सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
अठारहवां अध्याय
अठारहवां अध्याय
पहला खंड
पन्यंपन्यमित्सोतार आ धावत मद्याय. सोमं वीराय शूराय.. (१)
हे यजमानो! आप सोमरस तैयार करने में लगे हुए हो. आप शूरवीर इंद्र को सोमरस भेंट
कीजिए. सोमरस मददायी है. आप जल्दीजल्दी दौड़ कर वह सोमरस इंद्र को भेंट कीजिए.
(१)
एह हरी ब्रह्मयुजा शग्मा वक्षतः सखायम्. इन्द्रं गीर्भिर्गिर्वणसम्.. (२)
इंद्र के घोड़े वाणी के संकेत से ही रथ में जुत जाते हैं. इंद्र हमारे सखा व वाणी से
उपास्य हैं. इंद्र के घोड़े उन्हें ले कर यज्ञ में आने की कृपा करें. (२)
पाता वृत्रहा सुतमा घा गमन्नारे अस्मत्. नि यमते शतमूतिः.. (३)
हे इंद्र! आप वृत्रासुर हंता व सोमपायी हैं. आप दुश्मनों को दूर भगाने व हमारे यज्ञ में
अवश्य पधारने की कृपा कीजिए. (३)
आ त्वा विशन्त्विन्दवः समुद्रमिव सिन्धवः. न त्वामिन्द्राति रिच्यते.. (४)
हे इंद्र! आप के अतिरिक्त और कोई देव श्रेष्ठ नहीं हैं. आप को सोमरस वैसे ही प्राप्त हो,
जैसे समुद्र को नदियां प्राप्त होती हैं. (४)
विव्यक्थ महिना वृषन्भक्ष १७ सोमस्य जागृवे. य इन्द्र जठरेषु ते.. (५)
हे इंद्र! आप जाग्रत व शक्तिमान हैं. सोम के कारण आप की ख्याति बहुत व्यापक है.
आप के जठर (पेट) में पहुंचा हुआ सोम भी प्रशंसा प्राप्त करता है. (५)
अरं त इन्द्र कुक्षये सोमो भवतु वृत्रहन्. अरं धामभ्य इन्दवः.. (६)
हे इंद्र! आप ने वृत्रासुर का हनन किया. हम ने आप को जो सोमरस भेंट किया, वह
आप के लिए भरपूर हो. वह सोमरस अन्य देवताओं के लिए भी भरपूर हो. (६)
जराबोध तद्विविड्ढि विशेविशे यज्ञियाय. स्तोम १७ रुद्राय दृशीकम्.. (७)
हे अग्नि! आप को प्रार्थनाओं से प्रज्वलित किया जाता है. आप बारबार यजमानों के
कल्याण के लिए यज्ञ मंडप में प्रकट होने की कृपा कीजिए. यजमान रुद्र के लिए अच्छे स्तोत्र
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बोले. (७)
स नो महाँ अनिमानो धूमकेतुः पुरुश्चन्द्रः धिये वाजाय हिन्वतु.. (८)
हे अग्नि! आप की ध्वजा बहुत ही धूम्रमय (धुएं वाली) है. आप महान व आनंददायी हैं.
आप हमें बौद्धिक वैभव प्रदान करने की कृपा कीजिए. (८)
स रेवाँ इव विशपतिर्दैव्यः केतुः शृणोतु नः. उक्थैरग्निबृहद्भानुः.. (९)
हे अग्नि! आप विश्वपालक, दिव्य, दूरदर्शी व राजा जैसे हैं. आप वाणी से की गई हमारी
स्तुति को सुनने की कृपा कीजिए. (९)
तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने. शं यद्गवे न शाकिने.. (१०)
हे यजमानो! आप इंद्र के लिए एकत्रित हो कर प्रार्थनाएं गाइए. इंद्र को स्तोत्र ऐसे प्रिय
लगते हैं, जैसे गायों को घास. (१०)
न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः. यत्सीमुपश्रवद्गिरः. (११)
हे इंद्र! स्तुति से भरी हुई हमारी वाणियां जब आप के समीप पहुंचती हैं तो आप
यजमान को धनवान और गोवान बनाने में नहीं चूकते हैं. (११)
कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा ग्मत्. शचीभिरप नो वरत्.. (१२)
हे इंद्र! चोर व डाकू जो गाएं चुराते हैं, आप उन गायों को अपने अधीन कर लेते हैं.
आप उन गायों से हमें गोवान बना देते हैं. (१२)
दूसरा खंड
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम्. समूढमस्य पा ꣳ सुले.. (१)
विष्णु ने अपने पैरों को तीन प्रकार से रखा. उन पैरों की पदधूलि में ही सारा संसार
समा गया. (१)
त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः. अतो धर्माणि धारयन्.. (२)
विष्णु अपने तीन पैरों में धर्म को धारण करते हुए संसार को संचालित करते हैं. वे सर्वत्र
व्याप्त हैं. (२)
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३)
हे यजमानो! आप विष्णु के कर्मों को देखने की कृपा कीजिए. उन कर्मों के वे प्रेरक
और इंद्र के योग्य मित्र हैं. (३)
तद्विष्णोः परमं पद ꣳ सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (४)
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स्वर्गलोक में स्थित सूर्य को जैसे साधारण आंखों से आसानी से देख सकते हैं, वैसे ही
बुद्धिमान यजमान विष्णु के परमपद को देख लेते हैं. (४)
तद्विप्रासो विपन्युवो जागृवा ꣳ सः समिन्धते. विष्णोर्यत्परमं पदम्.. (५)
जाग्रत यजमान अपने श्रेष्ठ यज्ञ कर्मों से विष्णु के श्रेष्ठ पद को प्राप्त करते हैं. (५)
अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे. पृथिव्या अधि सानवि.. (६)
विष्णु ईश्वर हैं. उन्होंने पृथ्वी के सब से ऊंचे स्थान से अपनी प्रतिष्ठा स्थापित की है. उस
श्रेष्ठ लोक से देवता हमारी रक्षा करने की कृपा करें. (६)
मो षु त्वा वाघतश्च नारे अस्मन्नि रीरमन्.
आरात्ताद्वा सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि.. (७)
हे इंद्र! आप हम से बहुत दूर हैं. फिर भी हमारे यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. हमारे
मन की भावनाओं से हुई प्रार्थनाओं पर ध्यान देने की कृपा कीजिए. विद्वानों का ज्ञान भी
आप को हम से दूर न कर सके. हमारा आप से यही अनुरोध है. (७)
इमे हि ते ब्रह्मकृतः सु ते सचा मधौ न मक्ष आसते.
इन्द्रे कामं जरितारो वसूयवो रथे न पादमा दधुः.. (८)
हे इंद्र! हम आप के लिए सोमरस तैयार कर के उसी तरह बैठे हुए हैं, जिस तरह शहद
पर मधुमक्खियां बैठती हैं. वीर जैसे धन की इच्छा से रथ पर पैर रखता है, वैसे ही हम भी
धन की इच्छा से आप पर अपनी आशाएं केंद्रित कर रहे हैं. (८)
अस्तावि मन्म पूर्व्यं ब्रह्मेन्द्राय वोचत.
पूर्वीरृतस्य बृहतीरनूषत स्तोतुर्मेधा असृक्षत.. (९)
हे यजमानो! आप इंद्र के लिए प्रार्थनाएं याद कीजिए, उन प्रार्थनाओं को गाइए. पहले
यज्ञों में हम ने बृहती छंद में साम गाए. इस से यजमानों में बुद्धि उपजती है और वह बुद्धि
मंजती है. (९)
समिन्द्रो रायो बृहतीरधूनुत सं क्षोणी समु सूर्यम्.
स ꣳ शुक्राः शुचयः सं गवाशिरः सोमा इन्द्रममन्दिषुः.. (१०)
हे इंद्र! गाय के दूध में मिला हुआ सोमरस आप के लिए समर्पित है. यह मददायी है.
आप इस से तृप्त होइए. आप हमें सूर्य जैसी प्रकाश वाली गाएं और धन प्रदान कीजिए.
(१०)
इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे.
नरे च दक्षिणावते वीराय सदनासदे.. (११)
हे इंद्र! आप ने वृत्रासुर का नाश किया. आप दक्षिणा दाता हैं. आप को मद देने के लिए
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द्रोणकलश में स्थिर किया जाता है. यजमानों की मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए सोमरस
को सत्पात्र में रखा जाता है. (११)
त ऽ४ सखायः पुरूरुचं वयं यूयं च सूरयः.
अश्याम वाजगन्ध्य ऽ४ सनेम वाजपस्त्यम्.. (१२)
हे यजमानो! तुम सब और हम सब सोमरस को प्राप्त करें. वह सोमरस दूधिया
(सफेद), पराक्रमी, स्फूर्तिदायी, सुगंधमय और क्षमताशाली है. (१२)
परि त्य ऽ४ हर्यत ऽ४ हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण.
यो देवान् विश्वाँ इत् परि मदेन सह गच्छति.. (१३)
सोमरस हरा, भूरा व मनोहर है. वह सभी देवताओं की प्रसन्नता के साथ द्रोणकलश में
जाता है. (१३)
कस्तमिन्द्र त्वा वसवा मर्त्यो दधर्षति.
श्रद्धा इत् ते मघवन पार्ये दिवि वाजी वाजं सिषासति.. (१४)
हे इंद्र! किस में इतनी सामर्थ्य है जो आप का तिरस्कार कर दे. आप ऐश्वर्यशाली हैं.
आप के भक्त आप के प्रति श्रद्धा के कारण ही दुर्दिन में आप से शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त
करते हैं. (१४)
मघोनः स्म वृत्रहत्येषु चोदय ये ददति प्रिया वसु.
तव प्रणीती हर्यश्व सूरिभिर्विश्वा तरेम दुरिता.. (१५)
हे इंद्र! आप ऐश्वर्यशाली और अश्ववान हैं. आप वृत्रासुर जैसे अत्याचारियों को नष्ट
करने की शक्ति दीजिए. यजमानों को देने के लिए आप प्रिय धनों को प्रेरित कीजिए. शूरवीर
और ज्ञानी आप की कृपा से पापों से छुटकारा पाएं. (१५)
तीसरा खंड
एदु मधोर्मदिन्तर ऽ४ सिञ्चाध्वर्यो अन्धसः. एवा हि वीर स्तवते सदावृधः.. (१)
हे यजमानो! सोमरस मधुर, सुखदायी व इंद्र के लिए आनंददायी है. आप इंद्र की स्तुति
कीजिए. वे ही स्तुति के योग्य हैं. आप सोमरस भी उन्हीं की सेवा में समर्पित कीजिए. (१)
इन्द्र स्थातर्हरीणां न किष्टे पूर्व्यस्तुतिम्. उदान ऽ४ श शवसा न भन्दना.. (२)
हे इंद्र! आप अश्वपति हैं. ऋषियों ने आप के लिए प्रार्थनाएं रची हैं. उन प्रार्थनाओं को
(आप द्वारा दी गई) सामर्थ्य के अलावा और किसी तरह नहीं प्राप्त किया जा सकता है. (२)
तं वो वाजानां पतिमहूमहि श्रवस्यवः. अप्रायुभिर्यज्ञेभिर्वावृधेन्यम्.. (३)
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हे इंद्र! आप वैभवशाली, धनपति व फुर्तीले हैं. यजमान जो यज्ञ करते हैं, उन यज्ञों से
आप बढ़ोत्तरी प्राप्त करते हैं. हम आप का आह्वान करते हैं. (३)
तं गूर्धया स्वर्णरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे. देवत्राहव्यमूहिषे.. (४)
हे यजमानो! यज्ञ देवलोक का प्रतिनिधित्व करते हैं. आप इन यज्ञों की पूजा कीजिए.
इन यज्ञों के माध्यम से यजमान दिव्य विभूतियां पाते हैं और धारण करते हैं. अग्नि हमारी
हवियों को देवताओं तक पहुंचाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं. (४)
विभूतरातिं विप्र चित्रशोचिषमग्निमीडिष्व यन्तुरम्.
अस्य मेधस्य सोम्यस्य सोभरे प्रेमध्वराय पूर्व्यम्.. (५)
हे ब्राह्मणो! आप अग्नि की उपासना कीजिए. यज्ञ की सफलता के लिए आप को यह
उपासना करनी है. वे अतिशय वैभवदाता, प्रकाशमान, श्रेष्ठ और यज्ञ के प्रमुख हैं. (५)
आ सोम स्वानो अद्रिभिस्तिरो वाराण्यव्यया.
जनो न पुरि चम्वोर्विशद्धरिः सदो वनेषु दध्रिषे.. (६)
हे सोम! पत्थरों से कूट कर आप का रस निकाला गया है, छान कर उस रस को पवित्र
किया गया है. हरा सोमरस वन की लकड़ी के बने पात्र में उसी तरह प्रवेश कर रहा है, जैसे
शूरवीर अपनी वीरता से नगर में प्रवेश करने जाता है. (६)
स मामृजे तिरो अण्वानि मेष्यो मीढ्वांत्सप्तिर्न वाजयूः.
अनुमाद्यः पवमानो मनीषिभिः सोमो विप्रेभिर्ऋक्वभिः.. (७)
ब्राह्मण ऋत्विज् सोमरस को पवित्र कर रहे हैं. स्तोत्रों से वे इस की प्रशंसा कर रहे हैं. वे
भेड़ के बाल से बनी छलनी से इसे छान रहे हैं. इसे छानने वाले ऋत्विज् शक्तिमान, हृष्टपुष्ट
और घोड़े जैसे बलवान हैं. (७)
वयमेनमिदा ह्यो ऽ पीपेमेह वज्रिणम्.
तस्मा उ अद्य सवने सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते.. (८)
हे यजमानो! हम वज्रधारी इंद्र को पहले से ही सोमरस पिलाते रहे हैं. आज भी हमें उन्हें
यह सोमरस पिलाना चाहिए. वे सोमपान और स्तोत्र श्रवण (सुनने) हेतु हमारे यज्ञ में पधारने
की कृपा करें. (८)
वृकश्चिदस्य वारण उरामथिरा वयुनेषु भूषति.
सेमं न स्तोमं जुजुषाण आ गहीन्द्र प्र चित्रया धिया.. (९)
हे यजमानो! भेड़िए जैसे भयंकर शत्रु भी इंद्र के सामने झुक जाते हैं. वे इंद्र हमारी
प्रार्थना स्वीकार करने की कृपा करें. इंद्र हमें विवेक व अद्भुत बुद्धि प्रदान करने की कृपा
करें. (९)
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इन्द्राग्नी रोचना दिवः परि वाजेषु भूषथः. तद्वां चेति प्र वीर्यम्.. (१०)
हे इंद्र! हे अग्नि! यह दिव्य गुण आप दोनों के लिए वीरता का परिचायक है. आप गुण
रूपी धन से स्वर्गलोक में शोभायमान और भूषित होते हैं. (१०)
इन्द्राग्नी अपसस्पर्युप प्र यन्ति धीतयः. ऋतस्य पथ्या ३ अनु.. (११)
हे इंद्र! हे अग्नि! होता ऋत् (सत्य) के पथ का अनुगमन कर के सिद्धि की ओर समीप
जाते हैं. (११)
इन्द्राग्नी तविषाणि वां सधस्थानि प्रयांसि च. युवोरप्तूर्यं हितम्.. (१२)
हे इंद्र! हे अग्नि! आप दोनों की शक्ति और विद्या हितकारी भाव से कार्य करती है.
आप शीघ्र कार्य करने की सामर्थ्य रखते हैं. (१२)
क ईं वेद सुते सचा पिबन्तं कद् वयो दधे.
अयं यः पुरो विभिनत्त्योजसा मन्दानः शिप्यन्धसः.. (१३)
इंद्र और उन की आयु को कौन जान सकता है? वे शत्रुओं के नगर को अपने ओज से
नष्ट करने वाले हैं. वे मदमस्त रहते हैं और सुरक्षा कवचधारी हैं. (१३)
दाना मृगो न वारणः पुरुत्रा च रथं दधे.
न किष्ट्वा नि यमदा सुते गमो महा श्चरस्योजसा.. (१४)
हे इंद्र! आप महान, विचरण कर्ता और आदरणीय हैं. आप अपने बल सहित यज्ञ में
पधारने की कृपा कीजिए. आप को रथ ले कर यज्ञ में आने से भला कौन रोक सकता है?
आप शत्रु को वैसे ही खोजते हैं, जैसे मतवाला हाथी अपने शत्रु को खोजता है. (१४)
य उग्रः सन्ननिष्टृतः स्थिरो रणाय स ᳵ स्कृतः.
यदि स्तोतुर्मघवा शृणवद्धवं नेन्द्रो योषत्या गमत्.. (१५)
हे इंद्र! हमारी संस्कृत में रची हुई स्तुतियों को सुन कर आप अवश्य ही कहीं और नहीं
जाएंगे. आप हमारे ही यज्ञ में आने की कृपा करेंगे. वे रण (युद्ध) में स्थिर, अस्त्रशस्त्र से
सज्जित व उग्र रहते हैं. (१५)
चौथा खंड
पवमाना असृक्षत सोमाः शुक्रास् इन्दवः. अभि विश्वानि काव्या.. (१)
हे सोम! आप का रस पवित्र व चमकीला है. उसे सभी काव्यों (वेद मंत्रों) के साथ
संस्कारित किया जाता है. (१)
पवमाना दिवस्पर्यन्तरिक्षादसृक्षत. पृथिव्या अधि सानवि.. (२)
हे सोम! आप का रस पवित्र और वह स्वर्गलोक से धरती के उच्च शिखर को स्पर्श
करता हुआ बहता है. (२)
पवमानास आशवः शुभ्रा असृग्रमिन्दवः. घ्नन्तो विश्वा अप द्विषः.. (३)
हे सोम! आप का रस पवित्र और चमकीला है. वह (स्वास्थ्य संबंधी) सभी गड़बड़ियों
का नाश करता है. आप जल्दी द्रोणकलश में पधारते हैं. (३)
तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता. इन्द्राग्नी वाजसातमा.. (४)
हे इंद्र! हे अग्नि! आप वृत्रनाश से संतोष करते हैं. आप को कोई पराजित नहीं कर
सकता. आप उपासकों को प्रचुर धन देते हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (४)
प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः. इन्द्राग्नी इष आ वृणे.. (५)
हे इंद्र! हे अग्नि! हम मनोकामना पूर्ति के लिए आप का वरण करते हैं. हम वैदिक मंत्रों
से व साम गागा कर आप की उपासना करते हैं. (५)
इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम्. साकमेकेन कर्मणा.. (६)
हे इंद्र! हे अग्नि! दासों और उन की पत्नियों के नगर आप ने एक साथ एक कार्य
(युद्ध) से ही कंपकंपा कर नष्ट कर दिए. हम आप दोनों की स्तुति करते हैं. (६)
उप त्वा रण्वसंदृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत. अग्ने ससृज्महे गिरः.. (७)
हे अग्नि! आप (अरणियों में) रगड़ से पैदा होते हैं. आप दर्शनीय हैं. हम वाणी से आप
की स्तुति करते हैं. हम आप की समीपता चाहते हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (७)
उप छायामिव घृणेरगन्म शर्म ते वयम्. अग्ने हिरण्यसंदृशः.. (८)
हे अग्नि! आप सोने की तरह चमकीले हैं. हम आप से उसी प्रकार सुख पाते हैं, जिस
प्रकार लोग गरमी में छाया से पाते हैं. (८)
य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृङ्गो न व ᳲष सगः. अग्ने पुरो रुरोजिथ.. (९)
हे अग्नि! आप उग्र, वीर व धनुर्धर हैं. आप की ज्वालाएं (बैलों के) तीखे सींग की भांति
हैं. आप ने दुश्मनों के ठिकानों को नष्ट किया है. (९)
ऋतावानं वैश्वानरममृतस्य ज्योतिष्पतिम्. अजस्रं घर्ममीमहे.. (१०)
हे अग्नि! आप सत्यवान हैं. सभी मनुष्यों के लिए अमृत जैसे कल्याणकारी हैं. आप
ज्योति के स्वामी व अजस्र हैं. हम आप से यज्ञ की रक्षा करने का अनुरोध करते हैं. (१०)
य इदं प्रतिपप्रथे यज्ञस्य स्वरुत्तिरन्. ऋतूनुत्सृजे वशी.. (११)
हे अग्नि! आप सत्य के मार्ग में आने वाली रुकावटों को दूर हटाते हैं. संसार को
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वशीभूत रखते हैं. आप की कृपा से संसार विस्तृत होता है. आप ऋतुओं का सृजन करते हैं.
(११)
अग्निः प्रियेपु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य. सम्राडेको विराजति.. (१२)
हे अग्नि! आप एकमात्र सम्राट् हैं. आप अपने प्रिय धामों में सुशोभित होते हैं. आप
अतीत और भविष्य में चाहने वालों की इच्छा पूरी करते हैं. (१२)