया पवते सुतः.. (१३)
सोम पुष्टतादायी आहार को पैदा करते हैं. वे स्फूर्तिदायी कार्य क्षमता उत्पन्न करने वाले
हैं. वे अपनी धाराओं से झरते हुए स्वतः ही स्वच्छ (पवित्र) हो जाते हैं. (१३)
दूसरा खंड
एष धिया यात्यण्व्या शूरो रथेभिराशुभिः. गच्छन्निन्द्रस्य निष्कृतम्.. (१)
सोम शूरवीर हैं. अंगुलियों से इन्हें निचोड़ा जाता है. ये जल्दी चलने वाले रथ से
बुद्धिपूर्वक इंद्र के पास जाते हैं. (१)
एष पुरू धियायते बृहते देवतातये. यत्रामृतास आशत.. (२)
यज्ञ स्थान में बहुत से देवता प्रतिष्ठित हैं. ये उस यज्ञ स्थल में बुद्धिपूर्वक अगणित कार्य
करने की इच्छा रखते हैं. (२)
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एतं मृजन्ति मर्ज्यमुप द्रोणेष्वार्यवः. प्रचक्राणं महीरिषः.. (३)
यजमान सोमरस को परिष्कृत कर के द्रोणकलश में भरते हैं. यह रसीला व अन्नों को
उत्पन्न करने वाला है. (३)
एष हितो वि नीयते ऽ न्तः शुन्ध्यावता पथा. यदी तुञ्जन्ति भूर्णयः.. (४)
सोम को यज्ञ स्थान पर ले जाया जाता है. वहां पर पुरोहित उसे शुद्ध करते हैं, पवित्र
बनाते हैं, तब देवताओं के हवि के रूप में इस का प्रयोग किया जाता है. (४)
एष रुक्मिभिरीयते वाजी शुभ्रेभिर २४ शुभिः. पतिः सिन्धूनां भवन्.. (५)
सोम रसों के राजा और पवित्र सफेद किरणों वाले हैं. वे घोड़े की तरह जल्दी से
याजकों के पास जाते हैं. (५)
एष शृङ्गाणि दोधुवच्छिशीते यूथ्यो ३ वृषा. नृम्णा दधान ओजसा.. (६)
शक्तिशाली बैल जैसे पशुओं के झुंड में अपना बल दिखाता है, वैसे ही सोम अपनी
शक्ति प्रकट करते हैं. सोम वैभव व बलशाली हैं. (६)
एष वसूनि पिब्दन्: परुषा ययिवाँ अति. अव शादेषु गच्छति.. (७)
सोम हिंसकों का नाश कर देते हैं. वे पीड़ा पहुंचाने के लिए भी सताते हैं. वे उन्हें सीमा
में रखते हैं. वे बहुत शक्तिशाली और क्षमतावान हैं. (७)
एतमुत्यं दश क्षिपो हरि २४ हिन्वन्ति यातवे. स्यायुधं मदिन्तमम्.. (८)
सोम मदकारी, आयुध वाले, हरित कांति वाले व भीतर की शक्ति (अंतःकरण की) धरते
हैं. दसों अंगुलियों से मसल कर इन्हें निचोड़ा जाता है. इन्हें देवताओं को चढ़ाया जाता है.
(८)
तीसरा खंड
एष उ स्य वृषा रथो ऽ व्या वारेभिरव्यत. गच्छन्वाज २४ सहस्रिणम्.. (१)
सोम हजारों घोड़ों की तरह गतिपूर्वक जाते हैं. ये रथ की तरह गतिमान हैं. इन्हें
द्रोणकलश में छलनी से छाना जाता है. ये अन्नदाता हैं. (१)
एतं त्रितस्य योष॑णो हरि २४ हिन्वन्त्यद्रिभिः. इन्दुमिन्द्राय पीतये.. (२)
इंद्र के पीने के लिए हरित कांति वाला सोमरस पत्थरों से त्रित (तीन प्रकार से स्तुतियों
के साथ पवित्र किया जाता हुआ) कूटा जा रहा है. (२)
एष स्य मानुषीष्वा श्येनो न विक्षु सीदति. गच्छं जारो न योषितम्.. (३)
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यह सोमरस मनुष्यों में उसी प्रकार जल्दी पहुंच रहा है, जैसे बाज पक्षी अपने शिकार के
पास पहुंचता है व प्रेमी अपनी प्रेमिका के पास जाता है. (३)
एष स्य मद्यो रसो ऽ व चष्टे दिवः शिशुः. य इन्दुर्वारेमाविशत्.. (४)
सोम स्वर्गलोक के शिशु (बच्चे), मददायी और सर्वद्रष्टा हैं. ये छलनी से शुद्ध होते हैं.
(४)
एष स्य पीतये सुतो हरिरर्षति धर्णसिः. क्रन्दन्त्योनिमभि प्रियम्.. (५)
सोम आवाज करते हुए अपने अभीष्ट (प्रिय) स्थान (द्रोणकलश) में जाते हैं. इन्हें
देवताओं के पीने के लिए तैयार किया जाता है. ये हरित कांति वाले हैं. ये सब को धारण
करते हैं. (५)
एतं त्य ꣳ हरितो दश मर्मृज्यन्ते अपस्युवः. याभिर्मदाय शुम्भते.. (६)
इंद्र को प्रसन्न करने के लिए सोमयाग किया जाता है. दसों अंगुलियां मलमल कर
सोमरस को शुद्ध करती हैं. (६)
चौथा खंड
एष वाजी हितो नृभिर्विश्वविन्मनसस्पतिः. अव्यं वारं वि धावति.. (१)
सोम मन के राजा, संसार को जानने वाले और घोड़े के समान तेजी से दौड़ कर
द्रोणकलश में जाते हैं. (१)
एष पवित्रे अक्षरतसोमो देवेभ्यः सुतः. विश्वा धामान्याविशन्.. (२)
सोमरस अमर व पवित्र है. वह देवताओं और उन की पीढ़ियों के लिए झरता है. यह
छन कर उन में (देवताओं में) व्याप्त हो जाता है. (२)
एष देवः शुभायते ऽ थि योनावमर्त्यः. वृत्रहा देववीतमः.. (३)
सोम देवताओं को बहुत अधिक भाते हैं. वे देवताओं की दिव्यता (दैवीभाव) को और
अधिक बढ़ा देते हैं. वे अमर और शत्रुनाशी हैं. यज्ञ के कलश में सोमरस बहुत अधिक
शोभित होता है. (३)
एष वृषा कनिक्रदद्दशभिर्जामिभिर्यतः. अभि द्रोणानि धावति.. (४)
दसों अंगुलियां मलमल कर सोमरस को निचोड़ती हैं. यह शक्तिशाली है. यह
आवाज करता व दौड़ता हुआ द्रोणकलश में पहुंचता है. (४)
एष सूर्यमरोचयत्पवमानो अधि द्यवि. पवित्रे मत्सरो मदः.. (५)
स्वर्गलोक पवित्रकारी है. सोमरस स्वर्गलोक में आनंद देने वाला है. पवित्र और छाना
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हुआ सोमरस सूर्य को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है. (५)
एष सूर्येण हासते संवसानो विवस्वता. पतिर्वाचो अदाभ्यः.. (६)
सोम बंधनमुक्त, उपासना योग्य व तेजस्वी हैं. सूर्य देव जल, वायु आदि पांच तत्त्वों में
मिलने के लिए इसे छोड़ते हैं. (६)
पांचवां खंड
एष कविरभिष्टुतः पवित्रे अधि तोशते. पुनानो घ्नन्नप द्विषः.. (१)
कवि और ज्ञानी सोमरस की उपासना करते हैं. यह पाप (रोग) नाशक, स्फूर्तिदायी और
तृप्तिदायी है. इस का रस कूट कर निकाला जाता है. (१)
एष इन्द्राय वायवे स्वर्जित्परि षिच्यते. पवित्रे दक्षसाधनः.. (२)
सोम इंद्र और वायु के लिए छन कर नीचे भूलोक पर पधारते हैं. वे पवित्र और स्वर्गिक
सुखदाता हैं. (२)
एष नृभिर्वि नीयते दिवो मूर्धा वृषा सुतः. सोमो वनेषु विश्ववित्.. (३)
सोम सर्वज्ञाता, शक्तिशाली और सर्वश्रेष्ठ हैं. मनुष्य (यजमान) इन्हें वन में वन की
उपयोगी वस्तुओं और औषध के रूप में पाते हैं. (३)
एष गव्युरुचिक्रदत्पवमानो हिरण्ययुः. इन्दुः सत्राजिदस्तुतः.. (४)
सोम का स्वरूप रसीला व स्फूर्तिदायी हैं. वे सर्वज्ञाता हैं. मनुष्य लकड़ी के बने बरतनों
से इन्हें यज्ञ में ले जाते हैं. (४)
एष शुष्यस्यिष्यददन्तरिक्षे वृषा हरिः. पुनान इन्दुरिन्द्रमा.. (५)
सोम अंतरिक्ष में शोभित होते हैं. ये घोड़े की तरह बलवान और हरे हैं. ये छलनी में
छनते हैं. ये सादर इंद्र के पास जाते हैं. (५)
एष शुष्म्यदाभ्यः सोमः पुनानो अर्षति. देवावीरघश २४ सहा.. (६)
सोम देवताओं के रक्षक, पापियों के संहारक, अविनाशी और दिव्य और वे कलश में
विराजते हैं. (६)
छठा खंड
स सुतः पीतये वृषा सोमः पवित्रे अर्षति. विघ्नन्नक्षा २४ सि देव्युः.. (१)
सोम विघ्नों को नष्ट करने वाले व दिव्य गुणों से भरपूर हैं. इन्हें इंद्र आदि देवों के लिए
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छलनी से छान कर तैयार किया गया है. (१)
स पवित्रे विचक्षणो हरिरर्षति धर्णसिः. अभि योनिं कनिक्रदत्.. (२)
सोमरस पवित्र, विलक्षण, हरा व सब को धारण करने वाला है. वह छलनी से छनते
समय आवाज करता है. (२)
स वाजी रोचनं दिवः पवमानो वि धावति. रक्षोहा वारमव्ययम्.. (३)
सोमरस शक्तिमान है. स्वर्गलोक को चमकाता है और दुष्टों का नाश करता है. वह दिव्य
है और छनता हुआ लगातार प्रवाहित होता रहता है. (३)
स त्रितस्याधि सानवि पवमानो अरोचयत्. जामिभिः सूर्य २ सह.. (४)
सोम अपने तेज से सूर्य के साथ प्रकाशित होते हैं. त्रितयज्ञ (प्रकृति, प्राणी और आकाश
के बीच आदानप्रदान पूर्ण यज्ञ) में विधिविधान से सुशोभित होते हैं. (४)
स वृत्रहा वृषा सुतो वरिवोविद्ददाभ्यः. सोमो वाजमिवासरत्.. (५)
सोम शत्रुनाशक, शक्तिवर्द्धक व धनदाता हैं. निचोड़ कर निकाले जाते समय ये घोड़े के
समान वेगवान हो कर घड़े में प्रवेश करते हैं. (५)
स देवः कविनेषितो ३ ऽ भि द्रोणानि धावति. इन्दुरिन्द्राय म २ हयन्.. (६)
सोम इंद्र और अन्य देवों का महत्त्व बढ़ाते हैं. सोमयज्ञ करने वाले यजमान उन्हें वेग से
कलश में प्रवाहित करते हैं और स्वर्गलोक में प्रकाशित होते हैं. (६)
सातवां खंड
यः पावमानीरध्येत्यूषिभिः संभृत २४ रसम्.
सर्व २४ स पूतमश्नाति स्वदितं मातरिश्वना.. (१)
जो यजमान ऋषियों द्वारा संकलित जीवन की उपयोगी बातों में ध्यान लगाता है,
पवित्रकारी सूक्तों (मंत्रों, स्तुतियों) का पाठ करता है वह यजमान पवित्र और पोषक अन्नादि
रसों का आनंद लेता है. (१)
पावमानीयो अध्येत्यृषिभिः संभृत २४ रसम्.
तस्मै सरस्वती दुहे क्षीर २४ सर्पिर्मधूदकम्.. (२)
ऋषियों ने वेद मंत्रों की रचना की है. जो यजमान उन का अध्ययनमनन करता है, उस
का ज्ञान बढ़ाने के लिए सरस्वती सहायता करती हैं. उस यजमान के लिए शहद, दूध, घी
आदि पोषक स्वयं प्रदान करती हैं. (२)
पावमानीः स्वस्त्ययनीः सुदुघा हि घृतश्रुतः.
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ऋषिभिः संभृतो रसो ब्राह्मणेष्वमृत ॐ हितम्.. (३)
ऋषियों ने जो मंत्र रचे हैं, वे मंत्र ब्राह्मणों के लिए अमृत सरीखे कल्याणकारी, हितकारी
व घी से चुए हुए हैं. वे स्नेह की धाराओं से सने हुए और श्रेष्ठ फलदायी हैं. (३)
पावमानीर्दधन्तु न इमं लोकमथो अमुम्.
कामान्त्समर्धयन्तु नो देवीर्देवैः समाहृताः.. (४)
देवी और देवताओं ने मंत्र संकलित किए हैं. वे मंत्र न केवल इस लोक में बल्कि
परलोक में भी हमारे लिए कल्याणकारक हों. वे हमारी सारी इच्छाएं पूरी करने वाले हों. (४)
येन देवाः पवित्रेणात्मानं पुनते सदा. तेन सहस्रधारेण पावमानीः पुनन्तु नः.. (५)
देवतागण जिन से सदा अपने को निर्मल (पवित्र) बनाते हैं, वैसी ही हजारों धाराओं से
वेदों के मंत्र हमें पवित्र बनाने की कृपा करें. (५)
पावमानीः स्वस्त्ययनीस्ताभिर्गच्छति नान्दनम्.
पुण्याँ श्च भक्षान्भक्षयत्यमृतत्वं च गच्छति.. (६)
जो यजमान पवित्रतादायी मंत्रों से प्रेरणा लेता है, जो यजमान हितकारी मंत्रों में रुझान
रखता है, वह परमानंद का भागी होता है. वह पुण्य अर्जित कराने वाले अन्न को खाता है
और अमरता का भागीदार होता है. (६)
आठवां खंड
अगन्म महा नमसा यविष्ठं यो दीदाय समिद्धः स्वे दुरोणे.
चित्रभानु ॐ रोदसी अन्तरूर्वी स्वाहुतं विश्वतः प्रत्यञ्चम्.. (१)
हे अग्नि! कौन सी ऐसी जगह है, जहां आप नहीं जा सकते? आप स्वर्गलोक और
पृथ्वीलोक में भलीभांति प्रज्वलित (प्रकाशित) होते हैं. आप खूब प्रकाशवान, अच्छी
आहुतियों वाले व युवा हैं. हम आप को नमस्कार करते हैं और आप की शरण में हैं. (१)
स मह्ना विश्वा दुरितानि साह्वानग्नि ष्टवे दम आ जातवेदाः.
स नो रक्षिषद्वुरितादवद्यादस्मान्गृणत उत नो मघोनः.. (२)
हे अग्नि! आप का प्रकाश ज्ञान वाला है. आप उस प्रकाश को फैलाते रहते हैं. आप
तेजस्वी हैं और संसार के सभी पापों का नाश करने में समर्थ हैं. आप दुष्कर्म करने से हमें
रोकते हैं और हमारी रक्षा करते हैं. आप हमारी आहुतियों को ग्रहण करते हैं. आप हमारे प्रति
कल्याण की भावना धारण करते हैं. (२)
त्वं वरुण उत मित्रो अग्ने त्वां वर्धन्ति मतिभिर्वसिष्ठाः.
त्वे वसु सुषणनानि सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (३)
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हे अग्नि! वसिष्ठ ऋषि विशेष बुद्धिपूर्वक आप की स्तुति करते हैं. आप वरुण व मित्र
स्वरूप हैं. आप के धन कल्याणकारी हों. आप अपनी मंगलकारी भावनाओं से हमारी रक्षा
कीजिए. (३)
महाँ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव. स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे.. (४)
इंद्र महान व प्रकाशमान हैं. वे अपने प्रिय भक्तों की स्तुतियों से बढ़ोतरी पाते हैं. वे
बरसने वाले बादलों की भांति हैं. उपासक उन के पुत्र की तरह हैं. (४)
कण्वा इन्द्रं यदक्रत स्तोमैर्यज्ञस्य साधनम्. जामि ब्रुवत आयुधा.. (५)
हे इंद्र! ऐसा कहा जाता है कि उस समय यज्ञ की निगरानी या रक्षा के लिए किसी भी
साधन की जरूरत नहीं रह जाती, जब कण्व जैसे ऋषि अपनी स्तुतियों से आप को यज्ञ का
रक्षक बना लेते हैं. (५)
प्रजामृतस्य पिप्रतः प्र यद्भरन्त वह्नयः. विप्रा ऋतस्य वाहसा.. (६)
दिव्य अग्नियां आकाश में भर जाती हैं. वे तीव्र गति से इंद्र को यज्ञ स्थान पर पहुंचा
देती हैं. तब ब्राह्मणगण उन की स्तुति करते हैं. (६)
नौवां खंड
पवमानस्य जिघ्नतो हरेश्चन्द्रा असृक्षत. जीरा अजिरशोचिषः.. (१)
हे सोम! आप हरे हैं. आप के रस की धारा प्रसन्नतादायक है. वह छन कर और साफ हो
कर झरती है. आप शत्रुनाशक हैं और सब जगह जा सकते हैं. (१)
पवमानो रथीतमः शुभ्रेभिः शुभ्रशस्तमः. हरिश्चन्द्रो मरुद्गणः.. (२)
हे सोम! आप पवित्र, उच्चतम स्थान पर शोभित, उज्ज्वलतर से उज्ज्वलतम, हरित
शोभा वाले व सब को प्रसन्नता देने वाले हैं. आप को पुष्ट बनाने में मरुद्गण भी आप की
सहायता करते हैं. (२)
पवमान व्यश्रुहि रश्मिभिर्वाजसातमः. दधत्स्तोत्रे सुवीर्यम्.. (३)
हे सोम! आप पवित्र हैं. आप घोड़े की तरह अपनी किरणों से सर्वत्र पहुंच जाते हैं. आप
यजमानों को अच्छा वीर्य (श्रेष्ठ संतान) प्रदान करते हैं. (३)
परीतो षिञ्चता सुत १s सोमो य उत्तम १s हविः.
दधन्वाँ यो नर्यो अप्स्व ३ s न्तरा सुषाव सोममद्रिभिः.. (४)
यजमान जल में सोम को मिलाते हैं. वे पत्थरों से कूट कर सोमरस निकालते हैं. वह
देवताओं के लिए श्रेष्ठ है. यजमान उस से सब ओर सींचें. (४)
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नूनं पुनानो ऽ विभिः परि स्रवादब्धः सुरभिंतरः.
सुते चित्वाप्सु मदामो अंधसा श्रीणन्तो गोभिरुत्तरम्.. (५)
हे सोम! छान कर, शुद्ध बना कर आप को गायों के दूध के साथ मिला लिया जाता है.
इतना हो जाने पर आप को जल में मिलाया जाता है. तब आप अच्छी तरह सेवन योग्य हो
जाते हैं. आप अमर और बहुत सुगंध वाले हैं. (५)
परि स्वानश्चक्षसे देवमादनः क्रतुरिन्दुुर्विचक्षणः.. (६)
सोमरस विलक्षण है और देवताओं के लिए आनंददायी है, यज्ञ का प्रमुख साधन है. सब
को देखने के लिए सोम कलश में स्थित रहने की कृपा करें. (६)
असावि सोमो अरुषो वृषा हरी राजेव दस्मो अभि गा अचिक्रदत्.
पुनानो वारमत्येष्यव्यय ९४ श्येनो न योनिं घृतवन्तमासदत्.. (७)
सोम हरे रंग के, शक्तिवर्द्धक, प्रकाशित व राजा के समान दर्शनीय हैं. इन के रस को
भेड़ के बालों से बनी छलनी में छाना जाता है. गाय के दूध में मिल कर सोमरस और अधिक
पवित्र हो जाता है. वह जल से भरे हुए कलशों में वैसे ही प्रवेश करता है, जैसे वेग से उड़ता
हुआ पक्षी उतरता है. (७)
पर्जन्यः पिता महिषस्य पर्णिनो नाभा पृथिव्या गिरिषु क्षयं दधे.
स्वसार आपो अभि गा उदासरन्त्सं ग्रावभिर्वसते वीते अध्वरे.. (८)
सोम पर्वत पर निवास करते हैं. वे पर्वत पृथ्वी की नाभि पर स्थित हैं और उन के पत्ते
खूब बड़ेबड़े होते हैं. बरसने वाले बादल उन के पिता हैं. वे गाय के दूध, पानी और स्तुतियों से
यज्ञ स्थल पर पधार वहां प्रतिष्ठित होते हैं. (८)
कविर्वेधस्या पर्येषि माहिनमत्यो न मृष्टो अभि वाजमर्षसि.
अपसेधन् दुरिता सोम नो मृड घृता वसानः परि यासि निर्णिजम्.. (९)
हे सोम! आप विद्वानों द्वारा जाने जाते हैं और जलमय हैं. आप छलनी में छन कर वैसे
ही द्रोणकलश में वेग से जा कर स्थित रहते हैं, जैसे संग्राम स्थल पर जाने वाले घोड़े वेग से
वहां जा कर स्थित रहते हैं. आप हमें बुरी बातों और आदतों से दूर रखिए. हमें सब सुख
प्रदान कीजिए. (९)
दसवां खंड
श्रायन्त इव सूर्य विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत.
वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिमः.. (१)
हे यजमानो! इंद्र उसी तरह प्रचुर वैभव को बांटते हैं, जैसे सूर्य किरणों को (अपने में)
बांटते हैं. हम उन की कृपा से वैसे ही धन पाते हैं, जैसे पिता की कृपा से हम उन से संपत्ति
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का हिस्सा पाते हैं. (१)
अलर्षिरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः.
यो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन्.. (२)
इंद्र सज्जनों (भद्र) को धन प्रदान करते हैं. उन के दान बहुत कल्याणकारी हैं. यजमान
जब उन से कुछ चाहते हैं तो उन का मन उन्हें उस दान के लिए प्रेरित करता है. अतः हे
यजमानो! आप सब उन की स्तुति करो. (२)
यत इन्द्र भयामहे ततो नो अभयं कृधि.
मघवञ्छग्धि तव तन्न ऊतये वि द्विषो वि मृधो जहि.. (३)
हे इंद्र! आप हमें उन सब से अभय प्रदान कीजिए, जिन से हमें भय लगता है. आप हम
से विद्वेष रखने वालों को नष्ट कीजिए. आप हिंसकों का नाश कीजिए. आप हमारी रक्षा
कीजिए. आप सामर्थ्यवान हैं. (३)
त्व २४ हि राधसस्पते राधसो महः क्षयस्यासि विधर्ता.
तं त्वा वयं मघवन्निन्द्र गिर्वणः सुतावन्तो हवामहे.. (४)
हे इंद्र! आप धनपति, बहुत धनधारी एवं उपास्य हैं. हम यजमान शुद्ध और पवित्र
सोमरस का आनंद लेने के लिए आप को आमंत्रित करते हैं. (४)
ग्यारहवां खंड
त्व २४ सोमासि धारयुर्मन्द्र ओजिष्ठो अध्वरे. पवस्य म २४ हयद्रयिः.. (१)
हे सोम! आप बलिष्ठ व पवित्र हैं. आप यज्ञ में धारा से वैभवयुक्त मार्ग बनाते हैं. आप
धनदाता व शक्तिदाता हैं. आप शुद्ध हो कर कलश में विराजिए. (१)
त्व २४ सुतो मदिन्तमो दध्वन्वान्मत्सरिन्तमः. इन्दुः सत्राजिदस्तुतः.. (२)
हे सोम! आप मददायी, बलधारी, यज्ञ के मूलाधार, प्रकाशित, स्फूर्तिदायी और शत्रुओं
को जीतने वाले हैं. आप को जीता नहीं जा सकता. (२)
त्व २४ सुष्वाणो अद्रिभिर्भ्यर्ष कनिक्रदत्. द्युमन्त २४ शुष्ममा भर.. (३)
हे सोम! पत्थरों से कूटकूट कर आप का रस निकाला व निचोड़ा जाता है. आप हमें
ओज और सामर्थ्य प्रदान करने की कृपा करें. आप आवाज करते हुए कलश में प्रवेश करने
की कृपा कीजिए. (३)
पवस्व देववीतय इन्दो धाराभिरोजसा. आ कलशं मधुमान्त्सोम नः सदः.. (४)
हे सोम! आप मधुरतायुक्त हैं. आप देवताओं की तृप्ति के लिए अपनी ओजयुक्त
धाराओं से सदैव हमारे कलशों में आइए. (४)
तव द्रप्सा उदप्रुत इन्द्रं मदाय वावृधुः. त्वां देवासो अमृताय कं पपुः.. (५)
हे सोम! आप का रस जल से ओतप्रोत है. आप को इंद्र का यश और आनंद बढ़ाने के
लिए उन्हें पिलाया जाता है. देवगण अमरता के लिए आप को पीते हैं. (५)
आ नः सुतास इन्दवः पुनाना धावता रयिम्. वृष्टिद्यावो रीत्यापः स्वर्विदः.. (६)
हे सोम! आप आत्मज्ञाता, रसीले और यजमान के लिए बादलों से पानी बरसाने की
भांति धन बरसाने वाले हैं. आप हमारे लिए वैभव प्रदान करने की कृपा कीजिए. (६)
परि त्य ॐ हर्यत ॐ हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण.
यो देवान्विश्वाँ इत्परि मदेन सह गच्छति.. (७)
सोमरस आनंद के साथ सभी देवताओं तक पहुंचता है. हरे सोमरस को छलनी से छान
कर साफ किया जाता है. सोम पापों से रोकते हैं और मन को हरने वाले (मनोहर) हैं. (७)
द्विर्यं पञ्च स्वयशस ॐ सखायो अद्रिस ॐ हतम्.
प्रियमिन्द्रस्य काम्यं प्रस्नापयन्त ऊर्मयः.. (८)
सोमरस पत्थरों से कूट कर निकाला जाता है. इन्हें दोनों हाथों की दस अंगुलियां साफ
करती हैं और जलमय बनाती हैं. ये तरंगों की तरह लहराते हैं. ये सभी को प्रिय, सभी के मित्र
और इंद्र के काम्य (चाहे गए) हैं. (८)
इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे. नरे च दक्षिणावते वीराय सदनासदे.. (९)
हे सोम! आप वृत्रनाशक इंद्र के लिए द्रोणकलश में स्थित रहिए. आप यज्ञ में दक्षिणा
देने वाले और यज्ञकर्ता यजमान के लिए मटके में बने रहिए व स्थिर रहिए. (९)
पवस्व सोम महे दक्षायश्वो न निक्तो वाजी धनाय.. (१०)
हे सोम! आप पवित्र हैं. आप शत्रुनाशक हैं. आप धन और बल के लिए पात्र में
पधारिए. आप घोड़े जैसे वेगवान और बलवान हैं. (१०)
प्र ते सोतारो रसं मदाय पुनन्ति सोमं महे द्युम्नाय.. (११)
हे सोम! पृथ्वी पर यजमान आनंद पाने के लिए आप के रस को साफ कर के छानते हैं.
(११)
शिशुं जज्ञान ॐ हरिं मृजन्ति पवित्रे सोमं देवेभ्य इन्दुम्.. (१२)
हे सोम! तुरंत पैदा हुए बच्चे को नहला कर जैसे साफ किया जाता है, वैसे ही यजमान
आप को साफ करते हैं. आप को देवों के लिए छलनी में छाना जाता है. (१२)
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उपो षु जातमप्तुरं गोभिर्भङ्गं परिष्कृतम्. इन्दुं देवा अयासिषुः.. (१३)
हे सोम! देवगण आप का रस पीते हैं. उसे गाय के दूध और जल में मिला कर परिष्कृत
किया गया है. वह चमकीला है. (१३)
तमिद्वर्धन्तु नो गिरो वत्सꣳ संशिश्वरीरिव. य इन्द्रस्य हृदꣳसनिः.. (१४)
माता जैसे शिशु के शरीर को अपने दूध से बढ़ाती है, वैसे ही हमारी स्तुतियां सोम की
बढ़ोतरी करें. वे इंद्र के हृदय में निवास करते हैं. (१४)
अर्षा नः सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम्. वर्धा समुद्रमुक्थ्य.. (१५)
हे सोम! आप उपास्य हैं और समुद्र की तरह उमड़ कर श्रेष्ठ पात्र में विराजिए. हमारे घर
धनधान्य से भरे रहें. आप की कृपा से हमारा गोधन भी सुखी रहे. (१५)
बारहवां खंड
आ घा ये अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (१)
इंद्र जवान व यजमान के मित्र हैं. यजमान अग्नि को प्रज्वलित करते हैं. यजमान
देवताओं के लिए कुश के आसन बिछाते हैं. (१)
बृहन्निदिध्म एषां भूरि शसं पृथुः स्वरुः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (२)
यजमान के पास देवताओं के लिए भरपूर समिधाएं, प्रचुर शस्त्र, अगणित प्रार्थनाएं हैं.
इंद्र इन यजमानों के मित्र हैं और वे सदा जवान हैं. (२)
अयुद्ध इद्युधा वृत्तꣳ शूर आजति सत्वभिः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (३)
युवा इंद्र जिन यजमानों के मित्र हैं वे युद्ध में रुचि नहीं रखते हैं, फिर भी शक्तिशाली
सैन्य बल वाले शत्रु को हरा सकते हैं. (३)
य एक इद्विदयते वसु मर्ताय दाशुषे. ईशानो अप्रतिष्कुत इन्द्रो अङ्ग.. (४)
इंद्र संसार के ईश्वर और यजमानों को भरपूर वैभव देने वाले हैं. वे अकेले ही शत्रुओं को
हराने के लिए पर्याप्त हैं. (४)
यश्चिद्धि त्वा बहुभ्य आ सुतावाँ आविवासति. उग्रं तत्पत्यते शव इन्द्रो अङ्ग.. (५)
हे इंद्र! लाखों में से जो कोई यजमान सोमयज्ञ से आप को भजता है, आप उसे जल्दी
ही ओजस्वी बना देते हैं. (५)
कदा मर्तमराधसं पदा क्षुम्पमिव स्फुरत्. कदा नः शुश्रवद्गिर इन्द्रो अङ्ग.. (६)
हे इंद्र! आप स्तुति न करने वालों को मामूली पौधों की तरह कब हटाएंगे? कब आप
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आराधना करने वाले हम लोगों की स्तुति सुनेंगे? (६)
गायन्ति त्वा गायत्रिणो ऽ र्चन्त्यर्कमर्किणः.
ब्रह्माणस्त्वा शतक्रत उद् वंशमिव येमिरे.. (७)
हे इंद्र! आप सैकड़ों कार्य करने वाले हैं. हम यजमान मंत्रों से आप के लिए यज्ञ करते
हैं. हम आप की महिमा का गुणगान करते हैं. आप ब्रह्मविद हैं. बांस की तरह आप को ऊंची
पदवी प्रदान करते हैं. (७)
यत्सानोः सान्वारुहो भूर्यस्पष्ट कृत्वम्.
तदिन्द्रो अर्थं चेतति यूथेन वृष्णिरेजति.. (८)
यजमान सोमवल्ली आदि समिधा लाने के लिए पर्वत के शिखर पर जाते हैं. वे अनेक
कर्म वाले यज्ञ करते हैं. इंद्र यजन करने वाले यजमान के मन के उद्देश्य को जान जाते हैं.
तब वे यजमान की इच्छा पूरी करने के लिए अन्य देवताओं के साथ यज्ञ में जाने के लिए
तैयार होते हैं. (८)
युंक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा. अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर.. (९)
हे इंद्र! आप सोमरस पीने वाले हैं. आप के घोड़े गरदन पर अच्छे बाल वाले व मजबूत
अंगों वाले हैं. आप उन घोड़ों को रथ में जोतिए और हमारी स्तुति सुनने के लिए यज्ञ में
पधारिए. (९)