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सर्वकोश
सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished310 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 310 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 281

हे सोम! आप का रस पवित्र और वह स्वर्गलोक से धरती के उच्च शिखर को स्पर्श
करता हुआ बहता है. (२)
पवमानास आशवः शुभ्रा असृग्रमिन्दवः. घ्नन्तो विश्वा अप द्विषः.. (३)
हे सोम! आप का रस पवित्र और चमकीला है. वह (स्वास्थ्य संबंधी) सभी गड़बड़ियों
का नाश करता है. आप जल्दी द्रोणकलश में पधारते हैं. (३)
तोशा वृत्रहणा हुवे सजित्वानापराजिता. इन्द्राग्नी वाजसातमा.. (४)
हे इंद्र! हे अग्नि! आप वृत्रनाश से संतोष करते हैं. आप को कोई पराजित नहीं कर
सकता. आप उपासकों को प्रचुर धन देते हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (४)
प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः. इन्द्राग्नी इष आ वृणे.. (५)
हे इंद्र! हे अग्नि! हम मनोकामना पूर्ति के लिए आप का वरण करते हैं. हम वैदिक मंत्रों
से व साम गागा कर आप की उपासना करते हैं. (५)
इन्द्राग्नी नवतिं पुरो दासपत्नीरधूनुतम्. साकमेकेन कर्मणा.. (६)
हे इंद्र! हे अग्नि! दासों और उन की पत्नियों के नगर आप ने एक साथ एक कार्य
(युद्ध) से ही कंपकंपा कर नष्ट कर दिए. हम आप दोनों की स्तुति करते हैं. (६)
उप त्वा रण्वसंदृशं प्रयस्वन्तः सहस्कृत. अग्ने ससृज्महे गिरः.. (७)
हे अग्नि! आप (अरणियों में) रगड़ से पैदा होते हैं. आप दर्शनीय हैं. हम वाणी से आप
की स्तुति करते हैं. हम आप की समीपता चाहते हैं. हम आप की उपासना करते हैं. (७)
उप छायामिव घृणेरगन्म शर्म ते वयम्. अग्ने हिरण्यसंदृशः.. (८)
हे अग्नि! आप सोने की तरह चमकीले हैं. हम आप से उसी प्रकार सुख पाते हैं, जिस
प्रकार लोग गरमी में छाया से पाते हैं. (८)
य उग्र इव शर्यहा तिग्मशृङ्गो न व ᳲष सगः. अग्ने पुरो रुरोजिथ.. (९)
हे अग्नि! आप उग्र, वीर व धनुर्धर हैं. आप की ज्वालाएं (बैलों के) तीखे सींग की भांति
हैं. आप ने दुश्मनों के ठिकानों को नष्ट किया है. (९)
ऋतावानं वैश्वानरममृतस्य ज्योतिष्पतिम्. अजस्रं घर्ममीमहे.. (१०)
हे अग्नि! आप सत्यवान हैं. सभी मनुष्यों के लिए अमृत जैसे कल्याणकारी हैं. आप
ज्योति के स्वामी व अजस्र हैं. हम आप से यज्ञ की रक्षा करने का अनुरोध करते हैं. (१०)
य इदं प्रतिपप्रथे यज्ञस्य स्वरुत्तिरन्. ऋतूनुत्सृजे वशी.. (११)
हे अग्नि! आप सत्य के मार्ग में आने वाली रुकावटों को दूर हटाते हैं. संसार को
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