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सर्वकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 218, कुल 310 में से

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पृष्ठ 218

हुआ सोमरस सूर्य को प्रकाशित करने की सामर्थ्य रखता है. (५)
एष सूर्येण हासते संवसानो विवस्वता. पतिर्वाचो अदाभ्यः.. (६)
सोम बंधनमुक्त, उपासना योग्य व तेजस्वी हैं. सूर्य देव जल, वायु आदि पांच तत्त्वों में
मिलने के लिए इसे छोड़ते हैं. (६)
पांचवां खंड
एष कविरभिष्टुतः पवित्रे अधि तोशते. पुनानो घ्नन्नप द्विषः.. (१)
कवि और ज्ञानी सोमरस की उपासना करते हैं. यह पाप (रोग) नाशक, स्फूर्तिदायी और
तृप्तिदायी है. इस का रस कूट कर निकाला जाता है. (१)
एष इन्द्राय वायवे स्वर्जित्परि षिच्यते. पवित्रे दक्षसाधनः.. (२)
सोम इंद्र और वायु के लिए छन कर नीचे भूलोक पर पधारते हैं. वे पवित्र और स्वर्गिक
सुखदाता हैं. (२)
एष नृभिर्वि नीयते दिवो मूर्धा वृषा सुतः. सोमो वनेषु विश्ववित्.. (३)
सोम सर्वज्ञाता, शक्तिशाली और सर्वश्रेष्ठ हैं. मनुष्य (यजमान) इन्हें वन में वन की
उपयोगी वस्तुओं और औषध के रूप में पाते हैं. (३)
एष गव्युरुचिक्रदत्पवमानो हिरण्ययुः. इन्दुः सत्राजिदस्तुतः.. (४)
सोम का स्वरूप रसीला व स्फूर्तिदायी हैं. वे सर्वज्ञाता हैं. मनुष्य लकड़ी के बने बरतनों
से इन्हें यज्ञ में ले जाते हैं. (४)
एष शुष्यस्यिष्यददन्तरिक्षे वृषा हरिः. पुनान इन्दुरिन्द्रमा.. (५)
सोम अंतरिक्ष में शोभित होते हैं. ये घोड़े की तरह बलवान और हरे हैं. ये छलनी में
छनते हैं. ये सादर इंद्र के पास जाते हैं. (५)
एष शुष्म्यदाभ्यः सोमः पुनानो अर्षति. देवावीरघश २४ सहा.. (६)
सोम देवताओं के रक्षक, पापियों के संहारक, अविनाशी और दिव्य और वे कलश में
विराजते हैं. (६)
छठा खंड
स सुतः पीतये वृषा सोमः पवित्रे अर्षति. विघ्नन्नक्षा २४ सि देव्युः.. (१)
सोम विघ्नों को नष्ट करने वाले व दिव्य गुणों से भरपूर हैं. इन्हें इंद्र आदि देवों के लिए
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